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ISSN 2292-9754

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07.01.2014


10,
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

राधा की बात मान मनीष बिस्तर पर जा लेटा। कुछ देर में राधा भी आ गई। अपने मन में दबी बात कह देने के बाद राधा का गुस्सा खत्म हो गया था। वह क्षण में सो गई। लेकिन मनीष की आँखों में नींद कहाँ? उसका मन अशांत था। उसके मन में कई प्रकार की सोच एक के बाद एक आने शुरू हो गए। सबसे पहले तो उसे यह चिंता सता रही थी कि आखिर सामान किस प्रकार खरीदा जाएगा? मैंने हामी तो भर दी है, लेकिन इतना सारा पैसा कहाँ से आएगा? महीने का अंतिम सप्ताह चल रहा था। लिहाजा, पैसे खत्म होना स्वाभाविक था। मनीष लगभग 10-12 हज़ार रुपये तो कमा लेता था, लेकिन महीने के अंत तक सभी खर्च हो जाते थे।

तनख्वाह का एक तिहाई यानी तीन हज़ार रुपये तो सिर्फ घर के किराए में चला जाता है। पंद्रह सौ रुपए जेब खर्च और बस किराए में चला जाता था। अब बचे 5-6 हज़ार रुपये, जिसमें उसे घर का रसद और अन्य ज़रूरतें पूरी करनी होती थी।

दरअसल, कम पैसे और खर्च अधिक होने पर मनीष पहले भी कई बार सोच-विचार कर चुका था। बावजूद इसके उसे कुछ भी फायदा नहीं हुआ। वह ऑफिस में कॉस्ट कटिंग की बात सुनकर घर में भी कॉस्ट कटिंग सोचता था, लेकिन उसके सभी प्रयास विफल हो जाते थे।

मनीष का एक मात्र शौक चाय और कभी-कभी गुटका खाना था। चाय का पैसा तो ऑफिस में किसी के साथ बैठकर पीने के कारण बच जाता था, लेकिन गुटखा का पैसा खुद खर्च करना पड़ता था। बहुत कोशिश करने पर, वह महीने में दो-तीन सौ रुपये का कॉस्ट कटिंग कर पाता था। लेकिन जिस महीने में वह ऐसा करता, उसके जमीर पर आघात पहुँचता। वह उस पारिवारिक पृष्ठभूमि से था, जहाँ दूसरे को देने की बात होती थी, परंतु लेना स्वाभिमान के खिलाफ माना जाता था। लिहाजा, उसके खर्च कम करने के सारे प्रयास एक या दो महीने में सिफर साबित होते।

दिल्ली जैसे महानगर में दस हज़ार रुपये का क्या मोल है? इस बात से वह बखूबी परिचित था। इसी ख्याल से उसने दिल्ली के बाहरी इलाके में कम किराये वाला मकान लिया था। शुरू के दिनों में तो वह महीने में 2000 बचा लेता था और उसे बैंक में जमा कर देता था। परंतु अब यह भी संभव नहीं था।

महंगाई की वजह से पैसे बचा पाना संभव नहीं था। कुछ हद तक पैसे की कमी की वजह से वह राधा के साथ बाहर घूमने नहीं जा पाता था। वह सोचता था कि अगर दोनों बाहर गये तो पैसे खर्च होंगे। एक दिन की जो छुट्टी मिलती है वह भी भाग-दौड़ में खत्म हो जाएगी। वह ना-नुकूर कर के घर में ही रहना पसंद करता था।

वह पत्नी के दूसरे रूप से आज जब परिचित हुआ तो उसे गहरा धक्का लगा। मनीष सोचने लगा कि उसे कम से कम दिल्ली का दर्शन ज़रूर ही कराना चाहिए था। मेरी गलती है। दूसरे पल दिमाग में दूसरी बातें भी आने लगी। मैं राधा की इच्छाओं को पूरा करना चाहता हूँ और जहाँ तक मुझसे संभव हो पाता है, वह करता ही हूँ। लेकिन उसकी सभी इच्छाएँ पूरी नहीं कर पाता हूँ तो इसमें मेरा दोष क्या है?

दरअसल, परिस्थिति ही ऐसी बन जाती है कि मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर पाता हूँ। मंत्री-कार्यालय में काम करना क्या आसान है? अफसर का दबाव, मंत्री का डर हमेशा बना रहता है। जॉब बचा लेना ही क्या कम बड़ी बात है? मैं ऑफिस से कहीं बाहर भी नहीं जाता हूँ। ऑफिस में काम करता रहता हूँ और शाम में सीधे घर चला आता हूँ। क्या करूँ? अफसर जब मंत्री के घर भेजेंगे तो जाना पड़ेगा ही। मैं खुद तो जाना नहीं चाहता हूँ। हाँ, कभी-कभार समय रहने पर विजय बाबू के पास बैठ जाता हूँ, क्योंकि वह प्यार से बैठा कर थोड़ी बहुत बातचीत कर लेते हैं। उन्हीं से कुछ सीखने का मौका भी मिलता है। सीखने में क्या बुराई है? आज मेरे पास कम्प्यूटर का नॉलेज है तो विजय बाबू के कारण ही। अगर वह अपने कम्प्यूटर पर काम नहीं करने देते तो मैं कुछ भी नहीं सीख पाता! आज मैं तो केवल लेटर डिस्पैच का काम ही जान पाता। दुनिया बदल रही है, कम्प्यूटर के बिना कोई काम नहीं चलेगा।

अरे, हम अपने दोस्त से उस दिन के बाद तो चैट भी नहीं कर पायें। कल करूँगा।


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