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ISSN 2292-9754

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07.15.2014


23.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

समस्याएँ आती हैं। क्या इनसे बचा जा सकता है? अक्सर लोग इनसे बचने के लिए कई उपाय अपनाते हैं। मनीष आज इसी उघेड़बुन में है।

उसने सोचा था कि घर वापस आकर वह अपनी बातों को, अपनी विचारों की कसौटी पर कसेगा। उसे एक लिखित प्रारूप देने की कोशिश करेगा, ताकि वह विजय बाबू के सामने अपने मन मुताबिक बातों को रख सके।

लेकिन मनीष जैसे ही घर के अंदर प्रवेश किया, तो राधा ने कहा, "चाय पत्ती नहीं है, बिस्कुट भी नहीं है।"

मनीष उसे लाने के लिए बाजार चला गया। इसमें उसे चालीस मिनट लग गए। उसे चाय पीते और तैयार होते-होते 9 बज गए। यानी वही समय जो बगैर चार्टर बस के, उसे पहले लगा करता था।

चार्टर बस से ऑफिस आने का आज उसका दूसरा दिन था, आते समय उसने मन बना लिया था कि अब वह इसी बस से ऑफिस आया-जाया करेगा। साधारण बस से समय अधिक लगता है। मेट्रो इस रूट तक अभी आई नहीं है। जब आएगी तब देखा जाएगा।

परंतु आज उसका समय बेकार के कामों मे लग गया, जिससे उसका मन थोड़ा खिन्न था। लिखने पढ़ने का समय न मिलने की वजह से वह एक बार फिर सोच में पड़ गया। वह सोचने लगा कि पैसा भी बर्बाद करूँ और समय भी न मिले, तो इससे क्या फायदा? फिर सोचा कि अच्छा कुछ दिन और देखते हैं। यह संयोग भी हो सकता है कि आज चाय-पत्ती नहीं थी, कल देखेंगे। इसके बाद ही निर्णय लेंगे।

यह सोचकर वह फिर से आम आदमी के बारे में सोचने लगा। जैसा कि अक्सर होता है, सोचने वाला अपने बारे में विचार करना ही भूल जाता है। मनीष भी अपने आप को अब तक आम आदमी में गिनती नहीं कर पाया था। आज ध्यान आया कि वह भी तो आम आदमी ही है। हमारी समस्याएँ, अपेक्षाएँ भी

तो आम आदमी की तरह ही हैं। हम दूसरों की परेशानियों को जानने की कोशिश कर रहे हैं। मेरी रोजमर्रा की जिन्दगी में जो हो रहा है, वही सब कुछ तो औरों के साथ भी होता है। संभव है, हमसे भी अधिक परेशानियों का सामना उन्हें करना पड़ता हो।

मेरी नौकरी सरकारी है। इसमें भाग-दौड़ भी थोड़ी कम है। पता नहीं, और लोगों को कितनी अधिक दिक्कतों का सामना करना पड़ता होगा? प्राइवेट कंपनियों में काम करनेवालों को ऑफिस में 8 घंटे की बजाय 10-10 घंटे काम करने पड़ते हैं। घर की जिम्मेदारियाँ भी होती हैं, उसे पूरा करने में भी समय लगता होगा।

शहर की स्थिति बहुत खराब है। लोग यहाँ आते हैं अच्छा जीवन जीने के लिए। लेकिन यहाँ जो देखने को मिल रहा है, वह काफी सोचनीय है। यहाँ तो पारिवारिक जीवन जीना दूभर है। सामाजिक जीवन की बात कौन सोचे? खानाबदोश की जिंदगी बितानी पड़ती है। सुबह घर से ऑफिस के लिए निकलो और रात दस बजे तक घर पहुँचो। खाकर सो जाओ।

कमोवेश ऐसी ही स्थिति देश के ज्यादातर शहरों में है। खासकर दिल्ली या अन्य मेट्रो शहरों के एक तिहाई से ऊपर लोग ऐसा ही जीवन-यापन कर रहे हैं। ये बेहद गंभीर मामला है। कैसे सुलझाया जाए?

हाँ अब मेरा अपना काम समझ में आया। मन में विचार अलग बात है। लेकिन इसे अमल में लाना अलग बात है। जब इन बातों को मैं समझ रहा हूँ, तो क्या ऊपर बैठे लोगों को समझ में नहीं आती होगी। आती होगी, ज़रूर आती होगी। इसमें कोई दो राय नहीं है। मैं भी उस दिन विजय बाबू के सामने छोटी मुंह बड़ी बात बोल गया। मैं अब अपनी बात उनसे नहीं कहूँगा। ठीक ही हुआ कि वह आज हमको नहीं बुलाए, वरना पता नहीं क्या अनर्थ हो जाता। अब मैं सिर्फ जिन समस्याओं से रोज मुखातिब होता हूँ, वही बताऊँगा।


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