अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
07.01.2014


08,
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

राधा को मनाने में मनीष को एक घंटे से भी अधिक समय लग गया। मानने के बाद राधा ने अपनी फरमाइशों की फेहरिस्त मनीष के सामने रखी, जिसकी उसे कतई आशा नहीं थी। रविवार का दिन था। राधा और मनीष दोनों ने खाना खाकर फिर से आपस में बातचीत करनी शुरू कर दी। इधर-उधर की दो-चार बातें करने के बाद राधा ने यह कहकर अपनी बात रखी की कि कैसे घर को ठीक करना है।

"मनीष सुनो।", राधा बीच में बोली।

मनीष अचानक सकपका गया। अब तक ये ‘जी’ बोलने वाली राधा सीधे मनीष कह कर संबोधित कर रही है।

"हाँ बोलो राधा, मेरी डार्लिंग," संभलते हुए मनीष बोला।

"यस गुड, आइ एम योर डार्लिंग। कीप इट अप," राधा फट से बोल पड़ी। राधा यह वाक्य हर दिन बगल में रहने वाली रानी को बोलते हुए सुनती थी। रानी और राधा आस-पास के फ्लैट में रहती हैं। रानी ने इंगलिश स्पीकिंग कोर्स ज्वाइन किया है और पिछले एक महीने से जो पाठ उसे पढ़ाया जाता है, उसे वह अक्सर घर में दोहराती रहती है।

मनीष बोला, "हाँ, माई डार्लिंग। बोलो। कैसे घर को सजाना है?"

"देखो, तुम्हें टाइम तो मिलता नहीं है। यदि समय बचता भी है तो तुम कुछ-न कुछ काम का बहाना बनाकर बाहर चले जाते हो। पता नहीं क्या-क्या करते रहते हो? संडे के दिन भी। कोई मिल गई होगी। कोई बात नहीं।"

"हाँ मिल गई है। उसका नाम जानना चाहोगी", केवल चिढ़ाने के लिए मनीष ने कहा।

राधा ने बोला तो, "कोई बात नहीं।" लेकिन यह सुनकर तुरंत उबल पड़ी। उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। ज्यादातर महिलाएँ स्वभाव से शंकालु व ईर्ष्यालु होती हैं। दूसरी महिलाओं के बारे में सुनना वे पसंद नहीं करती हैं। शायद पुरुष भी शंकालु व ईर्ष्यालु होते हैं लेकिन अपने ऊपर कंट्रोल करना जानते हैं। राधा ने टोकते हुए कहा, "ऐसा करोगे तो बता देना, मुझे ये सब थोड़ा भी पसंद नहीं है। खैर, मैं बोल रही थी कि तुम्हारे पास समय नहीं होता है। इसलिए एक डीवीडी ले लो। हमारे पास टीवी तो है ही, जबतक तुम घर वापस नहीं आओगे तबतक मैं सिनेमा देखती रहूँगी, सीरियल देखते देखते बोर हो चुकी हूँ।

हाँ जानते हो, डीवीडी ठीक है इसमें डीवीडी भी चलती है, सीडी भी चलती है और पेनड्राइव भी। ठीक है न, और भी कई सुविधायें हैं। कंपनियाँ कई तरह की ऑफर भी देती हैं।"

मनीष को इन सभी चीजों की कतई उम्मीदें नहीं थी। वह चुपचाप सुन रहा था और राधा के ज्ञान को देखकर कुछ अचंभित भी हो रहा था।

"तुम अकेले मत लाना, तुम्हारी पसंद मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है। देखो न ऐसा सोफासेट उठा कर ले आए हो कि पूरे घर को ही छेक लिया। चलने की भी जगह नहीं है। हम जगह और अपनी आवश्यकताओं के अनुसार उसे बनवाते।"

मनीष ने राधा के ज्ञान को परखने के लिए पूछा, "पेन ड्राइव का क्या काम है?"

"हाँ। पेन ड्राइव का मुझे तो कोई काम नहीं है, लेकिन तुम्हें तो ज़रूरत पड़ती ही होगी। रानी के पति तो घर में भी पेन ड्राइव लाते हैं। उसमें सारे फाइल्स, फोटो आ जाते हैं। तुम भी घर में ऑफिस के कुछ काम निपटा सकोगे। लैपटॉप की तरह वह बड़ा नही होता है। वह पॉकेट में आ जाएगा। बस अंगुली भर होता है। तब लैपटॉप की कोई ज़रूरत नहीं पड़ेगी।"

मनीष आज सुबह के झगड़े और उसके बाद चले मान-मनौव्वल में लगे समय की वजह से बात को और अघिक बढाना नहीं चाहता था। इसलिए वह चुपचाप सुनता जा रहा था।

राधा आगे बोली, "अगर हम खरीदारी कर रहें हैं तो क्यों न होम थियेटर खरीद लें? उसमें भी ज्यादा पैसा नहीं लगेगा। आजकल डीवीडी प्लेयर के साथ ही होम थियेटर आ रहे हैं। इसके साथ 3 या पाँच स्पीकर लग जाते हैं तो साउंड क्वालिटी काफी बढिया हो जाती है। तेज आवाज नहीं होना चाहिए। मूड बिगड़ जाता है।"

वैसे डीवीडी प्लेयर 1000 रुपये में ही मिलना शुरू हो जाता है, लेकिन होम थियेटर के साथ तीन-चार हज़ार रुपये में मिल जाएँगे। ज्यादा से ज्यादा 6-8 हज़ार रुपये लगेंगे।

"क्या कहते हैं जी? ठीक है ना, आज ही शाम को चलते हैं और उसे खरीदकर ले आते हैं। राधा प्यार से मनीष के सर पर हाथ फेरते हुए बोली।" मनीष ने भी हामी भर दी, "हाँ चलते हैं।" उसके पास दूसरा कोई विकल्प भी नहीं था। राधा पहले ही बोल चुकी थी, उसे दो साल से एक नौकरानी की तरह ट्रीट किया जा रहा है। उसकी इच्छाओं का सम्मान नहीं किया जाता है।" हामी मिलने के बाद राधा बोली, "हाँ एक बात तो मैं भूल ही गई थी।

देखिए टीवी स्टैण्ड भी बढिया वाला आ जाए तो ठीक रहेगा। वह भी देख लेंगे। अगर ठीक-ठाक मिल जाएगा तो ले लेंगे।"

"चलिए जी। अब चलकर थोड़ा आराम कर लें, फिर छह बजे खरीदारी के लिए घर से निकलेंगे।"


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें