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ISSN 2292-9754

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07.06.2014


19,
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

अधिकारियों की परीक्षाओं में सामान्य घर के ज्यादातर लोग सफल होते हैं। लेकिन इस तंत्र में आने के बाद उनकी स्थिति भी पुराने अधिकारियों जैसी हो जाती है। वे भी जिस दिन सर्विस ज्वाइन करते हैं, उसी दिन से अपनी सीनियरटी लिस्ट चेक करना शुरू कर देते हैं। कब डीएम बनेंगे, कब ज्वाइन्ट सेक्रेटरी बनेंगे, कब सेक्रेटरी बनेंगे आदि आदि। ऑफिस आते ही नेट पर हर दिन वरीयता सूची की तहकीकात करना उनकी एक आदत बन जाती है।

यदि कोई इस बीच आ जाए, तो उसे व्यवधान माना जाता है। यह सरासर गलत है। हमें लोगों के लिए काम करना चाहिए। नेताओं को भी हम बेकार में दोष देते हैं। उन लोगों को कई तरह के फैक्टर्स का सामना करना पड़ता है।

मनीष की बातें सुनकर विजय को एक दिशा मिल गई। मनीष के आइडियाज और अपने डाटाज को कैसे प्रेजेंट किया जाए, इस पर वह विचार करने लगा। साथ ही इस संदर्भ में कुछ और लोगों की राय को शामिल करने कर निर्णय लिया। मंत्री जी परसों आ रहे हैं, तब तक मैं कुछ और लोगों से बातचीत कर लेता हूँ। लोगों से बातचीत करने पर काफी आइडियाज मिल जाते हैं। हम बाबूगिरी के चक्कर में अब तक अपने केबिन में बंद रहा करते थे। यह ठीक नहीं है। हम आम आदमी के लिए काम करते हैं और अपने आपको आम आदमी से दूर कर लेते हैं मानों वे अस्पृश्य हों। हम उनसे बात नहीं करेंगे तो उनकी समस्याओं का आभास कैसे होगा? निराकरण कैसे होगा?

एक आदमी की यह समस्या नहीं है। इस तरह के सिस्टम ही है जिसमें हम इस तरह का व्यवहार करते हैं। पहले तो मैं भी कहा करता था कि अधिकारी लोग काम नहीं करते हैं। जितने बाबू हैं, वो सिर्फ हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं। मैं अपने अनुभव से अब कह सकता हूँ कि ऐसा नहीं है। प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं। हम सभी अपने बारे में अधिक सोचने लगते हैं और दूसरों के बारे में कम। अगर दूसरों के बारे में सोचे तो देश की स्थिति बेहतर हो सकती हैं।

यह हमारी मानसिकता का दोष है। हमारी सोच को बदलने की ज़रूरत है। हम जब तक सिस्टम से बाहर रहते हैं, तब तक इसकी कमियों के बारे में सोचते हैं और जैसे ही इसमें शामिल हो जाते हैं, तो उन्हीं लोगों की तरह व्यवहार करना शुरू कर देते हैं। जिनके व्यवहार को पहले घृणा की दृष्टि से देखा करते थे। क्या यह सच नहीं है कि हर साल आईएएस, आईपीएस और अन्य मैं पिछले आठ साल में तीन मंत्रियों के साथ काम किया हूँ। लेकिन जितना काम इस मंत्री के साथ आठ दिन में करना पड़ा है, उतना तो मुझे पूरे आठ सालों में नहीं करना पड़ा था। हाँ, यह मंत्री पर भ्ृाी निर्भर करता है कि वह किस मिजाज का है? कोई काम चाहता है तो कोई केवल पैसा। मैंने खूब पैसा बनाया है, अब काम करना है। भगवान इस बार किसी तरह मेरी नौकरी बचा लें।

मुझे इसके लिए हर प्रकार की कोशिश करनी होगी। सात बज गए। अब चलता हूँ। आगे विकास से बात करूँगा। हमें कारपोरेट गर्वनेस का भी ज्ञान होना चाहिए, आखिर वहाँ काम करने या करवाने का क्या तरीका अपनाया जाता है? मैं इस बात पर उससे चर्चा करूँगा। वहाँ जो भी अच्छी चीजें होंगी उसे लागू करने की कोशिश करूँगा। हमें आगे पाँच साल मंत्री कार्यालय में यदि काम करने का एक और मौका मिल गया, तो मैं व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन ला दूंगा।


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