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ISSN 2292-9754

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07.01.2014


06,
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

अरुण स्वयंसेवी संस्था में काम करता है। उसकी सोच धरातल से जुड़ी हुई है। वह अपने आप को जोड़कर रखना भी चाहता है क्योंकि अब उसके पास यही एक रास्ता भी है जिससे वह समाज में प्रतिष्ठा पा सकता है। पहले तो उसने आई.ए.एस. बनने के लिए खूब पढ़ाई की लेकिन जब उसमें सफल नहीं हो पाया तो उसने एन जी ओ का दामन थाम लिया। उसके कुछ मित्र आई.ए.एस. में सफल भी हो गए थे। वे अब ऊँचे पदों पर आसीन हैं। उनकी मदद से ही अरुण की एन जी ओ भी चल पड़ी है। अफसरों की मदद के अतिरिक्त वह खुद भी पढ़ा लिखा है, साथ ही उसे अपनी बातों को रखने और उसे मनवाने की कला भी समय के साथ खूब आ गई है।

लेकिन ऐसा एकाएक नहीं हुआ है। इसको पाने में उसे 6-8 साल का समय लग गया। अरुण ने करियर की शुरुआत एक बड़े एनजीओ से की। उसने पहले सोचा था कि संस्था वाले उससे पढ़ाने लिखाने का काम लेंगे। स्नातक तक वह साइंस का छात्र था। अच्छा विद्यार्थी था। अपने विषय पर उसका कमांड था। इसी वजह से उसने आईएएस की परीक्षा में बैठने का मन बनाया था। परिश्रम भी किया लेकिन अंततः सफल नहीं हो सका।

उसकी इच्छा के विरुद्ध संस्था वालों ने उसे फंड उगाही का काम उसके जिम्मे कर दिया था। सुबह से शाम तक वह एक से दूसरी कंपनी में जाता रहता, लेकिन वह फंड उगाहने में असफल रहता। वह मन मसोस कर रह जाता।

रात में घर आता तो थकान की वजह से नींद आ जाती परंतु बीच रात में अचानक उसकी नींद खुल जाती। जिस तरह की बातें और अपमान उसे झेलने पड़ते थे वह उसकी कल्पना से परे था।

अब तक वह बाहर की दुनिया से अनजान था। घर पर रहता था और पढ़ाई में मन लगाता था। बाहरी कार्यों का किस प्रकार निष्पादन किया जाता है, वह इससे अनभिज्ञ था। यहाँ तक कि सब्जी वाले भी उसे मूर्ख बना देते थे। अरुण को इस बात का ज्ञान था कि उसमें व्यावहारिकता का अभाव है, लिहाजा उसके अन्य दोस्तों ने आई.ए.एस. में असफल होने के बाद बैंक, पत्रकारिता में रास्ता बनाने का निर्णय लिया, तो अरुण ने सामाजिक कार्य करने के लिए एनजीओ में अपना करियर तलाशा। उसे लगता था कि सोशल सेक्टर में प्रतियोगिता कम है क्योंकि आज के समय में कोई भी व्यक्ति सामाजिक कार्य नहीं करना चाहता है। भौतिकवादी युग में सभी पैसे के पीछे भाग रहे हैं। एनजीओ में वह शांति से काम करेगा और लोगों के उत्थान में उसका योगदान करेगा। एनजीओ में काम करना शुरू किया तब उसे वास्तविकता की समझ हुई। एनजीओ की कार्यप्रणाली की पूरी समझ तो नहीं हुई, लेकिन कुछ ही महीनों में उसे इतना समझ में आ गया कि यहाँ भी धूर्त, चालाक और पैसा बनाने वालों का बोलबाला है। लेकिन उसका विश्वास नहीं टूटा था। वह अरुणा राय, राजेन्द्र सिंह जैसे लोगों की जीवनियाँ पढ़ता और उनसे प्रेरणा लेता। सही मायने में समाज के उत्थान के लिए त्याग करने वाले लोगों को वह अपना आदर्श मानता।

एनजीओ में काम करते करते अरुण को छह माह बीत चुके थे। वह एनजीओ की दुनिया को काफी समीप से देख और समझ रहा था। हर दिन अपमान से आहत होने के बाद भी अरुण की हिम्मत बुलंद थी। वह यह सोचता कि जो लोग सम्मान के लायक खुद नहीं हैं, वे समाज के दबे कुचले लोगों को सम्मान कैसे दिला पाएँगे! इन्हें तो दूसरों को सम्मान देना ही नहीं आता। ये लोग दिन के उजाले में कुछ करते हैं और रात के अंधियारे में कुछ और।

वह अक्सर देखता कि संस्था सामाजिक उत्थान के नाम पर एक दो सेमिनार कराती जिसमें शहर के गणमान्य व्यक्तियों को बुलाया जाता। उन्हें माला से लाद दिया जाता। संस्था के चेयरमैन डिक्शनरी में उपलब्ध वाहवाही के सारे शब्दों को उनके सम्मान में प्रयोग कर लेते। बच्चे भी यह सब देखते रहते और तालियाँ बजाते। वे इन सभी बातों से बिल्कुल अंजान रहते कि यह सब क्यों हो रहा है? और किसके लिए?

ऐसे ही एक कार्यक्रम में अरुण की ड्यूटी अतिथियों का स्वागत कर मंच पर बिठाने के लिए लगाया गया। वह सभी को रिसीव करता और उनका हंसकर अभिवादन करता। फिर उन्हें ले जाकर मंच पर बिठा देता। यह सिलसिला रात के 6 से 10 बजे तक चलता रहा। इस कार्यक्रम में सभी कुछ हुआ। रंगारंग कार्यक्रम से लेकर पुरस्कार वितरण तक।

अंत में खाने का भी कार्यक्रम था। जब सभी लोग भोजन का स्वाद लेने में लगे थे, संस्था के चेयरमैन और मुख्य अतिथि सांसद साहब की पत्नी एक कोने में आपस में बातें कर रहे थे। संयोगवश, अरुण भी पीछे खड़ा था। जो बातें उसे सुनाई पड़ी, उससे उसकी आँखें खुल गई।


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