अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
07.01.2014


1,
नया सवेरा
स्मिता, अमरेन्द्र

"नमस्कार, आप कैसे हैं? क्या चल रहा है?" पंकज लगातार कई दिनों से गुगल चैटबॉक्स मे यह लिखकर अपने दोस्त के साथ चैट करने की कोशिश कर रहा था। हर दिन वह कोशिश करता था लेकिन उसे कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलती थी। आज जब कुछ लिखा देखा तो वह प्रफुल्लित हो गया और अपने दोस्त का हाल-चाल जानने के लिए आतुर हो गया।

"मैं ठीक हूँ। सब ठीक चल रहा है। तुम कैसे हो? मैं भी पिछले कई दिनों से तुमसे चैट करने की कोशिश कर रहा था। लेकिन क्या करूँ?" मनीष ने अपनी व्यथा व्यक्त की।

तकरीबन बारह हज़ार किलोमीटर की दूरी पर न्यूयार्क में काम कर रहे पंकज को मनीष का यह उत्तर अटपटा लगा। उसने तुरंत पूछा, "क्या सब ठीक-ठाक तो है, क्या करूँ का मतलब?"

मनीष के साथ पंकज चैट के ज़रिये घर-परिवार, दोस्तों व अपने देश भारतके बारे में खूब सारी बातें करता था। वे दोनों पहले हर दिन चैट किया करते थे, लेकिन इधर कुछ दिनों से ऐसा नहीं कर पा रहे थे। दरअसल, दो सप्ताह से दिल्ली में पावर कट की समस्या बढ़ गई है। शाम चार बजे से रात 2 बजे तक बिजली गुल रहती है।

मनीष ने पंकज को बिजली गुल होने की वजह से हो रही परेशानियों को बता दिया।

"अच्छा यह बात है। बताओ घर-परिवार में सब ठीक है? मैं करीब एक महीने से पिताजी से बात करना चाह रहा हूँ लेकिन उनसे बात नहीं हो पाती है। क्या इधर उनसे फोन पर तुम्हारी बातचीत हुई है?" पंकज ने जानने की कोशिश की। पंकज के परिवार के लोग गाँव में रहते हैं। उसके पिताजी के पास मोबाइल तो है, लेकिन उनसे उसकी बात बहुत कम हो पाती है। अमरीका में जब रात होती है, तो भारत में दिन होता है। छुट्टी के दिन पंकज बात करने की कोशिश करता है, लेकिन गाँव में नेटवर्क की समस्या होने के कारण बातचीत नहीं हो पाती है। कभी कभार लाइन मिल भी जाता है, तो अघिक बात नहीं हो पाती है।

"कल ही मेरी बात हुई थी। चाचाजी तुम्हारे बारे में पूछ रहे थे। वे चिंतित हैं कि इस बार काफी समय से तुम घर नहीं आए हो। तुम्हारा कब तक भारत आना होगा?" मनीष यह सब अभी लिख ही रहा था कि अचानक चैटबॉक्स मे टेक्स्ट का आना रुक गया। टेक्स्ट को न आते देख मनीष को निराशा हुई। उसके मन में कई तरह के विचार आने लगे। क्या अमेरिका में भी बिजली जाती है? वह सोचने लगा कि हो सकता है कि अचानक बिजली गुल हो गई हो, या फिर कोई और वजह होगी। आजकल वह अमरीका में आर्थिक मंदी की खबरें सुनता रहता है। वहाँ की कई बड़ी कंपनियाँ मसलन लेमन ब्रदर्स, जनरल मोटर्स के दिवालिया होने की जानकारी उसे थी। वह मन ही मन यह सोचने लगा कि सभी जीर्ण-शीर्ण अबस्था में आ गए हैं। जिस प्रकार उसके गाँव में पहले बिजली थी, सड़क थी, लेकिन पिछले दो दशक में सब खत्म हो गया। उसके गाँव में चलने के लिये सड़क ही नहीं बची है। दिल्ली शहर में सड़क है, पर भारी ट्रैफिक की वजह से पैदल चलनेवाले के लिए जगह ही नहीं है।

क्या यही हश्र अमरीका का भी होने वाला है? क्या विकास भी साइकिलिक होता है? यानी पहले अविकसित..विकासशील..विकसित। फिर विकसित..विकासशील..अविकसित। इस प्रकार की कई आशंकायें उसके मन मे उठ रही थी। एकाएक उसे नाभकीय ऊर्जा समझौता का ध्यान आया।

नहीं, यह कैसे संभव हो सकता है? बिजली गुल नहीं हुई होगी। अमेरिका तो पूरी दुनिया को बिजली प्रदान करने की बात करता है। वहाँ ऐसा कैसे संभव हो सकता है?

मनमोहन सिंह पर भरोसा तो किया ही जा सकता है। वह जाने-माने अर्थशास्त्री हैं और भारत के प्रधानमंत्री भी। उन्होंने देश-हित में ही तो अमरिका के साथ नाभकीय ऊर्जा समझौते पर हस्ताक्षर किए होंगे। संसद में जब गरमा-गरम बहस चल रही थी, तो इस बात को प्रमुखता से संसद पटल पर रखा गया कि इस समझौते की वजह से भारत में आने वाले समय में बिजली की समस्या नहीं रहेगी। हम यह गलत सोच रहे हैं कि अमरीका में बिजली चली गई होगी। इसकी वजह कुछ और होगी। बहरहाल, मैं विजय से पूछता हूँ कि अमरीका में बिजली गुल होती है या नहीं।

"विजय जी क्या ऐसा संभव है कि अमेरिका में भी पावर कट हो?" मनीष ने उत्सुकतावश पूछा। दो बार पूछने के बावजूद विजय ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया। मनीष ने आगे पूछने की हिम्मत नहीं की लेकिन वह इस पर सोचता रहा। उसे अपने प्रश्न के उत्तर तो मिले नहीं, बल्कि उल्टे उसे और भय सताने लगा। दरअसल, वह खुद छोटा कर्मचारी था और विजय एक बड़े ओहदे पर था। शायद इसी वजह से उसने यह प्रश्न किया था कि बड़े अधिकारी से उत्तर मिल जाएगा। मनीष का मन इसी उधेड़बुन में फंसा रहा, परंतु उसकी जिज्ञासा समाप्त नहीं हुई। उसका सामाधान नहीं हुआ। वह उत्तर जानने के लिए परेशान रहा। उसकी परेशानी बढ़ती गई, क्योंकि उसे समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह किससे पूछे।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें