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ISSN 2292-9754

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07.06.2014


16.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

मनीष अपनी सीट पर जाकर सोचने लगा... किस प्रकार देश का विकास हो। वह दो तीन अखबार का नित्य पाठक था। साथ ही, जो लोग मंत्रालय में आते थे उनसे किसी न किसी विषय पर चर्चा भी करता रहता था। जहाँ तक उसकी शिक्षा की बात है तो उसने पत्राचार से स्नातक किया था। वह रिसर्च की किताबें नहीं पढ़ता था। अन्य बुद्धिजीवियों से वह अलग था। उसके ज्ञान का मुख्य स्त्रोत सामान्य तौर पर कहा जाए तो अखबार ही था। अखबार में बार-बार यह बात छपना कि सरकार आम आदमी को केन्द्र में रखकर विकास की रूपरेखा तैयार कर रही है। वह इससे अवगत था। वह भी अपने विचारों को आम आदमी के इर्द-गिर्द ही रखने के बारे में सोचता था। सोचे भी क्यों नहीं? आम आदमी ने पूरी कांग्रेस पार्टी की तस्वीर बदल दी। यह बात उसके मन पर बार-बार दस्तक दे रही थी।

2004 व 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस आम आदमी की बात करती रही और भाजपा कभी इंडिया शाइनिंग तो कभी मजबूत नेता, निर्णायक सरकार। मनीष ने सोचा कि शायद यह फिलॉसफी उसका भी भाग्य व किस्मत बदल दे। हम भी इसी के इर्द-गिर्द सोचते हैं और ताना-बाना बुनते हैं। समय की डिमांड भी यही है। समाचार पत्रों का रेगुलर पाठक होने की वजह से उसमें घटनाओं को एक दूसरे से जोड़ने की अद्भुत शक्ति आ गई है। जिसे बुद्धिजीवी लोग विश्लेषण कहा करते हैं। उसने भी इस शब्द को अपने मन में बिठा लिया था। जब उसे कुछ समझ में नहीं आता था तो लोगों को कहता था, "विश्लेषण करो।" लोग अपनी अपनी तरह से राय प्रकट करने लगते। इससे उसके ज्ञान में गहराई और व्यापकता आ गई थी। विश्लेषण के मायने और दायरा वह समझता था। उसने सबसे पहले आम आदमी को कसौटी पर कसने के बारे में सोचा। क्या यह सच है कि आम आदमी में आकर्षण है?

उसने सोचा शायद कांग्रेस ने ही 2004 के चुनाव में पहली बार आम आदमी के बारे में बात करने की शुरुआत की। उन लोगों ने इसी के इर्द गिर्द चुनाव प्रचार का ताना बाना बुना। चुनाव में बहुमत तो नहीं ला सके लेकिन सरकार बनाने में सफल रहे।

सरकार बनाने के बावजूद उन लोगों ने आम आदमी को छोड़ा नहीं। पिछले पाँच सालों में यूपीए ने इससे और जुड़ने की कोशिश की। प्रोग्राम, पॉलिसी भी आम आदमी को केंद्र में रखकर बनाए गए।

सबसे बड़ी बात उन्हीं बातों को कांग्रेस ने उठाया भी जिसका सरोकार सामान्य लोगों से था। भाजपा संसद में वोट फॉर कैश का मामला उठा रही थी, तो कांग्रेस के युवराज राहुल विदर्म के एक गाँव की महिला कलावती की बातें कर रहे थे। राहुल गाँधी का भले ही यह दिखावा हो, लेकिन उसने आम आदमी से जुड़ने की कोशिश ज़रूर की है। वह गरीबों के घर जाकर ठहरा, अपने कंधे पर मिट्टी उठाई आदि, आदि। वह कई कामों को इस प्रकार करता रहा, मानो वह हम में से ही एक हो।

वहीं चुनाव के पहले भाजपा के लोग, मजबूत नेता, निर्णायक सरकार की बात कर रहे थे। जब सरकार बनी ही नहीं, तो कैसी निर्णायक सरकार? नेता मजबूत है या कमजोर यह जनता तय करेगी या खुद-ब-खुद नेता। यह तो एक तरह से अपनें विचारों को लोगों पर थोपना हुआ। खैर, इसके बारे में बाद में सोचेंगे। हम अभी राजनीति पर नहीं सोच रहे हैं। हमें अपनी देश की विकास के अवधारणा को मजबूत करना है और यह निर्णय लेना है कि क्या आम आदमी के इर्द गिर्द विचारों को बुनना हमारे लिए सही रहेगा या नहीं।

हाँ, क्यों नहीं सही रहेगा। हम तो भूल ही गए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को देखो। आम आदमी की बात छोड़ो, वे तो भारत की बात भी नहीं करते थे। पता नहीं ग्लोबलाइजेशन, लिबरेलाइजेशन, ...और न जाने क्या-क्या कहते थे। वह भारत कोे-ग्लोबल विलेज बनाना चाहते थे। इसे हम काफी सुनते आए थे। कुछ लोग बोलते थे कि दुनिया एक गाँव है।

यह सच है कि दुनिया एक गाँव है। लेकिन मनमोहन सिंह ग्लोबल विलेज की जगह अब गाँव में दुनिया तलाश रहे हैं। उन्हें भी तो अब कुर्सी बचानी है। लेकिन एक बात है, वे अभी भी आम आदमी की ही बात करते है। इसी का लाभ मिला। उन्होंने सोनिया गाँधी का विश्वास जीत लिया। हमें भी विजय बाबू का विश्वास जीतना है। इस प्रकार उसके मन में कई विचार आ-जा रहे थे कि विजय ने फिर से उसे बुलावा भेजा।


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