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ISSN 2292-9754

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07.06.2014


18,
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

मनीष आज बहुत खुश है। पहली बार उसके विचारों को किसी ने सराहा था। सबसे बड़ी बात उसे उपयोग किए जाने की भी संभावना दीख रही है। शाम के 5 बज चुके हैं। वह ऑफिस से घर जाना चाहता है। कल देरी से आफिस पहुँचने और डांट लगने की वजह से आज वह चार्टर बस से आया था जिससे वह समय पर पहुँच गया था।

चार्टर बस समय पर खुलती है। इसके लिए अन्य बसों की तरह समय बर्बाद नहीं करना पड़ता है। मनीष के घर के पास के स्टैण्ड से बस सुबह 8.30 बजे खुलती है और 9.15 में ऑफिस पहुँचा देती है। सिर्फ 45 मिनट में ही वह ऑफिस पहुँच जाता है। सामान्य बसों से आने में उसे डेढ़ से दो घंटे लग जाते थे और इतना ही समय जाने में भी।

मनीष समय का जोड़-घटाव इसलिए कर रहा है कि उसे अब अपने लिए समय चाहिए। राधा को वह समय नहीं दे पाता है। यह शिकायत हमेशा राधा की रहती थी। साथ ही उसे अपने विचारों को भी लिखना है। मनीष की शुरू से ही यह धारणा रही है कि लिखने पर विचार ठोस रूप में सामने आते हैं। मनीष 5.15 में ऑफिस के गेट पर पहुँच गया क्योंकि 5.30 में चार्टर बस पकड़नी है। वह 6.15 तक घर पहुँच जाएगा। वह चार्टर बस की सदस्यता लेने की सोच रहा है। दरअसल, चार्टर बस पर चलनेवालों को महीने के शुरू में ही पैसे देने होते हैं। कभी कभार कुछ लोग भले ही बस पर बैठ जाते हैं लेकिन हर रोज यह सुविधा नहीं मिल सकती है।

मनीष बस के चालक से पूछा कि उसे महीने में कितने रुपये देने होंगे। उसे कहा गया कि एक ओर का किराया पहले 450 रुपये था लेकिन अब इसे बढ़ाकर 550 रुपये कर दिये गये हैं। दोनों ओर के किराये को भी 800 रूपये से बढ़ाकर 900 कर दिये गये हैं।

"बस किराया यू हीं नहीं बढ़ता है। लेकिन क्या करूँ? पेट्रोल की कीमत चार रुपए प्रति लीटर बढ़ा दी गई हैं। इस वजह से ऐसा निर्णय लेना पड़ा है।"

मनीष सोचने लगा कि अगर चार्टर बस से आना जाना शुरू कर दे तो 400-500 रुपये अधिक लगेंगे। क्या मेरे लिए ऐसा करना संभव है?

पैसा अधिक लग रहा है, लेकिन समय की बचत हो रही है। हालांकि ज़रूरत पैसा और समय दोनों की है। आखिर क्या करें? वह असमंजस में पड़ गया।

एक ओर पाँच सौ रुपया है तो दूसरी तरफ चार से पाँच घंटे की बचत।

मनीष यह सोच रहा है कि यह केवल उसकी समस्या नहीं है। बल्कि हर गरीब आदमी की यही नियति होती है। अगर सरकार इस पर ध्यान दे तो बहुत मैन आवर की बचत हो सकती हैे। दिल्ली को देखें तो यहाँ रहनेवालों को तीन या चार श्रेणियों में बाँटा जा सकता है। निम्न वर्ग, मध्यम वर्ग, उच्च वर्ग। और एक और ...निम्न मध्यम वर्ग। पूरी कहानी इसी ओर घूमती है। राजनीति या प्रशासन भी इन्हीं लोगों को ध्यान में रखकर काम कर रही है और अपनी-अपनी तरह से इनका इस्तेमाल करती है। इसमें सबसे अधिक पिस रहा है निम्न एवं निम्न मध्यम वर्ग। यह सोचते-सोचते मनीष घर पहुँच गया।


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