अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
07.15.2014


24.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

विजय शाम पाँच बजे एयरपोर्ट पर मंत्री जी के साले को लेने पहुँच गया। रास्ते में बातचीत के नाम पर दोनों एक दूसरे का नाम ही जान पाए। काम कैसा चल रहा है? इस पर भी बातें हुई। मंत्री जी की उम्र 60 के करीब थी। उनके साले की उम्र 40 से अधिक नहीं थी। विजय की भी उम्र लगभग इतनी ही थी। उसे इस बात की उलझन है कि आखिर उसे किस तरह संबोधित करें? उन्हें उनका नाम मंटू कहकर पुकारे या कुछ और कहकर संबोघित करें। विजय ने थोड़ी देर तक दिमाग का घोड़ा दौड़ाने के बाद तरकीब निकाली। उसने सोचा कि क्यों न भैया कहकर पुकारा जाए। होटल में पहुँचते ही उसने वेटर से कहा कि भैया का सामान जल्दी कमरे में ले जाकर रख दो। साले जी की प्रतिक्रिया भी ठीक रही। उन्होंने भी कहा – "हाँ, हाँ रखवा दें। हमें आठ बजे निकलना भी है। कुछ वरिष्ठ नेताओं से मिलना है। विजय, जी, आपको मेरी वजह से बहुत कष्ट हुआ। आप स्वयं मुझे लेने पहुँच गए, लेकिन यह अच्छा रहा। नहीं तो यहाँ पहुँचने में ही 8 बज जाता। टैक्सी करो, होटल देखो इत्यादि।"

विजय ने मुस्कुराते हुए कहा, "नहीं इसमें कष्ट की कौन सी बात है भैया? आप पहली बार यहाँ आ रहे थे, तो यह हमारा फर्ज बनता है।"

"कोठी कब तक मिलने की संभावना है?"

विजय ने मुस्कुराते हुए कहा, "मैं इसके लिए तीन चार बार एस्टेट डिपार्टमेंट वालों से मिल चुका हूँ। वे लोग बता रहे थे कि जल्दी ही मिल जाएगी। अब, कल सर आ जाएँगे तो उनसे भी एकबार बात करवा दूंगा, इससे दबाव बनेगा, जल्दी मिल जाएगी। और थोड़ा बढ़िया मिले तभी अच्छा है।"

"क्या आपने कोई देखा है, विजय जी?"

"हाँ, भैया मैंने उसके इंचार्ज सक्सेना साहेब से भी बात की है। उन्होंने आश्वासन दिया है। सब ठीक हो जाएगा। भैया, आप टेंशन न लें। वह सक्सेना मेरा मित्र है। मैंने उसका पहले काम भी किया है। इसलिए उसे भी कर देना चाहिए ....."

"लेकिन ये दिल्ली है, क्या बताऊँ।"

"मतलब"

"भैया यहाँ सभी तरह के लोग रहते हैं। यहाँ जब भी कोई सांसद जीत कर आता है, एयरपोर्ट से आदमी लग जाता है। उन्हें लेकर होटल ले जाना। उनकी गाड़ी की व्यवस्था कराना। हर तरह की सुख सुविधाएँ पहुँचाने में वे लग जाते हैं। उन्हें घर दिलाने में भी वे बड़ी भूमिका निभाते हैं। कुछ लोगों की बात आप जानिएगा भैया, तो चौंक जाएँगे। हम तो यह सब वर्षों से देख रहे हैं, राजनीति को किस प्रकार इन दलालों ने दलदल बना दिया है। सीधे साधे सांसद को क्या मालूम? वह चुनाव जीत कर आते हैं और दिल्ली की चकाचौंध में खो जाते हैं। हम आपको एक सच्ची घटना बताते हैं। आप देखते होंगे कुछ सांसदों ने दिल्ली आकर दूसरी शादी कर ली है। उसकी शुरुआत यहीं से होती है। दलाल बहला फुसलाकर उन्हें अपने यहाँ ठहरा लेते हैं। कोई बोलता है कि हमारा जोर बाग में मकान है, तो कोई सफदरगंज इंक्लेव में। मेरे घर से 10 मिनट में आप पार्लियामेंट पहुँच जाएँगे। वहाँ सारी सुख सुविधा है। चलिए, वहीं रहिएगा। जो लोग उनकी बातों में आ जाते हैं इसमें फंस जाते हैं। वे इससे निकल नहीं पाते हैं। एक दो ने तो शादी तक कर ली। कुछ का अवैध रिश्ता है। यह सब दिल्ली में जायज बताया जाता है। यहीं कहानी खत्म नहीं होती है। कुछ दलाल मंत्री के स्टाफ में भी शामिल हो जाते हैं। वह सबसे खतरनाक साबित होता है। वह एक तरह से सांप को दूध पिलाने के बराबर है। उनका कोई ईमान नहीं होता है।"

"हाँ, आप ठीक कह रहे हैं। मैं अभी दो दिन दिल्ली में ही हूँ। मुझे आपसे और बात करनी है। आप मुझे सतर्क करते रहिए।"

"हमें भी आपसे कुछ इनोवेटिव आइडियाज के बारे में बात करनी है। यह न सिर्फ सर के लिए ठीक रहेगा, बल्कि पूरे देश के लिए अच्छा होगा। कल हम फिर आपसे मिलते हैं भैया, 8 बजे।"


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें