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ISSN 2292-9754

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07.01.2014


05,
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

घर पहुँचने पर मनीष काफी थक चुका था। उसने किचन से स्वयं खाना लेकर खाया और सोने चला गया। राधा गुस्से में थी। उसने दरवाजा तो खोल दिया लेकिन खाना परोसने के लिए कोई जहमत नहीं उठाई।

मनीष को यह समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर वह किस चीज को लेकर गुस्सा में है। थोड़ी देर के बाद वह सो गया।

उसकी पत्नी को यह और नागवार गुजरा। दिल्ली में रहते-रहते उसे भी तीन साल हो चुके थे। पड़ोसियों से बातचीत और टीवी सीरियल देखकर उसमें भी बदलाव आने लगे थे। वह भी यह उम्मीद रखती थी कि उसके पति भी वही सबकुछ करे, जो टीवी में दिखाया जाता है। उसे मनाए, शनिवार को बाहर खाना पर ले जाए, रविवार को सिनेमा दिखाए, या घुमाने ले जाए।

उसके मन में इन बातों का प्रवाह तो पहले से ही आना आरम्भ हो चुका था, लेकिन अभी ग्रामीण संस्कार कुछ बचे हुए थे, जिसकी वजह से वह मुंह नहीं खोलती थी। लेकिन मनीष के व्यवहार से आज वह बेहद दुखी हो गई और कल लड़ाई करने का पक्का मन बना लिया।

मनीष ने रात तो आराम से नींद में गुजार दी, लेकिन सुबह होते ही ओले पड़ने शुरू हो गए। राधा के गुस्से के गुब्बार फूट पड़े थे। मनीष को चाय तो मिली लेकिन इस ताने के साथ कि मुझे अब यहाँ नहीं रहना है। आज ही मेरा टिकट कटवा दो। मैं घर चली जाऊँगी।

मनीष आरम्भ में चुप था, पर बात जब बढ़ती़ गई तो उसने पूछा, "क्या हुआ, बात तो बताओ।"

"नहीं... नहीं... मुझे यहाँ नहीं रहना है। मेरी जिंदगी नरक हो गई है। मैंने क्या सोचा था, क्या हो गया? मैं दिन भर इतने छोटे-से घर में अकेली रहती हूँ, खुद तो जाकर बड़े ऑफिस में स्वर्ग का आनन्द लेते रहते हो। राधा धाराप्रवाह बोलते जा रही थी। लेकिन किस बात को लेकर गुस्से में थी, वह बता नहीं रही थी। मनीष बातों को समझने की लगातार कोशिश कर रहा था फिर भी राधा अनाप-शनाप बक रही थी। सही बात नहीं बता रही थी। स्वभावतः महिलाओं से जब तक विषय-वस्तु पूछते रहो तो वे नहीं बताएँगी। मनीष ने यह सोचा और अंत में कपड़ा पहनकर बाहर जाने लगा-तब राधा को लगा कि बात बता देना ही अच्छा है। वह बोलने लगी कि मुझे दिल्ली में रहते हुए तीन साल हो गए हैं लेकिन दो बार भी हम कहीं बाहर घूमने नहीं गए है। सिनेमा देखना तो दूर की बात है। जब रविवार को बाहर घूमने चलने बोलती हूँ तो आपको अपने दोस्त यार से ही फुर्सत नहीं मिलती। कल जब मेरे भाई के बेटे का जन्म दिन था तो आपने जान बूझ कर घर आने में देर कर दी। मैं सोच रही थी कि आठ बजे जब आप घर लौट आएँगे तो दोनों साथ मिलकर मायके फोन पर बात करेंगें।

अब मनीष को बात समझ में आ गई कि आखिर गुस्से की वजह क्या है। अब तक शांत रहनेवाली राधा अचानक इतने गुस्से में क्यों है। बात को और अधिक बिगड़ते देख, वह तुरंत उसे सम्हालने की कोशिश करने लगा। राधा ने भी अपनी बात पूरी कर ली थी। वह भी अब धीरे-धीरे शांत होने लगी।


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