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ISSN 2292-9754

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07.01.2014


07,
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

मंत्रीजी विजय का इंतजार कर रहे थे। उन्हें बाहर निकलना था, इसलिए वह काम को जल्दी निपटाना चाहते थे। विजय उनके घर आधे घंटे देर से पहुँचा।

उन्होंने आते ही विजय की क्लास लगा दी।

"आज रविवार है, आपको ट्रैफिक का सामना तो नहीं करना पड़ा होगा।" मंत्री जी ने पूछा।

"ना, आज ट्रैफिक नहीं है, बस ...।", झेंपते हुए विजय आगे कुछ नहीं बोल सका। लेकिन विजय को ग्लानि ज़रूर हुई। वह मंत्री जी के सामने अपनी छवि को अच्छा बनाकर रखना चाहता था। दरअसल, अभी उसकी नियुक्ति संपुष्ट नहीं हुई थी। अभी हाल ही में नई सरकार बनी है और मंत्री जी उन्हीं अधिकारियों से काम चला रहे थे, जो पिछले मंत्री के साथ थे।

विजय को यह डर सताने लगा था कि कहीं मंत्रीजी नाखुश हो गए तो उसे अपने मूल विभाग में जाना होगा। पता नहीं उसका ट्रान्सफर कहाँ कर दिया जाएगा।

वह पिछले आठ साल से मंत्री के साथ काम कर रहा है। एन डी ए को हराकर जब यूपीए सरकार 2004 में बनी थी, तब भी उसे यही डर था। लेकिन उस समय वह जोड़-तोड़ कर अपने पद पर बरकरार रहने में सफल हो गया था। कांग्रेस को सहयोगी दलों की ज़रूरत थी। वे ऊँचे ओहदे पर आसीन अपने सगे-संबंधियों के मार्फत सहयोगी दल के मंत्री का विश्वास प्राप्त करने में कामयाब रहा था। इस बार कांग्रेस की स्थिति मजबूत है और सहयोगी दलों पर उसकी निर्भरता कम है, लिहाजा यह डर अधिक है कि कहीं उसकी पैरवी कमजोर न पड़ जाए।

इस तरह की आशंका के बावजूद विजय मंत्रीजी को ब्रीफ करने लगा। मंत्री जी चुपचाप सुन रहे थे और फाइल पर दस्तखत करते जा रहे थे। यहाँ पर पिछले आठ साल का अनुभव विजय को काम आ रहा था। विजय को पिछले एक महीने में कम ही मौका मिल पाया था जिसमें वह अपनी बातों को बेखौफ होकर उनके सामने रख पाया हो। आज उसने अपने ज्ञान से मंत्री जी को प्रभावित करने की सोची और कुछ राय भी देने शुरू कर दिये। एक-दो बार तो मंत्रीजी ने उसकी बात गौर से सुनी। पर कुछ देर बाद उन्होंने यह कहकर टाल दिया, "ठीक है आप अपनी विचारों को लिखकर बाद में दें।" मंत्रीजी के पास लोगों को समझने की अदभुत शक्ति थी। वे तुरंत किसी से प्रभावित नहीं होते थे। आखिर 30 साल का लंबा राजनीतिक अनुभव है। किसी भी निर्णय पर पहुँचने के पहले वे ठोक बजा कर सबकुछ देख लेना चाहते हैं। इसलिए विजय की बातों को भी वे टाल गये।

वे बखूबी जानते हैं कि प्राइवेट सेक्रेटरी यानी पीएस की भूमिका अहम् होती है। वह मंत्री को बना भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है। एक अच्छा पीएस मंत्री की सफलता की महत्वपूर्ण कड़ी होता है।

मंत्री अपने काम को अच्छे से निष्पादन के लिए 16 से 25 स्टाफ तक रखते हैं। वे अब तक दो एपीस और दो पीए रख चुके हैं। अन्य लोगों को अभी रखना बाकी है। वह योग्यता के आधार पर अपने स्टाफ को रखना चाहते हैं ताकि मंत्रलय का कार्य अच्छी तरह स संपन्न हो सके। इसलिए वे निर्णय लेने में जल्दबाजी नहीं कर रहे हैं।

हालांकि उनके पास हर दिन कई उच्च अधिकारी आकर मिल रहे हैं और अपनी योग्यताओं का बखान कर रहे हैं। कुछ के पास पैरवी है। कुछ तो हाईकमान की सिफारिश लेकर भी आए हैं। बावजूद इसके मंत्रीजी अब तक कोई निर्णय नहीं ले पाये हैं। वह अभी सोच-विचार ही कर रहे हैं। वे केवल दो बातों पर ध्यान दे रहे हैं। एक जो पैसा कमाकर देने की बात करता है, उसे सूची से हटा दो। दूसरा जो आम आदमी के सरोकार की बात नहीं करता है उसे अपनी टीम में जगह नहीं देनी है।


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