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12.09.2007
मिथिलेश
अभि. सुरेन्द्र सौरभ


मधुर – मंगला चरण


दिव्य ज्ञान आनन्द के, घनीभूत प्रभु रूप।
देश, काल की अवधि से, परे न उपमा भूप॥
देव न महिमा कहि सकें, साधक मोक्ष सुजान।
ईश तत्व साक्षात्‌ ही, हर विग्रह सत्‌ ज्ञान॥

दुर्लभ-सुलभ होइ प्रभु, सेवो कष्ट नशाँइ।
तन-वाणी, बुद्धिः विमल, निश्चल मन अपनाँइ॥
रजो-तमो गुण रहित प्रभु, शुद्ध सत्व साकार।
निरावृत्त निर्मल वपुः, श्री विग्रह उपहार॥

श्रवण, मनन, चिन्मय रमें, प्रेम लक्षणा भक्ति।
सकलेन्द्रिय आनन्द मधु, श्री विग्रह प्रभु शक्ति॥
सुधा स्वरूप प्रशान्त प्रभु, परमानन्द असीम।
नित्य पूर्ण निष्कल, सकल, सत्व उद्रेक असीम॥

प्रलय अन्त, सत्‌-असत्‌ पुनि, प्रकटें सृष्टि रचाँइ।
नहिं व्यापार न प्रयोजन, ईक्षण कृत अपनाँइ॥
वैभव से कुंठित नहीं, वैकुंठी धरि रूप।
नूतन नीले पद्म सम, श्याम वर्ण प्रभु रूप॥

प्रभो रूप लावण्य सत्‌, सुकृति जनों उदार।
हृदय उपासक अमिय झर, चिन रूप चमत्कार॥
करुणा वश आसक्ति नहिं, करुणावश दें मोक्ष।
कामधेनु, परिजात क्या? गणना कृपा परोक्षा॥

चरण शरण प्रभु आपकी, सत्‌ गुरु सौरभ हेतु।
जनक, दिव्य-ऋषि कथानक, मम कल्याणक सेतु॥


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