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ISSN 2292-9754

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07.01.2014


04,
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

विजय और विकास रात में भोजन करने के बाद परिवार के सदस्यों, समाज व देश के बारे में देर तक बातचीत करते रहे। बातचीत करते-करते ही वे लोग सो गए। अगले दिन सुबह उठकर नित्यक्रिया के बाद दोनों फिर से चाय-नाश्ता के टेबुल पर मिले। विकास दो वर्षों के बाद दिल्ली आया था। इसलिए सुबह-सुबह ही उन दोनों का कॉलेज का दोस्त अरुण भी उनसे मिलने विजय के घर पहुँच गया। दोनों आपस में बातें कर ही रहे थे कि आते ही अरुण ने कहा, "हाँ देशप्रेमियों! कैसे हो! दरअसल कॉलेज में पढ़ते वक्त दोनों के बीच देश के विकास की कई अवधारणाओं पर चर्चा होती थी और यह बात सभी को मालूम थी। कई बार उनकी चर्चा शुरू होती, तो खत्म ही नहीं होती, घंटों तक खिंचती जाती। आज जब कई वर्षों के बाद तीनों एक साथ मिले, तो देशप्रेमियों कह कर संबोधित करने से पुराने दिनों की यादें ताजा हो गईं। इस बार यादों के साथ अनुभव के पुट भी थे जो इनकी बातों, विचारों को दिशा दे रहे थे। शुरुआती कुशल-क्षेम के बाद तीनों में चर्चा शुरू हो गई। विकास ने अरुण को पेटप्रेमी कहकर खाने के बाद चिढाने की कोशिश की तो, बातचीत एक नई दिशा में मुड़़ गयी।

"अरूण, हम सभी पेटप्रमी हैं। क्यों यह सही नहीं है कि हम सब सिर्फ अपना पेट भरने के लिए ही अलग-अलग रह रहे हैं? आखिर हम तनी दूर नौकरी करने के लिए क्यों जाते हैं?"

टोकते हुए विकास ने कहा, "यह सच नहीं है। अब जब हम घर से बाहर निकल चुके हैं, तो देश का विकास भी गति पकड़ चुका है। सामाजिक सरोकार से पहले हम जकड़े हुए थे। यदि हमें अन्य देश की तरह आर्थिक प्रगति करनी है तो भावनात्मक बातों को तिलांजलि देनी होगी, वरना हम जहाँ थे, वहीं के वहीं रह जाएँगे। भारत विकास के पथ पर आज अग्रसर है। दुनिया भर में भारत की चर्चा हो रही है। विकसित देश भारत की ओर रुख कर रहे हैं।

अरुण ने भी हाँ में हाँ भरी। उसने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, "क्या हम सही दिशा की ओर बढ़ रहे हैं? मुझे तो यह समझ में नहीं आता है कि आखिर विकास है क्या? देश का कौन विकास करता है? जनता करती है या सरकार।" अरुण ने विकास को टोका, "जनता करती है या सरकार का क्या मतलब।"

"मतलब साफ है" अरूण ने जोर देकर कहा। आगे अपनी बातों को मजबूती से रखने का प्रयास करते हुए बोला, "देखो दोस्त, सन् 1991 में जब वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने उदारीकरण कर देश को सरकारी बाबुओं के चंगुल से छुड़ाया तो लोगों ने उनकी खूब तारीफ की। पिछले 20 वर्षों में देश के बहुत सारे नौजवानों को नौकरी भी मिली। वे देश से बाहर जाकर अच्छी नौकरी करने लगे। देश का नाम रौशन किया।"

"वाकई इसमें कोई शक नहीं है।", विकास ने कहा।

"शक हो भी कैसे? अब देखो जब अमरीका आर्थिक मंदी के गिरफ्त में है, लोगों की नौकरियाँ जा रही हैं, भारी संख्या में लोग बेरोजगार हो रहे हैं और अपने घर की ओर लौट रहे हैं। ऐसे हालात में सरकार कुछ भी नहीं कर पा रही है।"

विजय बोला, "आखिर तुम कहना क्या चाहते हो? अरुण, कम टू द प्वाइंट।"

"हाँ, यही समस्या है। घैर्य नहीं है। मैं प्वाइंट पर आ रहा हूँ। आज हमारे बाबू लोग कम टू द प्वाइंट बात करने को कहते हैं, लेकिन वे करते वही हैं जिससे उनका खुद का प्वाइंट बने।"

अरुण के इस अंदाज में विजय को घेरने पर विकास ने जोरों का ठहाका लगाया और शाबाशी देते हुए अरुण को अपनी बात आगे बढ़ाने को कहा।

"हाँ, मैं क्या कह रहा था, विकास?"

याद आया बाहर के देशों में अपने यहाँ के नौजवान जब काम कर रहे थे तब तो अच्छी बात थी। लेकिन अब जब उनकी नौकरी जा रही है। वे भारत वापस आ रहे हैं तो उनके लिए कुछ करने की बात कोई नहीं कर रहा है। विजय ने फिर टोकते हुए कहा, "क्यों, उनमें से कुछ को तो तात्कालिक प्रधानमंत्री के उम्मीदवार लाल कृष्ण आडवाणी ने तो नौकरी दे ही दी थी, भले ही वे फिर से बेरोजगार हो गए।"

विकास ने उत्सुकतापूर्वक पूछा, "क्या आडवाणी ने नौकरी दी थी? जरा विस्तार से बताओ विजय।"

"हाँ, अरे बात यह थी कि आडवाणी जी की टीम अमेरिका में ओबामा के राष्ट्रपति बनने पर काफी उत्साहित थी, उन लोगों ने भी भारत में उसी तर्ज पर चुनाव अभियान आरम्भ कर दिया।

"ठीक है लेकिन नौकरी दी थी का मतलब?" विकास ने पूछा।

"आडवाणी को मनमोहन सिंह के विकल्प के तौर पर पेश करने के लिए, उनकी टीम ने चुनाव के समय कई नये प्रयोग किए। सबसे पहले तो अपनी छवि को ठीक करने के लिए आडवाणी ने अपनी आत्मकथा लिखी। जिसमें कई तथ्यात्मक भूलों के कारण उनकी काफी किरकिरी हुई। फिर उन्होंने ‘बेव पोर्टल’ लांच किया। इस पर भारी भरकम रकम खर्च की गई। वैसे तो आडवाणी जी खुद टेकसैवी हैं, लेकिन इस बार उनसे भूल हो गई। खैर यह दूसरा पक्ष है, इसके बारे में बाद में बताऊँगा। अभी हमें मंत्री जी के घर जाना है, इसलिए संक्षेप में बता दूं कि उन्होंने अपने ‘वेब पोर्टल’ के जरिए वॉलिनटियर आमंत्रित किये और टेकसेवी लोगों का एक ग्रुप तैयार किया। ‘पोर्टल’ के जरिए कई आआईटी, आई आई एम से पास प्रोफेशनल उनसे जुड़ गए।

"हाँ हाँ यह खबर मैंने भी पढ़ी थी, अखबारों में। और टीवी पर भी सुना था लेकिन इस बारे में विशेष नहीं जानता हूँ। विकास ने कहा और आगे जानने की कोशिश की। लेकिन विजय ने अपनी बात यह कहते हुए खत्म कर दी कि वे सारे प्रोफेशल्स उन्हें लेकर डूब गए। पार्टियाँ वॉलिनटियर से नहीं कार्यकर्ताओं से चलती है। इसके बारे में विस्तार से बाद में बताऊँगा।"

विजय की ये सभी बातें अरुण और विकास चुपचाप सुनते रहे। जब वे हटने लगे तो अरुण ने कहा, "देखा तुमने, अपने यहाँ के बाबू को। वे अपने सामने तो किसी को न बोलने देते हैं और ना ही दूसरे के विचारों को जानने की कोशिश करते हैं। मेरे द्वारा शुरू की गई बहस-विकास कौन करता है? सरकार करती है या जनता वहीं का वहीं रह गया।

"ठीक है, ठीक है, इस पर विस्तार से चर्चा शाम को करेंगे।" विजय ने यह कहकर सभा खत्म कर दी।


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