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ISSN 2292-9754

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07.01.2014


03,
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

विजय को विकास की ये सभी बातें जरा भी अच्छी नहीं लग रही थीं। बीच में ही उसने टोकते हुए कहा, "नहीं-नहीं ऐसा नहीं है। मैंने तो केवल इसलिए पूछा क्योंकि मेरे ऑफिस में काम करनेवाला एक लड़का मनीष ने मुझसे यह प्रश्न किया था। उस समय मैं उसे कोई जवाब नहीं दे पाया था।"

मनीष को आज ऑफिस से घर लौटने में देर हो गई। रात के करीब 12.30 बज चुके थे। वैसे वह रोजाना 9 बजे तक घर पहुँच जाता था, लेकिन आज लेट होने की वजह हैवी ट्रैफिक थी। केंद्रीय सचिवालय से वैशाली की दूरी लगभग 20 किमी है लेकिन अचानक वर्षा होने की वजह से सड़कों पर हर जगह गाड़ियों की रफ्तार रुक-सी गई थी। प्रगति मैदान से नोएडा मोड़ के पाँच-छह किलोमीटर की दूरी तय करने में ही उसे 1.45 का समय लग गया। इसके बाद गाजीपुर रेडलाइट पर लगे भारी जाम को पार करने में उसे 50 मिनट लग गए। बस पर बैठे-बैठे वह क्रोधित हो रहा था। गुस्से की खास वजह नहीं थी। पाँच साल रहने के बावजूद वह दिल्ली शहर में अपने आपको एडजस्ट नहीं कर पाया था। यहाँ की सड़कों पर भारी भरकम भीड़ और भाग-दौड़ की जिंदगी में वह अपने को अब तक फिट नहीं कर सका था। इस समय वह मन ही मन सरकार को कोस रहा था और उसे निकम्मी करार दे रहा था।

मंत्री-कार्यालय में काम करने की वजह से उसे न सिर्फ कई लोगों से मिलने-जुलने का मौका मिलता था, बल्कि सरकारी काम काज के तौर-तरीके को भी वह खूब समझने बूझने लगा था। वह दफ्तर में काम करने वाले बाबुओं के व्यवहार से भी परिचित हो चुका था। भारत सरकार में कार्यरत होने की वजह से वह राज्य सरकारों को और भी अक्षम मानता था।

जैसे-जैसे समय बीत़ रहा था। उसके अंदर कई तरह के भाव पैदा हो रहे थे। दिल्ली में नौकरी कर अब वह पछताने भी लगा था। सोचते-सोचते मनीष को अपने पुराने दिनों की याद आ जाती है। गाँव में घर से उसके स्कूल की दूरी 5 किमी थी। इस दूरी को वह पैदल 40 मिनट में तय कर लेता था। सुबह व शाम उसकी यही दिनचर्या थी।

वह स्कूल में मन लगाकर पढ़ता और घर जाकर भी पढ़ाई करता था, फिर भी उसे थकान महसूस नहीं होती थी। वह हमेशा तरो-ताजा महसूस करता था। लेकिन मन में इस बात की कसक ज़रूर रहती थी कि स्कूल गाड़ी से जाते तो अच्छा रहता, वह शहरों में मिलनेवाली सुविधाओं के लिए हमेशा लालायित रहता था। मनीष एक सामान्य परिवार से था इसलिए वह गाड़ी से स्कूल नहीं जा पाता था। हाई स्कूल की परीक्षा पास करने के बाद वह नौकरी की तलाश में दिल्ली चला आया। सौभाग्य से उसे यहाँ नौकरी मिल गई और उसकी संघर्ष यात्रा शुरू हो गई।

मनीष के गाँव के ही एक सज्जन दिल्ली में रहते थे। वे एक फैक्ट्री में काम करते थे। मनीष भी गाँव से उनके साथ फैक्ट्री में काम करने की सोच के साथ दिल्ली आया था। इलाके के ही एक व्यक्ति जो दिल्ली में बड़े अधिकारी थे उनके घर भी उसने आना-जाना शुरू कर दिया। उनकी कृपा से ही कुछ दिनों के बाद मंत्रलय में डॉटा इंट्री व लेटर डिस्पैच करने की नौकरी मिल गई। वह पिछले चार साल से मंत्री कार्यालय में काम करने के तरीके और बाबुओं को रौब झाड़ते देख रहा है। वह भी उनके जैसा बनना चाहता है और उनके व्यवहार व विचारों को भी अपनाने की कोशिश कर रहा है। साथ ही अपनी सोच को वृहद आयाम देने के लिए पढ़ाई भी करता रहता है।


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