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ISSN 2292-9754

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07.17.2014


29.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

विजय मंत्री जी से फारिग होने के बाद काफी राहत महसूस कर रहा है। उसके सभी प्रॉब्लम पूरी तरह से हल तो नहीं हुए हैं लेकिन आशंका और भय के बादल कुछ हद तक कम ज़रूर हो गए हैं। यह सब मंटू के आश्वासन के बाद हुआ है। विजय को अब लग रहा है कि उसे एक मौका और मिल जाएगा। फिर से वह पाँच वर्षों तक दिल्ली में रह सकता है। लेकिन वह अपने को इस बात के लिए तैयार कर रहा है कि इस बार उसे अपनी आदत और सोच में परिवर्तन करना होगा। वरना, वह अब चल नहीं पाएगा। राजनीति के संकेत भी इस चुनाव में साफ हैं। जनता ने चुनाव में उन सभी को नकार दिया जिन्होंने उनकी समस्याओं की ओर से आँखें मूंद ली थी। बाहुबली भी जो अबतक बंदूक और पैसा के बल पर चुनाव जीतते आए थे, उसे भी जनता ने सबक सिखा दिया है। हमलोगों को भी समय की गति और बदली हुई परिस्थिति में अपने को बदलना होगा। संकेत को समझना और उसके अनुसार काम करना ही समझदारी है। हाँ, एक बात और अगर इस बार बच गए तो ना सिर्फ पाँच साल, बल्कि दस वर्षों तक मैं इस जगह पर रह सकता हूँ, फिर आगे का देखा जाएगा। कांग्रेस की अप्रत्याशित जीत ने कांग्रेसियों में जान फूंक दिया है। वे अब फिर से अपनी हालात खराब नहीं होने देेंगे। उन लोगों ने इसके लिए अपनी कमर अभी से कसनी शुरू कर दी है।

पिछले 62 वर्ष में आम आदमी की सुधि नहीं लेनेवाले कांग्रेसी अब 100 दिनों में देश का भाग्य बदलने में जुट गए हैं। मानो जादू की छड़ी है-- घुमाई और सबकुछ ठीक ठाक। लेकिन मानसिक स्तर पर इसका असर दिखने लगा है। उन नेताओं की भी छुट्टी होने लगी है जो अनावश्यक रूप से किसी भी काम को देर करने में अपनी वाहवाही समझते थे। सौ दिनों का एजेंडा भले ही, बराक ओबामा की तर्ज पर तैयार किया जा रहा है, लेकिन इसका लाभ तो ज़रूर मिलेगा। पहले नेताओं, मंत्रियों का मकसद, अगर सभी नहीं तो ज्यादातर की मानसिकता यह होती थी कि चार साल तक ऐश मौज करो और चुनाव के वर्ष यानी एक साल में काम करो। इस प्रवृत्ति ने ही देश का सबसे ज्यादा बंटाधार किया है। पंचवर्षीय योजना सब चीजों में लागू होती थी। नेहरू जी ने पंचवर्षीय योजना क्या चलाया, नेता समूह ने इसे अपने हृदय से लगा कर रख लिया। यह उनके लिए गीता और बाइबिल के जैसा हो गया। वह पहले चार सालों तक जनता को यह कहकर बेवकूफ बनाते रहते कि मैं सड़क बनवाने का प्रयास कर रहा हूँ। इस मुद्दे को संसद में उठाया है, प्रशासन को निर्देश दे दिया गया है। अब काम शुरू होनेवाला है। इस प्रकार पूरे के पूरे पाँच साल निकल जाते थे। अगर उनके काम को देखें तो सिर्फ कहीं पत्थर लगे तो कहीं कुछ ईटें बिछाई गई। कोई भी काम शायद ही पूरा हुआ होगा पाँच वर्षों में यानी एक समय काल में पूरा किया गया हो।

एक संसद काल में जो काम शुरू हुआ है। वह दूसरे पाँच साल के काल में पूरा हुआ। जनता यह सोचती कि सांसद जी ने खूब मेहनत की है। अगर उन्हें हरा दिया जाएगा तो विकास के सभी काम बंद हो जाएँगे।

इस सोच से राजनीति भी जमींदारी पद्धति के ढर्रे पर चली गई। एक ही आदमी का आधिपत्य होता चला गया, मानो उसका ही संपूर्ण क्षेत्र पर साम्राज्य हो। बाद में उनके बेटों ने अपना अधिकार जमाना शुरू कर दिया। यह बड़ा ही खतरनाक साबित हुआ। करोड़ों रुपये जनता के वेल्फेयर के लिए केन्द्र सरकार देती रही और वो पड़े के पड़े रह गए। उसे खर्च नहीं किया गया। कुछ क्षेत्रों में तो पैसा वापस कर दिया गया। दरसअल यह पुरानी विचारधारा थी। लोगों ने इस तरह की सोच पाल लिया था। लेकिन अब जनता नेताओं के इस रवैये से वाकिफ हो चुकी थी। अब लोगों को रिजल्ट चाहिए और वह भी जल्दी। वरना लोग नाराज हो जाएँगे। दिल्ली में शीला दीक्षित के तीन बार चुने जाने की वजह यह भी है। जो काम उन्होंने हाथ में लिया, उसे पूरा किया। लोगों ने अपने आँखों के सामने फ्लाइओवर, मेट्रो का काम शुरू होते और पूरा होते देखा।

यह बड़ी बात है। पंचवर्षीय योजना वाली प्रवृत्ति को अब तोड़ा जा रहा है। हालांकि इसमें टेक्नोलॉजी का अहम योगदान है, फिर भी उनके निर्णय ने लोगों को सोचने पर मजबूर किया। इसी वजह से लोगों ने उनके पक्ष में मत दिया। ऐसा नहीं था कि लोगों की सभी समस्याओं का निराकरण हो गया। समस्याएँ तो अभी भी बरकरार हैं। लेकिन शीला जी ने समस्याओं को सुलझाने के लिए सक्रियता दिखाई। अपनी सूझबूझ का परिचय दिया। लोगों का उनपर विश्वास है। ठीक उसी प्रकार, मनमोहन सिंह ने लोगों का दिल जीत लिया है। इस चुनाव के बाद वे काफी सक्रिय हैं और मजबूती से अपने बातों को रख रहे हैं।

ऐसा लगता है कि जितना पिछले 62 वर्षों में जो काम नहीं किया है वह इन पाँच वर्षों में पूरा हो जाएगा। प्रधानमंत्री अपने उद्देश्य में साफ हैं वह हर हाल में डेवलपमेंट करना चाहते हैं। 21वीं सदी के भारत के सपनों को साकार करने के लिए वे कटिबद्ध नजर आते है।


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