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ISSN 2292-9754

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07.06.2014


17,
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

मनीष दौड़ा भागा विजय के पास पहुँचा। विजय कुछ पूछता इसके पहले वह बोल पड़ा, "सर मैंने सोच लिया है। क्या करना है? कई अच्छे आइडियाज मेरे दिमाग में आए हैं।"

"किस तरह का आइडिया आया है, बोलो?"

विजय ने मुस्कराते हुए पूछा, "हाँ मैं भी काफी मेटेरियल इकट्ठा कर चुका हूँ। काफी मैटर हो गए हैं। अब लगता है कि काम बन जाएगा। हाँ मनीष बोलो क्या बता रहे थे?"

"जी, सर. मैं बता रहा था कि हमारे प्रधानमंत्री ने किस प्रकार अपनी फिलॉसफी ऑफ डेवलपमेंट चेंज कर लिया।"

"क्या मतलब," विजय ने पूछा।

"सर, प्रधानमंत्री पहले दुनिया एक गाँव है, की बात किया करते थे और अब वे गाँवों में दुनिया तलाश रहे हैं। हमें भी अपने विचार को इसी के इर्द-गिर्द रखना होगा।"

"क्या मतलब? हम समझे नहीं। इसे स्पष्ट करो।"

"सर, आप जानते हैं कि मनमोहन सिंह नब्बे के दशक में भारत को उन्मुक्त बाजार और वैश्वीकरण की राह पर ले गए थे। यह कहते हुए कि इससे भारत की तरक्की का दरवाजा खुल जायेगा।"

"हाँ यह सच है कि लाखों युवाओं को इसका लाभ मिला। वे नौकरी करने के लिए बाहर निकले और दुनिया भर में नाम कमाया। अब लोगों की नौकरियाँ जा रही हैं, तो वे सभी चुप हैं।"

"इसमें दोष किसका है? आम जनता का या मनमोहन सिंह का। आम जनता ने 90 की दशक में उनकी बात मानकर ग्लोबलाइजेशन को अपना लिया। लेकिन आज के परिदृश्य में देखें क्या हो रहा है? हजारों युवाओं की नौकरी जा रही है, उसके लिए क्या वे जिम्मेदार नहीं है?

असल में सफलता ऐसी चीज है जिस पर कोई उंगली नहीं उठाता है। देश की जनता ने उनकी बातों को मानकर ही ग्लोबलाइजेशन को स्वीकार किया था। क्या कोइनसिडेंस है? 1991 में जब वे वित्त मंत्री थे तो भारत की आर्थिक व्यवस्था चरमरा रही थी और अब प्रधानमंत्री हैं तो दुनिया की अर्थव्यवस्था धराशायी हो गई है। कांग्रेस की चेयरपर्सन सोनिया गाँधी कह रही हैं कि हमारी अर्थव्यवस्था इसलिए बच गई क्योंकि इंदिरा गाँधी ने बैंकों का नेशनेलाइजेशन किया था। हम आर्थिक मंदी को सहने में इस वजह से कामयाब रहे हैं।

क्या वह जबाव दे सकती हैं कि मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री क्यों बनाया गया था? शायद वे दूरदर्शी थे। वित्तमंत्री के तौर पर उन्होंने अच्छा काम किया था। हम अभी तो केवल यह देख रहे हैं कि वे चुपचाप अपनी पुराने विचारों को छोड़कर आम आदमी की बात करने लगे हैं। कुछ लोग गाँवों के उत्थान तो कुछ लोग शहर के उत्थान की बात कर रहे हैं। ग्लोबलाइजेशन पर आज कोई बात नहीं कर रहा है।

अब दुनिया भर के अर्थशास्त्री ग्लोबलाइजेशन की बात कर रहे हैं। भारत में तो यह प्रथा पहले से ही है। महात्मा गाँघी ने तो पहले ही ग्राम आधारित व्यवस्था की बात की थी।

मेरा मतलब है कि हमें भी इसी तरह के विचार खोजने होगें। संभव हो सके तो इससे भी बेहतर आइडियाज लाने की ज़रूरत है। सर वाकई यह एक अच्छा मौका है आपके लिए। मैं तो बेहद खुश हूँ।

सर और आपने अपने काम मे मुझे साथ रखने का निर्णय लिया है। इसलिए मैं अपनी ओर से पूरी कोशिश करूँगा ताकि नतीजे अच्छे निकलकर आएँ। यदि आदमी को कोई काम करने का मौका मिलता है तो वह अपना दुख दर्द बिल्कुल भूल जाता है।

देखिए न, अभी ही, हम सब कष्टों को भूल गए। जब मैं घर से आ रहा था कई तरह का टेंशन मन में चल रहा था। लेकिन अब कोई परेशानी नहीं रही। मैं पूरी तरह से देश के विकास संबंधित आइडियाज सोच रहा हूँ। ठीक है सर, अब मैं चलता हूँ। कल तक मैं इस पर कुछ रिपोर्ट आपको देता हूँ।" विजय यह सब चुप-चाप सुनता रहा। वह मन ही मन सोच रहा था कि मेरे सामने जो नौजवान यानी मनीष इतने अच्छे-अच्छे विचार बताये जा रहा है, यदि इसे प्रोत्साहित किया जाये तो आगे काम आ सकता है। उसने जो अब तक डाटाज, मैटेरियल इकट्ठा किया था वो सभी के सभी बेकार लग रहे थे।


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