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ISSN 2292-9754

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07.06.2014


11,
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

अरुण जिस सामाजिक संस्था में काम करता है उसकी ओर से बच्चों को प्रोत्साहित करने के लिए रंगारंग कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इसमें बच्चों को पुरस्कार भी बाँटा गया। कार्यक्रम समाप्त होते ही मुख्य अतिथि सांसद जी वहाँ से चल पड़े। उनके जाने के बाद सभी अतिथिगण में भी जाने की जल्दी हो गई। जब तक वह मौजूद थे सभी उनसे बात करने का मौका तलाश रहे थे।

कार्यक्रम को तैयार करने में संस्था के चेयरमैन ने कड़ी मशक्कत की थी। आगन्तुकों की लिस्ट बनाने में विशेष ध्यान रखा गया था। मीडियाकर्मी, पुलिस अधिकारियों के अलावा छोटे-छोटे सैकड़ों एनजीओ के कारिन्दों को भी बुलाया गया था। एमएनसी के डायरेक्टर फाइनान्स और इन्कम टैक्स ऑफिसर्स को बुलाने पर विशेष ध्यान लगाया गया था। दरअसल, इस कार्यक्रम का मकसद यह था कि भावी योजनाओं के लिए किस तरह पैसे इकट्ठा किया जाय?

चेयरमैन को यह मालूम था कि बाजारीकरण के दौर में केवल सरकार पर निर्भर रहना ठीक नहीं है। सरकारी बाबू की मदद 10 साल पहले तक तो ठीक थी। यदि एक अधिकारी का भी आशीर्वाद मिल जाता था तो दूसरे के पास जाने की कोई ज़रूरत नहीं पड़ती थी। हालात अब बदल चुके हैं। केवल गिफ्ट और कमीशन से संस्था को नहीं चलाया जा सकता है। ना ही धनकुबेरों की दानशीलता ही उसे बचा सकती है। आज संस्था को चलाने और संस्था के पूर्व में अर्जित की गई प्रतिष्ठा को बचाये रखने के लिए कई पापड़ बेलने पड़ते हैं।

चेयरमैन इन बातों का जिक्र संस्था के उच्च ओहदों पर बैठे लोगों से करता था, लेकिन संस्था को लाभ में चलाने के लिए क्या किया जाये इसकी चर्चा नहीं करता था। वह सोचता था कि अगर अपने अनुभवों को वह लोगों के बीच बाँटेगा तो लोग अपनी अपनी संस्था खोलने में लग जाएँगे।
वैसे भी, आज के समय में कई सामाजिक संगठन काम कर रहे हैं। वह उन संस्थाओं पर कड़ी नजर रखता था। साथ ही, इसकी भी पूरी जानकारी रखता था कि कितनी संस्थाएँ बंद हो गई, एवं कितने ब्लैक लिस्टेड हो गये?

वह जब भी कहीं बड़े लोगों के पास जाता तो काम की बातें बाद में करता, पहले इस बात की चर्चा कर लेता था कि कितनी संस्थाएँ पिछले छः महीने में बनी हैं और कितने का वजूद खत्म हो गया। साथ ही, अपनी संस्था को देश के चार-पाँच बड़े नामी-गिरामी संस्था में एक करार देता। सांसद महोदय के विश्वास को भी उसने इसी आँकड़े की जादूगरी से पाया था। एक दिन वह सांसद जी के पास गया और कहा कि साहब आपको एनजीओ से जुड़ी कोई भी जानकारी लेनी है तो मुझसे आप ले सकते हैं। आप भी समाज सेवा का काम करते हैं और मैं भी। हम दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

फर्क सिर्फ इतना भर है कि आपको दुनिया जानती है, और हम बगैर सामने आये काम करते रहते हैं। सांसद महोदय को भी उनकी बातें अच्छी लगीं और उनसे अपने ज्ञान की परीक्षा देने के लिए कहा।

सांसद महोदय यह कह ही रहे थे कि ड्रॉइंग रूम में उनकी पत्नी आ गयी। चेयरमैन ने फौरन भाभी जी कहकर संबोधित करते हुए कहा- भाभी जी जज रहेंगी और जो वह कहेंगी, वह फैसला हम दोनों को मान्य होगा।

उसने कहा कि आप ‘रजिस्ट्रार सोसायटी’ को अभी यहाँ बुलवा लें और मैं जो कहता हूँ वह अगर गलत हो जाये तो आप हमारी संस्था को पैसा न देंगे।

सांसद जी को भी यह मंजूर था।

सांसद साहेब ने रजिस्ट्रार को फोन किया। फोन पर उनकी आवाज सुनकर रजिस्ट्रार साहब फटाफट चले आये। उनके सामने चेयरमैन ने अपनी ज्ञान की पोटली खोल दी और पिछले छः महीने ही नहीं, बल्कि पाँच साल में शहर में कितने सोसायटीज रजिस्टर्ड हुए हैं और ब्लैक लिस्टेड हुए हैं, उन सब का लेखा जोखा रख दिया।

उनके ज्ञान को देखकर रजिस्ट्रार भी हैरान हो गये। बस फिर क्या था?
अब चेयरमैन सांसद के बिल्कुल करीबी हो गये। वे उनसे बराबर पैसा लेते और कार्यक्रम कराते रहते। सांसद साहेब का नाम होता। साथ ही कमीशन भी। बाकी पैसे चैयरमैन अपने उपयोग के लिए रख लेता। कमीशन की बातें उनकी पत्नी से करता। अरुण ने चैयरमैन को सांसद की पत्नी से 10 प्रतिशत कमीशन देने की बात सुन ली भी। आगे भी सांसद का आशीर्वाद बरकरार रहे इसके लिए मिन्नतें करते भी देखा था।

अरुण के लिए यह मंजर बिल्कुल अजूबा था। वह कम्पनियों में फंड के लिए जाता और अधिकारी पूछते कि उनका क्या होगा, तो वह बात समझ नहीं पाता। उसे यह लगता कि उससे यह पूछा जा रहा है कि संस्था को पैसा देने से कंपनी का क्या लाभ होगा। अपनी संस्था के चेयरमैन केा सांसद से सीधे तौर पर कमीशन की बातें करते सुन, पहले तो वह बेहद आश्चर्य में पड़ गया, लेकिन व्यावहारिकता और समय की मांग के आधार पर अपने मन को समझाया। इस ‘ट्रिक ऑफ ट्रेडस’ के बारे में उसके दोस्त हमेशा चर्चा किया करते थे। आज वह इसे समझने की कोशिश कर रहा था।


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