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ISSN 2292-9754

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07.06.2014


13.
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

"भारत आस्था का देश है। भगवान ही कुछ करेंगे", ऐसा कहकर लोग संतोष कर लेते हैं। बहुत कम लोग हैं जो परेशानियों से निकलने के लिये विकल्पों की तलाश करते हैं। मनीष ने भी सोने से पहले एक-एक करके सभी भगवान को याद किया। अपनी पत्नी राधा को वह डीवीडी लेने से अब मना नहीं कर सकता है। उसे छः बजे बाजार जाना होगा, वरना राधा नाराज हो जाएगी।

दिन में सोकर जब राधा जागी, तो देखा कि बाहर बहुत तेज आंधी, पानी बरस रहा है। उसे यह देखकर बहुत निराशा हुई। वह दौड़ी-दौड़ी मनीष के पास पहुंची और जोर से चिल्ला पड़ी। मनीष भी चीख सुनकर जाग पड़ा। उसे लगा कि बाहर कुछ दुर्घटना हो गई है। लेकिन जब राधा ने बात बताई तो उसे काफी राहत महसूस हुई। उसे लगा कि आज फिर भगवान को याद करना सफल हो गया। साथ ही वह राधा के चेहरे पर डीवीडी न ले पाने की मायूसी साफ देख रहा था।

इस समय मनीष के मन में दो तरह के भाव उठ रहे थे। पहली तो खुशी इस बात की थी कि भगवान ने उसके मन की बात सुन ली और दूसरी राधा की मायूसी देखकर उसे ग्लानि भी हो रही थी।
उसने राधा को तसल्ली दी....कोई बात नहीं....... ठीक है बाद में ले लेगें।

राधा मान गई। उसने मनीष को बिस्तर छोड़ने और तैयार होने को कहा और खुद चाय बनाने चली गई।

चाय पीने के समय फिर से डी वी डी पर चर्चा होगी मनीष यह सोचते हुए आगे की योजना पहले से सोचने लगा। किस प्रकार वह राधा को समझायेगा। रणनीति बनाने लगा। आज समय काटे नहीं कट रहा था। वह सोच रहा था कि जल्दी समय बीत जाये।

इतने में राधा चाय लेकर आ गई। बातों का दौर वर्षा से शुरू हुई।

राघा, "अभी ही बारिश होनी थी। हम शॉपिंग के लिए जाते और कल से टीवी पर मनचाहा सिनेमा देखते।"

मनीष ने हामी भरकर बात को दूसरी ओर ले जाने की कोशिश करने लगा।

मनीष, "बाहर देखो कितनी झमाझम बारिश हो रही है। काफी गर्मी के बाद बरसात की ठंडी फुहारें बरस रही हैं। मौसम अब सुहावना हो जायेगा। इसकी बहुत ज़रूरत थी।"

साफ और निर्मल मन राधा भी उसकी बातों में घुलमिल गई।

मनीष अपनी रणनीति को कामयाब होते देख बातों को घुमाने की कोशिश करने लगा। वह अपने बचपन में बिताए गाँव की बातें करने लगा। जानती हो एक बार क्या हुआ था? ऐसा ही आँधी-पानी आया था। हम बच्चे लोग आम के बागान की ओर दौड़ पड़े थे। खूब आम चुने। जोर-जोर से बिजली कड़क रही थी, फिर भी हम लोग डटे रहे। कुछ देर बाद घनघोर अंधेरा छा गया।

"हाँ फिर क्या हुआ?" राधा ने तत्काल पूछा।

मनीष तो केवल राधा का ध्यान बाँटने की कोशिश कर रहा था। तुरन्त सम्भलते हुए उसने कहा, "हाँ, हम लोग भगवान को याद करने लगे।" कुछ देर पहले ही उसे भगवान को याद करने का लाभ मिला था। उसका विश्वास है कि विकट स्थिति में वह भगवान को याद करता रहा है और वे उसे बचाते रहे हैं। मनीष ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, "बजरंग बली का नाम हम लोग जपने लगे और आम को समेट कर हम सभी बच्चे घर की ओर दौड़ पड़े। जैसे ही हम लोग घर पहुंचे, जोरों से ओले बरसने लगे। हम लोगों को बजरंग बली ने बचा लिया था। तब से हम जब भी संकट में पड़ते हैं, उन्हीं को याद करते हैं।" अब तो हमारे भगवान का दायरा हालांकि बढ़ गया है। शंकर भगवान, साईं बाबा आदि आदि सभी को हम आह्वान करते हैं। बचपन में हम केवल हनुमान जी को ही जानते थे और वही हमारे लिए सब कुछ थे। उन्हीं पर बहुत भरोसा था। चाहे परीक्षा दें या कोई और शुभ काम, हनुमान जी को याद पहले करते हैं।

आज जो कुछ है हमारे पास बजरंग बली का ही दिया है। अगर उनका आशीर्वाद नहीं होता, तो हम बेकार होते। गाँव के कई लड़के जो हमारे हमउम्र हैं, वे वैसे के वैसे ही हैं, हमने दिल्ली आते समय बजरंग बली का नाम लिया था और कहा कि हे पवनपुत्र! हमें इतनी शक्ति दें कि परेशानियों से लड़ सकूं। हारूँ नहीं, बल्कि अपनी जीत सुनिश्चित करूँ। बात करते-करते 8.30 बज गया। बातचीत को विराम देकर राधा खाना बनाने चली गई और मनीष न्यूज देखने लगा।


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