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02.10.2008
मिथिलेश
अभि. सुरेन्द्र सौरभ
61 - 80

प्रथम – सर्जन – सर्ग
(छन्द-ताटंक)


कर्म निवृत्ति प्राप्त होने पर, ज्ञान रूप उन सिद्धि मिले।
स्वर्गादिक रूपों फल वर्णन, आशय रुचि बढ़ सिद्धि मिले॥
राजन! हृदय-ग्रन्थि मैं-मेरे, ब्रह्म स्वरूप आत्म रहती।
पुरुष चाहना, कल्पित ग्रन्थिः, विहित कभी खुलती क्षयती॥६१॥

ऐसे प्राणी वैदिक, तान्त्रिक, दोनों पूजन खूब करें।
पहले गुरु सेवा पुनि दीक्षा, अनुष्ठान विधि ज्ञान करें॥
पुनि इच्छित प्रिय प्रभु मूर्ति जो, प्रभु पुरुषोत्तम कर पूजा।
तन जल शोधन संतोषी हो, अन्तस शुद्धि वाद पूजा॥६२॥

शुद्ध होई भगवान मुखी हो, आसन, प्राणायाम करें।
भूत शुद्धि-नाड़ी शोधन यों, मंत्रों से न्यासादि करें॥
पहले पुष्प, पदार्थ आदि के, जन्तु निकालें शुद्ध करें।
मूर्ति सभी निर्माल्य सफाई, आदिक पूजन योग्य करें॥६३॥

आसन कर पवित्र जल छींटों, पाद्य, अर्घ्य, पारादि धरें।
पुनि आसन एकाग्र चित्त हो, प्रभु हिय चिन्तन ध्यान करें॥
तद्‌नन्तर अंग न्यास हृद्य, सिर, शिखा, वाहु इत्यादि करें।
देश-काल अनुरूप वस्तुओं, शोड्‌ष पूजन इष्ट करें॥६४॥

सपरिवार स्तोत्रों स्तुति, श्री हरि नमस्कार कर लें।
आत्मा में भगवान ध्यान कर, दिव्य मूर्ति पूजन कर लें॥
सिर निर्माल्य पूर्ण आदर से, प्रभु विग्रह स्थापित कर।
पूजन की समाप्ति आदर से, अर्घ सूर्य जल अर्पित कर॥६५॥

निमि श्रेष्ठ पूँछा-योगेश्वर! भक्तों वश अवतार प्रभो।
विविध लिये अवतार विविध ही, लीलायें भी करें प्रभो॥
अब तक जो लीलायें उन की, करलीं या करते, करनी।
कृपा करं उन सारी वर्णें, जीवों-जगत-सिन्धु तरनी॥६६॥

योगेश्वर दुर्मिल बोले-निमि! प्रभु अनन्त ही बतलाया।
मूर्ख, बाल ही गुण गिनते हैं, गुणों अन्त कब किस पाया??
पृथ्वी धूल कणों की गिनती, सम्भव है कर ली जाये।
सभी शक्तियों आश्रय भगवन, गुणों पार नहिं पड़ पायें॥६७॥

पाँचों भूत सृष्टि प्रभु ने की, अपने में अपने द्वारा।
विराट स्वरूप ब्रह्माण्ड प्रभो ही, लीला अंश रूप द्वारा॥
अंतर्यामी अंश प्रवेषे, भोक्ता नहिं जीवों रहते।
आदि रूप अवतार नरायण, पुरुष रूप भोक्ता कहते॥६८॥

त्रय लोक ब्रह्माण्ड विराट तन, स्थित तनधारी लीला।
इन इन्द्रि इन्द्रियाँ जीव तन, ज्ञान संचरण प्रभु लीला॥
इन्हीं श्वाँस-प्रश्वाँस तनों बल, इन्द्रिय ओझ, वलों कर्त्ता!
इन विराट तन जीवनधारी, नारायण आदि कर्त्ताः॥६९॥

सत्वांशी ही आदि पुरुष प्रभु, ’विष्णु’ जगत पालन कर्ता।
जगत सृष्टि को रजगुण अंशों, ’ब्रह्मा’ प्रथम सृष्टि कर्त्ता॥
धर्म, ब्राह्मणों, गौओं रक्षक, भूमि, यज्ञपति ’विष्णु’ बने।
फिर विराट तमोगुण अंशों, जग संहारक ’रुद्र’ बने॥७०॥

परिवर्तिनी प्रजा इस से ही, उतपति, स्थित, नाशे जो।
सृष्टा-पालक-संहारक बन, तीन देव जग लीला हो॥
दक्ष प्रजापति कन्या ’मूर्तिः’, नामी धर्मपत्नी प्यारी।
उन के गर्भ प्रभो शान्तात्मा, ’नर-नारायण’ अवतारी॥७१॥

नारायण प्रभु यह उपदेशा, आत्मा आराधना लखें।
बन्धन कर्म छुड़ाने वाला, नैष्य कर्म्य उस दशा लखें॥
वैसे ही वह स्वयं कर्म के, अनुष्ठान करने वाले।
बड़े-बड़े ऋषि-मुनि उन चरणों, सेवारत रहने वाले॥७२॥

बद्रिकाश्रम अब भी वे उन, कर्माचरण लीन रहते।
उन की घोर तपस्या लखकर, इन्द्र डरे मन में कहते॥
इन्द्र लोक पाना न इच्छा, तुरत काम को बुलवाया।
स्त्री, बसंतादि दल वल संग, तप खण्डन को उकसाया॥७३॥

कामदेव को भगवत महिमा, ज्ञान नहीं था यह पाया।
तभी कटाक्ष अप्सरा वाणों, वेधन मलय, काम आया॥
नर-नारायण आदि देव तब, इन्द्र कुचक्रों जान गये।
भय से कम्पित काम आदि को, हँसकर वह पहचान ग्ये॥७४॥

काम, मलय, मारुत, अप्सराओं! कहा अतिथियो डरो नहीं।
आतिथ्य स्वीकारो, ठहरो, आश्रम खाली करो नहीं॥
नर-नारायण अभय दान से, कामादिक लज्जा झुकते।
बोले-प्रभो! आप माया से, परे निर्विकारी मुक्ते॥७५॥

विस्म्य बात नहीं कुछ प्रभु को, दिग्गज धीर आत्म ज्ञानी।
प्रभु के चरण कमल नत मस्तक, करें प्रणाम नहीं सानी॥
भक्त आप के भक्ति तेज से, अमरावती लाँघ जाते।
प्राप्त परम-पद करें भजन उन, तभी देवगण डर जाते॥७६॥

विविध भाँति के विघ्न साधना, डालें तभी देव हारें।
यज्ञादिक जो कर्म देवतों, अंश दिये हों रखवारे॥
भक्त आप के बाधा, विघ्नों, गिरते नहीं लक्ष्य पाते।
विघ्नों के सिर पैर रख बढ़ें, चरण कमल छाया पाते॥७७॥

सर्दी-गर्मी आँधी-पानी, कष्टों कुछ सह बढ़ जायें।
रसना-कर्मेन्द्रिय वेगों को, सागर सम सह तर जायें॥
पर वे क्रोध न काबू करते, गो-खुर गढ्ढे सम होते।
नाशक आत्म लाभ नहिं कोई, कठिन तपस्या भी खोते॥७८॥

कामदेव, बसंतादि देवता, प्रभु की स्तुतियाँ करते।
नारायण तब स्वयं योग बल, दिव्य तरुणि रचना करते॥
दिव्य वस्त्र, अलंकार सुसज्जित, प्रभु सेवा तल्लीन सभी।
इन्द्र अनुचरों लखीं युवतियाँ, निज आभा उन मंद सभी॥७९॥

श्री विहीन होते अनुचर सब, लज्जित सिर झुकाते पाते।
रूप राशि तन गंध मनोहर, लख मोहित हो ललचाते॥
नारायण हँसते उन बोले, जिन चाहें उन ले जायें।
निज अनुरूप प्राप्त कर लें इन, शोभा स्वर्ग बढ़े पायें॥८०॥

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