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ISSN 2292-9754

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07.17.2014


27.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

मंटू के कमरे में विजय ठीक 8 बजे दाखिल हुआ।

"आइए, विजय जी, आप तो समय के बड़े पाबंद हैं। आपने आठ बजे कहा था और ठीक डॉट यू रिच्ड" मंटू ने कहा।

"हाँ, भैया, मंत्री कार्यालय में काम करते करते यह तो अब आदत हो गई है। मैं तो अपनी मेहनत और काबिलियत से ही किसी से जुड़ता हूँ। एक बार किसी से जुड़ गए तो लोग हम पर भरोसा करते हैं।"

विजय ने अपनी तारीफ के पुल बाँधते हुए कहा। आपको अपने बारे में क्या मैं खुद बताऊँ। अच्छा नहीं लगता है। यह दिल्ली है। यहाँ पैर काटनेवाले हमेशा लगे रहते हैं फिर भी मैं पिछले आठ साल से मंत्री के साथ बेदाग काम कर रहा हूँ। सभी ने मुझपर विश्वास किया और अगर यहाँ भी मुझे रखा गया तो मेरा काम आप खुद देखेंगे।

"विजय जी कैसी बात कर रहे हैं, आपको बड़ी भूमिका निभानी है। आप ने मेरी आँखें खोल दी। मैं तो इन सभी बातों से अनभिज्ञ था। जीजा जी से मैं आज ही बात करूँगा और दीदी से भी। टीम में कम से कम एक तो अच्छा और तजुर्बेदार आदमी रहे। जीजा जी विचारवान लोगों को ज्यादा प्रश्रय देते हैं। विजय शुक्रिया अदा करते हुये बोला, "अच्छा चलिए कोई बात नहीं, भैया। हाँ, मैं जो बात बताने वाला था। क्या बात है कि सरकार का काम करने का तरीका अलग है। यहाँ बाबूगिरी का बोलबाला है। वह नई चीजों को बढ़ावा नहीं देते हैं जबतक कि उनका वैसा करना मजबूरी न हो। उदाहरण के तौर पर मैं आपको बताऊँ। शिक्षा और स्वास्थ्य तो महत्वपूर्ण है और यह देश के हर आदमी को चाहिए। आप शिक्षा के क्षेत्र में देखिए। मंत्री जी क्या अनाउंस करते हैं...पाँच आई आई टी, आई आई एम आदि खुलेंगे। क्या मतलब है इन एनाउंसमेंट का। पहली बात क्या हम अपने युवाओं को शिक्षा इसलिए दे रहे हैं कि वेमल्टी नेशनल्स में काम करें। दूसरी बात यह किन लोगों के लिए है, जिनके पास पैसा है। तीसरी बात हम हमेशा ऊपर वालों की ही सोचते हैं नीचले तबके के लोगों के बारे में सोचना अछूत जैसा है। क्या आई आई एम, आई आई टी की जगह पीएमएस यानी पंचायत मैनेजमेंट स्कूल नहीं खोले जा सकते हैं। पंचायत के युवकों को अपने इलाके की समस्याओं को समझने और छुपी संभावनाओं के बारे में जानकारी और इलाके की बेहतरी के लिए तैयार नहीं किया जा सकता है। क्या ऐसा नहीं हो सकता है? ऐसा क्यों नहीं किया जा रहा है? इसकी वजह है? बाबू लोग अक्सर वही करते हैं जिसमें कम मेहनत करना पड़े। आई आई एम, आई आई टी, का ड्राफ्ट पेपर तैयार है। इसकी फंक्शनिंग, मोनिटरिंग सभी तय है। केवल उसे एनाउंस करवाना है। परंतु जब पीएमएस की बात करते हैं तो उसके लिए काफी मेहनत करनी होगी, तब जाकर मसौदा तैयार होगा। इसमें काफी वक्त और दिमाग खर्च होगा। मेरा मानना है कि वही किया जाए जिससे आमूल-चूल परिवर्तन, क्रांति की शुरुआत हो। इन सब चीजों पर विशेष ध्यान ठीक है लेकिन रूटीन वर्क को प्रमुखता देना उचित नहीं है। कोई भी सेक्शन ऑफिसर ड्राफ्ट कर सकता है। मीडिया में छाये रहने के लिए यहाँ सब किया जाता है। अब बच्चों को जीने का अधिकार दिया जाना चाहिए तो शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाया जा रहा है। जरा सोचिए, भैया। क्या इसमें कोई नई बात है? हाँ, वाहवाही मिल रही है। यह बहुत बढ़िया कदम होगा। लेकिन आप दूसरी तरह से सोचें तो पता चलेगा। आखिर, क्यों कोई मां-बाप अपने बेटे को पढ़ने नहीं दे रहा है। क्या वजह है? क्या मौलिक अधिकार देने भर से सभी बच्चे पढ़ाई कर लेंगे? यह तो मात्र दिखावा भर है कि सरकार ज्यादा फिक्रमंद है। क्या मां-बाप से भी ज्यादा कोई उनके बच्चों के लिए फिक्रमंद हो सकता है। नहीं ना भैया।

"विजय जी, लगता है आप इस पर काफी रिसर्च किए हुए हैं, बुनियादी बातों पर आपका विशेष ध्यान है। अच्छा है, यही होना चाहिए। तभी जाकर आमूल चूल परिवर्तन होगा। क्यों नहीं ये सब बातें एक बार आप मंत्री जी के नॉलेज में दे देते हैं। आप की सोच उनसे मिलती है। हमारे ऊपर तो इन बातों का कोई असर नहीं होता है। लेकिन जीजा को इस तरह के विचार वर्धन बातों में काफी रुचि है। आप जानते हो, इतनी व्यस्तता के बाद भी वह कम से कम चार-पाँच न्यूजपेपर पढ़ते हैं। मैगजीन, किताबें तो उनकी बीमारी है। बगैर इसके वह रह नहीं सकते हैं। देखने से कोई नहीं कह सकता कि वह इतना पढ़ते भी हैं, लेकिन घर पर वह इसके लिए वक्त ज़रूर निकालते हैं। ऐसा है कि आज तो वह मात्र कुछ घंटे के लिए ही दिल्ली में हैं। शाम को उनको बाहर जाना है। और करीब सात दिन तक समझिए इसी प्रकार का सिलसिला चलता रहेगा। अगले रविवार, इस बार नहीं, नेक्स्ट रविवार को हमलोग फिर मिलते हैं, उसी दिन हम समय निर्धारित कर लेगें और बैठकर बातें करेंगे। साथ ही पूरी कर्मचारियों की लिस्ट को भी फाइनल कर लिया जाएगा। हाँ, डेढ़ महीने बीत गए। आप कोठी का काम प्रमुखता से करायें।

"हाँ भईया, मैं इसे करता हूँ। ठीक है। मैं तो अब ऑफिस चलता हूँ। 12.30 हो गए। वहाँ जाकर सभी फाइल्स को ठीक करना है। मंत्री जी 2.30 से 3.15 तक ऑफिस में रहेंगे। ठीक है, नमस्कार।"


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