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ISSN 2292-9754

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07.15.2014


21,
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

विजय आज कुछ रिलैक्स था। घर पहुँचने पर वह विकास से कॉरपोरेट गर्वनेस पर बात करना चाहता था। इससे पहले कि वह कुछ उससे पूछता विकास ने ही वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम के बारे में प्रश्न दाग दिया।

"क्या चुनाव परिणाम आने के पहले ऐसा नहीं लग रहा था कि इस बार मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार सत्ता से बाहर हो जाएगी? और एनडीए सरकार बना लेगी?"

"हाँ, ऐसा ही लग रहा था। इसलिए मैं भी एनडीए के नेताओं से जोड़ तोड़ करने में पहले से ही लग गया था। लेकिन हुआ इसके विपरीत। अब परेशानी झेल रहा हूँ," विजय ने उत्तर दिया।

"अच्छा ये बताओ, आखिर ऐसा क्यों हुआ? कौन सी ऐसी बात हुई जो भाजपा की हार का कारण बनी।"

"देखो, वैसे तो कई कारण हैं, लेकिन मुख्य कारण रहा जनता के मनोभावों को नहीं समझने का। भाजपा के लोग आम जनता की नब्ज को सही तरह से टटोल नहीं पाए।"

"इसका मतलब," विकास ने प्रश्न किया।

"वाजपेयी जी ने अपने छह साल के कार्यकाल में विचारात्मक तौर पर आम लोगों को जोड़ने का प्रयास किया। पूरे देश की जनता को उन्होंने सरकार के साथ जोड़ा। लोगों ने उनकी बातों को सुना। उन पर भरोसा भी किया। उन्हें लगा कि यह सरकार उनके लिए कुछ अच्छा कर सकती है। फिर भी हार गये थे। आम आदमी को क्या चाहिए?

यह समझना बहुत ज़रूरी है। चुनाव एक पहेली है। मैं तुम्हें इतिहास में ले चलता हूँ। इंदिरा गाँधी ने 1971 में गरीबी हटाओ का नारा देकर कांग्रेस से आम लोगों को भावनात्मक तौर पर जोड़ा था। और विजयी हुई थी।"

विकास, "हाँ, यह तो है, वाजपेयी जी ने कई ऐसे काम किए थे। सड़क, रसोई गैस के साथ महंगाई को भी कंट्रोल किया था। फिर भी वह 2004 में हार गए। अप्रत्याशित हार थी। इसपर हम सभी लोगों को विश्वास नहीं हो रहा था।

विजय, "अप्रत्याशित हार बुद्धिजीवियों के लिए आम जनता के लिए नहीं। मैं उन दिनों भी मंत्रलय में था। कार्यकर्ता अपने काम के लिए मंत्री के पास आते थे। उनका काम नहीं हो पाता था। वे निराश होकर वापस चले जाते थे। उन्हें लगता था कि उनकी सरकार बन गई है। वे जो चाहेंगे वह हो जाएगा। लेकिन ऐसा होता नहीं था। दरअसल, दिल्ली बड़ी ही अजीब जगह है। यहाँ का वातावरण कुछ ऐसा है जिसमें अपने लोग दूर और पराये लोग करीबी बन जाते हैं। उन दिनों भी कुछ ऐसा ही था, भाजपा के कार्यकर्ता नेताओं के चक्कर लगाते रहे, लेकिन वे लोग उन्हें ईमानदारी का पाठ पढ़ाते रहे। लिहाजा कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट गया।

वहीं नेतागण जिसको जहाँ मौका मिला, अपना माल बनाने में जुटे रहे। कार्यकर्ता बताते हैं कि जो नेतागण पहले उनके साथ चाय की दुकानों पर मिलते थे और अपनापन का रिश्ता रखते थे, मंत्री बनने के बाद उनसे मिलने के लिए महीनों इंतजार करना पड़ता था। कई चक्कर काटने पड़ते थे।

नेताओं के रहन-सहन का तौर-तरीका बदल गया था। उनके घरों में लाखों रुपये का सोफा सज गया था। उनकी वेश- भूषा भी बदल गई थी। ऐसे बदलाव को देखकर कार्यकर्ताओं के मन में वितृष्णा पैदा हो गई। वे लोग उन्हें जिताने की बजाय हराने में लग गए।"

"अब और मैं क्या बताऊँ? तुम खुद भी महसूस किए होगे। आप आडवाणी जी को ही देख लो। आडवाणी जी की दो तस्वीरों की तुलना कर लो। एक 1990 की जब वे आम आदमी की तरह खादी का कुर्ता पहनते और टिपिकल देहाती मास्टरजी वाला चश्मा लगाया करते थे। लोगों के मन में उस समय जो छवि बनती होगी, उसका ध्यान करो। अब 2009 में उन्हें देखो। डिजाइनर कुर्ता और स्टाइलिश चश्मा। क्या इसका फर्क नहीं पड़ता? बहुत पड़ता है, विकास। मैं तो लोगों को आपस में बोलते हुए सुनता हूँ। हाँ यह मेकओवर शहरी वातावरण के लिए ठीक है। ग्रामीण जीवन में भले ही हमें ऐसा लगता है कि कोई इसपर ध्यान नहीं दे रहा है, लेकिन हकीकत इसके विपरीत है। वहाँ के लोग हर चीज पर ध्यान देते हैं। यहाँ तक कि आपके हेयरकट, चाल-ढाल, और चेहरे पर सौम्यता की भी। वाजपेयी जी में काफी आकर्षण था। वे ना सिर्फ वाकपटु थे, बल्कि उनके चेहरे पर सौम्यता भी थी। लोग उन्हें अपने बीच का आदमी मानते थे। आडवाणी जी बुद्धिजीवियों के नेता लगते हैं। आम आदमी के नहीं।"

"हाँ, यह तो तुम ठीक कह रहे हो। कम्प्यूटर वर्ल्ड के प्राफेशनल्स भी चुनाव के समय आडवाणी जी को ही पसंद करते थे।"

"यह सही है। लेकिन डायनेमिक्स ऑफ पॉलिटिक्स को समझना पड़ता है। राजनीति कारपोरेट वर्ल्ड से अलग है। हाँ, मैं बता रहा था कि वाजपेयी जी आम आदमी के नेता थे और आडवाणी जी बुद्धिजीवियों के नेता। बुद्धिजीवी इन्हें आज से नहीं, बहुत पहले से अपना नेता मान रहे हैं लेकिन आम लोग नहीं। हालांकि वे आम आदमी के बीच रहे हैं। उन्होंने लोगों से जुड़ने की कोशिश भी की है। लेकिन आमलोगों के दिलो दिमाग पर किसी व्यक्ति की जो छवि बन जाती है, तो वह आसानी से नहीं मिटती है।

वाजपेयी जी के बाद वाजपेयी जी जैसा ही आदमी लोगों को चाहिए था।

2004 में मनमोहन सिंह को कांग्रेस ने प्रधानमंत्री बनाकर सही निर्णय लिया। वे भी शांत, सौम्य व्यक्ति हैं। सबसे बड़ी बात कि लोगों का उनपर विश्वास था। एक बात और। इस चुनाव में कांग्रेस को मनमोहन सिंह की वजह से ही जीत मिली। देश की जनता वाजपेयी और मनमोहन सिंह दोनों को पसंद करती है। लेकिन दोनों में बहुत अंतर है। मनमोहन सिंह जहाँ सोनिया गाँधी के कहने के बाद निर्णय लेते हैं। वहीं वाजपेयी जी कोई भी निर्णय स्वयं लेते थे। उन्हें किसी बात के लिए दूसरे से पूछना नहीं पड़ता था। वे वाकपटु थे। मैं तुम्हें बता दूं कि कुछ लोगों ने उनपर दबाव बनाने की कोशिश की, फिर भी वे दबाव में नहीं आए और अपने व्यक्तित्व के बल पर सबको साथ लेकर चलते रहे। कई प्रसंग आए, जब कुछ कट्टर लोगों ने उनपर संघ का अनादर और उसके मापदंडों पर खरे नहीं उतरने का आरोप लगाया। लेकिन जिस चतुराई से वह अपनी बातों को रखते थे, विरोधी भी उनका विरोध नहीं कर पाते थे। विरोधियों के लिए उनका खास मैसेज रहता था, आप शाखा से स्वयंसेवक हैं लेकिन मैं स्वभाव, संस्कार और व्यवहार से स्वयंसेवक हूँ। इसलिए जब वे प्रधानमंत्री बने, तब भी यही कहते रहे कि मैं पहले स्वयंसेवक हूँ फिर प्रधानमंत्री हूँ।

खैर जो भी हो, आज हम लोगों ने राजनीति पर बहुत बातें कर लीं। हमें तुमसे कारपोरेट गवर्नेस के बारे में बातचीत करनी थी। अब तुम सुबह जा

 रहे हो। अच्छा कितने बजे की फ्लाइट है?"
"11 बजे की है। हमलोग फोन और ईमेल से टच में रहेंगे। अब तुम क्यों परेशान हो रहे हो? तुम्हारे पास मंत्री के सामने प्रस्तुत करने के लिए कई अच्छे आइडियाज हैं। और तुम अरुण से क्यों नहीं बात कर लेते हो? वह भी तुम्हें बहुत कुछ बता देगा।"

"चलो अब सो जाएँ। काफी समय हो गया है। 12.30 बज गए। कल बहुत काम करना है। परसों मंत्री जी भी आ रहे हैं।"

"हाँ, तुमने ठीक कहा, अरुण का तो मुझे ध्यान ही नहीं रहा, कल उससे बात करूँगा।"


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