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ISSN 2292-9754

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07.15.2014


26.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

आज दूसरा दिन था जब मनीष विजय को अपनी बातों व अब तक जो विचार उसके दिमाग मे आए थे उसको बताना चाहता था। मनीष कई बार विजय के केबिन में गया, लेकिन वह वहाँ मौजूद नहीं था। व्यक्तिगत, सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर पर कई विचारों को उसने सोचा समझा था, लेकिन महिलाओं की समस्या, उनकी अपेक्षा और इच्छाएँ उसके ध्यान में नहीं आया था।

मनीष इस सोच विचार में डूब गया कि आखिर घरेलू महिलाएँ किस प्रकार अपना समय व्यतीत करती हैं। काम करने वालों को तो वह समझता था कि ऑफिस में जो काम दिया जाता है, उन्हें वह करती होंगी। कामकाजी महिलाओं को दोहरा कर्त्तव्य निभाना पड़ता है। वे बाहर के काम करती हैं और उन्हें घरेलू कामकाज भी करना पड़ता है। सरकार को चाहिए कि इन महिलाओं को पिक ऐंड ड्रॉप फेसेलिटी अनिवार्य कर दे।

बस में चलनेवाली महिलाओं को कितनी दिक्कतें होती होंगी। एक तो इतनी गर्मी, उपर से भीड़भाड़ और इतनी लंबी दूरी का सफर काफी पीड़ादायक होता होगा। छोटे शहरों में ऑॅफिस और घर की दूरी आधे घंटे में तय की जा सकती है। लेकिन बड़े शहरों मे ऐसा नहीं है। हमें उनकी इस समस्या का हल ज़रूर निकालना चाहिए।

महिलाएँ जनसंख्या की आधी आबादी हैं। सरकार की चिंता केवल संसद में 33 फीसदी आरक्षण तक है। जैसे यही सभी समस्याओं का हल है। दुनिया में इसके अलावा भी बहुत गम है। महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार का मौलिक अधिकार देना चाहिए, ताकि महिलाएँ संबल व सशक्त हों। हर स्तर पर इसके लिए प्रयास होनी चाहिए। गाँव से लेकर शहर तक। सबसे छोटी पंचायत सभा से लेकर देश की बड़ी सभा-राज्य सभा व लोकसभा तक। केवल टीवी पर बयानवाजी से काम नहीं चलने वाला है।

खैर, यह तो पॉलिसी की बातें हुई। घरेलू महिलाएँ किस प्रकार अपना समय बिताती हैं। आज मैं घर जाकर राधा से पूछूंगा। उसके बाद हम महिलाओं के बारे में कुछ और सोच पाएँगे। हमारे यहाँ की महिलाएँ अपने घर में संवरती हैं और दूसरे घर को संवारती हैं।

मनीष फिर से विजय को केबिन में देखने गया, लेकिन वह नहीं थे। पता चला कि वह मंत्रीजी के साले के साथ हैं। ऑफिस आए थे और तुरंत चले गए।


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