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ISSN 2292-9754

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07.17.2014


28.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

विजय की परेशानियाँ अब कम हो गई थीं। मंटू से बात करने के बाद उसे यह विश्वास होने लगा था कि अब उसकी नौकरी मंत्री के साथ पक्की है। मनीष आज कई बार विजय के पास गया, लेकिन व्यस्तता के कारण बात नहीं कर सका। मनीष को विजय ने कहा, "आज मैं काम निपटा लूं क्योंकि मंत्री जी को फिर से बाहर जाना है। कल हम विशेष रूप से बात करेंगे।"

मनीष का संशय कुछ कम हुआ। पिछले दो दिनों से उसकी बात नहीं हो पाई थी। इस वजह से उसके मन में संदेह हो गया था कि शायद वह पिछली मुलाकात में कुछ ज्यादा बोल गया था। उसके विचार गलत थे। लेकिन अब आश्वस्त हो गया कि नहीं शायद ऐसा व्यस्तता की वजह से हुआ है वरना हमसे वह ज़रूर बात करते। बड़े अधिकारी हैं, अफसरों को कई काम करने पड़ते हैं। हमलोग जैसा थोड़े ही हैं, एक चीज को पकड़ा तो उसी को पिछले कई दिनों से पकड़े हैं। यह भी एक कला है। उन लोगों को कई काम को एक साथ निष्पादन करना पड़ता है।

हमलोग केवल अपने काम को काम समझते हैं। दूसरे को भी समझना ज़रूरी होता है। राधा ने कल जो बातें कही, उससे मेरी आँखें खुल गईं। मैं महिलाओं के बारे में क्या सोचता था और जो बात उसने बताई; उसमें जमीन आसमान का अंतर है।

अब तक मेरी पसंद शहरी पढ़ी लिखी महिलाएँ थी। मैं उन्हें आदर से देखता था। अंग्रेजी बोल रही है, काम पर जा रही है। मर्दों के साथ कंधा से कंधा मिला कर चल रही है। संकोच और शर्म कोई लेशमात्र भी नहीं है। वे कॉन्फिडेंट हैं। खुद पर निर्भर हैं। उनकी सोच नई व आधुनिक है। मेट्रो में जींस शर्ट पहन आत्मविश्वासी महिलाओं को देखकर मैं यह सोचता था कि ये सराहना के पात्र हैं। देहाती महिलाएँ अभी भी संकोची, शर्मीली व दूसरों के ऊपर निर्भर रहती हैं। हालांकि, हालात सर्वथा अलग हैं। दो साल दिल्ली में रहने के बाद भी राधा में वह सभी गुण मौजूद थे, जो एक देहाती महिलाओं में हुआ करते है। लेकिन उसकी सोच जो मैंने जाना वह ना सिर्फ आधुनिक बल्कि अकल्पनीय है। राधा मैट्रिक पास थी। वह हिंदी जानती थी लेकिन इंगलिश में हाथ तंग थे। अब वह पड़ोस में रहनेवाली से इंगलिश सीख रही है और उनके बच्चों को हिन्दी तथा बुटीक का काम सिखा रही है। राधा को उसी से पता चला कि दिल्ली में महिलाएँ कपड़ों की सिलाई को बुटिक कहते हैं और इसमें काफी पैसा है। लेकिन यहाँ वही लोग सफल हो सकते हैं जिनकी, इंगलिश अच्छी हो। दिल्ली में अंग्रेजी जाने बिना सफलता संभव नहीं है। अगर इंगलिश की जानकारी हो जाए, सभी महिलाएँ अच्छा पैसा कमा सकती हैं। अनेक अवसर हैं। रिसेप्सनिस्ट, एनजीओ, स्कूल के शिक्षक आदि आदि। ट्यूशन पढ़ाकर भी काफी पैसा कमाया जा सकता है।

राधा के सामने चुनौती थी, अंग्रेजी सीखने की। एक तरीका था कि वह भी कहीं इंगलिश स्पीकिंग कोर्स ज्वाइन कर लें जिस प्रकार उसकी पड़ोसन रानी सीख रही थी। दूसरा तरीका था कि वह उससे पढ़े और उसके बदले अपना हुनर उसे तथा उसके बच्चों को दे। राधा ने दूसरा विकल्प चुना, ताकि वह अंग्रेजी भी सीख जाए और सिलाई बुनाई के कार्य का एक बार फिर से प्रैक्टिस भी हो जाए। साथ ही पैसा भी न खर्च हो। राधा करीब तीन माह से यह सब कर रही थी। जिस प्रकार गाँव से आई ज्यादातर महिलाएँ अपने बच्चों के साथ स्नेक्स किया। चलो डिले हो जाएँगे। ठीक से स्टेन्ड हो जाएँ। यानी टूटी फूटी इंगलिश मे बातें करती हैं वह सीख लिया था। परंतु वह अच्छी तरह से सीखना चाहती थी। उसके बाद ही बोलना चाहती थी। साथ ही, मनीष को भी तब ही बताने को सोचा था। लेकिन जब कल मनीष ने उससे पूछा तो सभी बातें बता दी। और दशहरा के पहले पूरी तरह सीख लेने का भी वायदा किया।

राधा ने कहा कि रवि की छुट्टियाँ अक्टूबर में होंगी। वह 15 दिनों के लिए दिल्ली आएगा, तो वह उससे फर्राटेदार इंगलिश में बात करने का प्रयास करेगी। वह सातवीं कक्षा में चला गया है। अब वह भी फर्राटेदार अंग्रेजी बोलता होगा। पिछली बार ही आया था तो अच्छा बोल रहा था। मनीष इन सभी बातों को ध्यान से सुन रहा था और सोच रहा था कि किस प्रकार देहाती महिलाएँ समर्थ होते हुए भी अपने बारे में नहीं सोचती हैं बल्कि परिवार के बारे में सोचती हैं। उनमें ना तो आत्मविश्वास की कमी है, ना ही आगे बढ़ने की प्रतिभा की कमी। सिर्फ व सिर्फ वे परंपरा पर आधुनिकता को हावी नहीं होने देना चाहती है। वे अपने दायरे को तोड़ना नहीं चाहती हैं। वरना, वे भी शहरियों के जैसा ही अपनी प्रतिभा के जादू से दुनिया को रू ब रू करा सकती हैं।

आज अगर हम भारतीयता पर गर्व कर सकते हैं तो उनपर ही। मर्दों ने सभी बाहरी परंपरा को अपना लिया है। हर जगह हम उन्हें आलोचना करते सुनते हैं। धैर्य खोते देखते हैं। लेकिन महिलाओं में अभी भी ये सभी गुण मौजूद हैं। वे धैर्य नहीं खोती हैं। सहनशीलता की मूर्ति हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि वे भारतीय परंपरा की वाहक हैं।


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