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03.01.2008
मिथिलेश
अभि. सुरेन्द्र सौरभ
81 - 100

प्रथम – सर्जन – सर्ग
(छन्द-ताटंक)


इन्द्र अनुचरों ’जो आज्ञा’ कह, नमस्कार कर चयन किया।
श्रेष्ठ परी उर्वशी स्त्रियों, बना अग्रणी गमन किया॥
बल प्रभाव प्रभु नर-नारायण, वर्णन काम चकित होते।
देवराज वर्णन सुन अतिशय, भय से भीत व्यथित होते॥८१॥

विष्णु एक रस स्थित निज ही, जग हित बहु अवतार हुए।
हंस, दत्तात्रेय, सनक, सनन्दन, सनत, सनातन, ऋषभ हुए॥
इन अवतार आत्म साक्षातों, साधन का उपदेश किया।
प्रभु ही ’हृयग्रीव’ अवतार ले, मधु-कैटभ संहार किया॥८२॥

और चुराये वेदों को भी, वापस ले उद्धार किया।
प्रलय समय ’मत्स्यावतार’ ले, भावी मनु उपकार किया॥
मनु सत्यव्रत, धरा, औषधियाँ, धान्य आदि रक्षाकारी।
’वराह’ बन भू गई, रसातल, हिरण्याक्ष वध उद्धारी॥८३॥

’कूर्मावतार’ ग्रहण कर प्रभु निज, पीठ मन्दराचल धारे।
तभी जलधि मंथन से अमृत, आदि रत्न चौदह प्यारे॥
आर्त भक्त गजेन्द्र शरणागत, ग्राह मार गज उद्धारे।
’वाल खिल्य’ ऋषि तप दुर्बलता, गोखुर गड्ड गिरे तारे॥८४॥

वे कश्यप ऋषि समिधा लाते, गोखुर गड्डे गिर पड़ते।
समझे जलधि गिरा हूँ मैं तो, तभी प्रभो स्तुति करते॥
इन्द्र ब्रह्म हत्या वृत्तासुर, भयोग्रस्त छिपते फिरते।
डरे इन्द्र की रक्षा प्रभु की, सभी दैत्य मारे फिरते॥८५॥

अनाथ देवांगनाओं बन्दी, असुरों ने जब बना लिया।
तब अनाथ के नाथ बने प्रभु, अवलाओं को छुड़ा लिया॥
हिरण्यकशिपु के अत्याचारों, संत पुरुष, प्रहलाद डरे।
’नृसिंहावतार’ ग्रहण कर प्रभु ने, दुष्ट मार भय मुक्त करे॥८६॥

देवासुर संग्राम समय में, प्रभु ने देवों रक्षा की।
दैत्य शिरोमणि मार गिराये, भू-ब्राह्मण, गौ रक्षा की॥
’कलावतार’ विविध मन्वन्तर, त्रिभुवन रक्षा प्रभो करी।
’वामनावतार’ त्रय पग धरती, माँगी वलि भू मुक्त करी॥८७॥

तीनों लोक देवतों सौंपे, ’परसुराम’ पुनि अवतरते।
इक्कीस वार जीत भू मण्डल, क्षत्रिय हीन भूमि करते॥
हैहय वंश प्रलय करने को, अग्नि रूप भृगु वंश किया।
’रामावतार’ सिन्धु पुल बाँधा, रावणादि का अंत किया॥८८॥

लंकाराज विभीषण सौंपा, कीर्ति चतुर्दिक रखवारे।
प्रभो अजन्मा यदुवंश में, ’कृष्णावतार’ कंस मारे॥
पुन प्रभु ’बुद्ध’ रूप जग आये, यज्ञ अनधिकारी हारें।
तर्क-वितर्कों मोहित जग हो, कलियुग ’कल्कि’ रूप धारें॥८९॥

कलिकावतार शूद्र राजाओं, मारें धरती भार हरें।
राजन! कीर्ति अनन्त प्रभो की, संत महात्मा गान करें॥
राजा निमि पूछा- योगेश्वरो! परम भक्त आत्मज्ञ प्रभो।
जिल लालसा भोगों बाकी, नहीं कामना शान्त प्रभो॥९०॥

मन, इन्द्रिय भी वश नहिं जिन के, नहिं प्रभु का कुछ भजन करें।
उन लोगों की क्या गति होती? कैसे जगत पार उतरें??
कहा ’चमस’ योगेश्वर – राजन! विराट पुरुष जगत जन्मे।
सत्व प्रधान ब्राह्मण मुख से! सत-रज भुज क्षत्रिय जन्मे॥९१॥

रज-तम प्रमुख वैश्य जाँघो से, तमो प्रधान शुद्र चरणों।
जाँघों गृहस्थाश्रम जन्म हो, ब्रह्मचर्य हृद उपकरणों॥
वक्षस्थल वानप्रस्थ जन्में, मस्तक से सन्यास उदय।
वर्ण-आश्रमों जन्म विधाता, स्वामी चालक आत्म अभय॥९२॥

जो इन वर्ण आश्रम रहकर, भगवत भजन नहीं करता।
अपने वर्ण, आश्रम, योनिः, च्युत हो अधः पतन करता॥
बहु नारियाँ शुद्र आदि भी, भगवत कथा, कीर्तन दूर।
दयापात्र वे भगवत भक्तों, कथा-कीर्तन दें भरपूर॥९३॥

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य जन्म से, वेद पढ़ें संस्कार करें।
प्रभु चरणों के निकट हुए ही, वेद तात्पर्य समझ परें॥
मोहित होते अर्थवाद में, कर्म रहस्यों ज्ञान नहीं।
मूढ़ मगर निज पंडित मानें, अभिमानों वश अकड़ रही॥९४॥

मीठी, चटकीली, भड़कीली, बात निरर्थक मोह मढ़ी।
अनन्त इच्छा, क्रोध साँप सा, बनावटी अति रजोगुणी॥
भगवत प्रेमी लोगों ऐसे, हँसी, उड़ाते मूर्ख बड़े।
बड़ों और बूढ़ों नहिं सेवा, उपासना स्त्रियों खड़े॥९५॥

जो स्त्री सहवास बड़ा सुख, मानें यज्ञ कभी करलें।
अन्नदान दक्षिणा यज्ञकी, नहिं देते लोभों भरलें॥
तन, धन, कुल, विद्या, बल, वैभव, दान कर्म अभिमान करें।
भगवत प्रेमी संत, सत्पुरुष, प्रभु का भी अपमान करें॥९६॥

राजन! ईश्वर नित्य-निरन्तर, जीवों तन स्थित रहते।
वेद बताते आत्म-रूप वे, प्रियतम नभ समान कहते॥
मूर्ख वेदवाणी कब सुनते? बड़े मनोरथ बात करें।
मैथुन, माँस, मद्य प्रवृत्ति जग, स्वाभाविक उपयोग करें॥९७॥

वेद विहित कर्मों विशिष्टता, स्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं।
इन प्रवृत्ति कैसे हो जनगण? जब विधान श्रुति नीति नहीं॥
उच्छृंखल प्रवृत्ति लोगों की, वेदों धर्म नियंत्रित हों।
मर्यादा तब हो स्थापित, व्याह यज्ञ शुभ स्थित हों॥९८॥

सौत्रामणि यझों भी केवल, सुरा सूँघना, सेव्य नहीं।
ऐसे ही यज्ञों में बलि-पशु, छूना विहित है बलि नहीं॥
विषय भोग मैथुन पत्नी संग, वंश वृद्धि को बतलाया।
महतत्व-तन अपव्यय रोकें, ब्रह्मचर्य व्रत हित काया॥९९॥

अर्थवाद में फँसे लोग ही, धर्म-विशुद्ध नहीं जानें।
वही घमंडी सही दुष्ट हैं, निज ही सदा श्रेष्ठ मानें॥
वह धोखे में पड़े लोग ही, पशु हिंसा प्रवृत पाते।
मरने पर पशु ही उन खायें, तन तब मृतक होई पाते॥१००॥

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