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ISSN 2292-9754

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07.06.2014


20,
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

चार्टर बस में आने की वजह से मनीष आज घर ठीक 6.30 बजे पहुँच गया। राधा के साथ उसने चाय पी। कुछ देर तक दोनों ने इधर उधर की बातें की। उसके बाद मनीष एक पेन और कागज लेकर बैठ गया।

उसके दिमाग में लगातार तीन बातें आ रही थीं। उसने उसे कागज पर नोट किया -

1. आम आदमी

2. लोगों के प्रकार और

3. ग्लोबल विलेज

हमें अपनी सोच में आम आदमी की परेशानियों को ज़रूर स्थान देना चाहिए। सामान्यतया समाज में चार तरह के लोग होते हैं। निम्न वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग ही आम आदमी की दायरे में आते हैं। मध्यम और उच्च स्तरीय लोग इसके दायरे में नहीं आते हैं। इसका मतलब क्या सरकार यदि कोई कार्यक्रम बनाती है, तो इन लोगों को दरकिनार कर देगी। क्या ऐसा करना संभव है?

नहीं, कतई नहीं। सरकार को तो सभी वर्ग की समस्याओं और उम्मीदों पर खरा उतरना है। हमें इन सभी वर्गों के स्वभाव को समझना चाहिए। निम्न वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग सामान्य तौर पर भावुक होते हैं। वे ज्यादातर विषयों को अपनी भावना से तौलते है। उनके जीवन में भावना ही सब कुछ है।

शायद यह उन लोगों की ज़रूरत और मजबूरी दोनों है। ज़रूरत इस वजह से है कि वह दूसरों के साथ यदि जुड़कर नहीं रहते हैं तो लोग बुरे समय में उनकी मदद के लिए आगे नहीं आएँगे। यदि वे दूसरों के दुख-सुख में साथ रहेगें तभी दूसरे भी उनके साथ वैसा ही करेंगे।

मजबूरी इस वजह से है कि उनके पास उच्च वर्ग के लोगों जितना पैसा या साधन नहीं है, जो विपत्ति के समय काम आ सके। उनका एक मात्र साधन लोग हैं जिनपर उन्हें भरोसा है। यह भरोसा उन्हें भावना की डोर से बाँधे रखता है।

शायद यही वजह है कि आज के बाजार आधारित व्यवस्था में भी वे लोग सामाजिक, पारिवारिक त्योहार को विशेष तौर पर मनाते हैं। यह इनके दिल के करीब है। वहीं उच्च वर्ग के लोगों को पैसे पर अधिक भरोसा है। वह हर चीज को पैसे के तराजू पर तौलते हैं और धीरे-धीरे वे भावना शून्य हो जाते हैं। उन्हें किसी व्यक्ति से लगाव की बजाय सिर्फ और सिर्फ पैसा के प्रति आकर्षण होता है।

मध्यम वर्ग संभावना से संचालित होता है। उनमें ना तो भावना की प्रधानता होती है और ना ही वे भावना शून्य होते हैं। वे अपने जीवन को भी दांव पर लगा सकते हैं यदि उन्हें किसी करियर में भविष्य नजर आता है। उनके जीवन का मूल मंत्र सफलता की संभावना को तलाशना और इसके लिए जीतोड़ मेहनत करना होता है। सफलता पाने के लिए वे सब कुछ कर सकते हैं। भारत के युवा जो अपना घर-बार छोड़कर देश के बाहर हैं उनमें से ज्यादातर मध्यम वर्ग के ही हैं। उन्हें सफलता चाहिए, पैसा चाहिए। इसकी संभावना उन्हें विदेश में नजर आती है। वरना क्यों कोई बाहर जाएगा!

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज जिंदगी जीने के लिए आवश्यक है। मनुष्य को मशीन नहीं समझा जा सकता है। काम करना ज़रूरी है लेकिन उससे भी अधिक ज़रूरत है लोगों की जिसके साथ वह अपने मनोभावों को बाँट सके। आज हमारी सामाजिक व्यवस्था बदल रही है। पहले कृषि आधारित ग्रामीण व्यवस्था थी। संयुक्त परिवार का चलन था। संयुक्त परिवार से एकल परिवार आया, जिसमें मां-बाप, भाई-बहन सभी साथ-साथ रहते थे। ग्लोबलाइजेशन के बाद एकल परिवार की रूपरेखा में भी बदलाव आया है। एक बेटा अमेरिका में, दूसरा बॉम्बे में, बेटी दिल्ली में, बूढ़े मां-बाप गाँव में। बिल्कुल नया परिवेश गढ़ा जा रहा है। यह स्वतः स्फूर्त है। यह घटनाक्रम खुद ब खुद होता है।

बावजूद इसके राजनीति अभी भी पुराने ढर्रे पर चल रही है। धर्म और जात-पात की राजनीति आज भी हावी है। राजनीतिक पार्टियाँ टिकट देने में जाति-धर्म को प्रश्रय देती हैं। बीसवीं सदी का राजनीतिक ढांचा अभी भी बरकरार है। इक्कीसवीं शताब्दी में धर्म-आधारित और जाति-आधारित राजनीति पर चर्चा की ज़रूरत नहीं है। बहस का विषय यह है कि वर्तमान समय में राजनीति से प्रेरित समाज है या समाज से प्रेरित राजनीति है। इसी के आधार पर आगे का कार्यक्रम भी बनाया जाना चाहिए।


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