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ISSN 2292-9754

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07.06.2014


12,
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

"आइडियाज लिखकर दो।" मंत्री जी का विजय को दिया गया यह निर्देश उसके दिमाग से निकल नहीं रहा था। सबसे पहले उसे उस लड़के की याद आई जिसने बिहार के बारे में उसे काफी कुछ जानकारी दी थी। विजय सोचने लगा कि उसके पास अलग अलग विषयों पर विचारों का संग्रह होना चाहिए। इसके लिए सही लोगों को ढूंढना होगा।

हाँ, यह काम जल्द ही करना पड़ेगा। हमें ऐसे लोगों के बारे में पता लगाने का काम अभी से शुरू कर देना चाहिए। फर्स्टली आई शुड कॉल टू माई फादर इन लॉ। नो नो - यह ठीक नहीं है। वीणा पटना में ही है, वह बेकार में परेशान हो जायेगी। उसके घर वालों के बीच इस बात को अभी लाना ठीक नहीं है। दो चार दिनों की बात है। बच्चों की छुट्टियाँ खत्म हो रही है। वह जब यहाँ आ जायेगी तो उससे बात करेगें।

तब तक हमें कोई और विकल्प ढूंढना होगा। इसमें कौन-कौन लोग मदद कर सकतें हैं। मनीष भी इस काम में मददगार साबित हो सकता है। वह उन लोगों से काफी बातें किया करता है, जो नए नए विचारों पर उससे चर्चा करते हैं। वह खुद नहीं तो कुछ दूसरे लोगों के बारे में बता ही देगा। बिहार वाले लड़का का भी फोन नम्बर शायद उसके पास हो।

टेबल पर हाथ पटकते हुए विजय ने कहा- मैं अभी उससे बात करता हूँ। और पास पड़ी अपनी मोबाइल की ओर हाथ बढ़ाया। वह उसका नंबर सर्च करने लगा। तीन-चार बार देखने के बाद भी वह उसे नहीं मिला।

ओह, वह तो फोन रखता ही नहीं है। कल आता है तो मैं उसे डांटता हूँ। कपड़ों पर काफी पैसा खर्च करता है। मोबाइल जो आजकल बेहद ज़रूरी चीज है, वह नहीं खरीद सकता है। छोटे लोगों की यही दिक्कत है। वे प्राथमिकताओं को तय नहीं कर पाते हैं। उलूल-जुलूल की चीजों में खर्च करते हैं लेकिन ज़रूरत की चीजों पर कोई खर्च नहीं करते हैं और ना ही ज़रूरत पर किसी के काम आते हैं। विजय मन ही मन बुदबुदाया।

फिलहाल मैं किसी और का नंबर देखता हूँ। कोई मिल जाए जो मेरे काम आये। मैं उसे फोन कर सकूं। जल्दी में अक्सर सामने की चीज नजर नहीं आती है। वह बार-बार मोबाइल में दर्ज ए टू जेड वाले नामों में अपने दोस्त अरुण का नंबर तलाश करने लगा। लेकिन उसका नाम नहीं मिल रहा है। अंत में परेशान होकर उसने मोबाइल दूर फेंक दिया। और कुछ सोचने लगा।

ऐसी बेचैनी की हालत में उसने राहत की सांस यह सोचकर ली कि आज शाम को विकास फिर से उसके घर आ रहा है। वह उसके साथ रहेगा। दिन में वह अपनी सिस्टर से मिलने गया था। कोई न कोई रास्ता अवश्य निकल जाएगा। यह सोचकर उसने अपने मन को तसल्ली दी। और बैठे-बैठे ही कुछ देर में उसके पलक झपक गई।


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