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02.10.2008
मिथिलेश
अभि. सुरेन्द्र सौरभ
41 - 60

प्रथम – सर्जन – सर्ग
(छन्द-ताटंक)


प्रारब्ध मिले संतोषी, भोजन, वस्त्र, संत श्रद्धा।
नहीं शास्त्र, दूजों की निन्दा, भगवत्‌ मार्ग, शास्त्र श्रद्धा॥
तजें वासना, संयम कर्मों, मन, प्राणों, मौनी वाणी।
सेवन सत्य, इन्द्रियों निग्रह, बाह्यमुखी मन अज्ञानी॥४१॥

प्रभु लीला अवतार, कृत्य, गुण, श्रवण, कीर्तन, ध्यान करें।
यज्ञ, दान, जप-तप निज जीवन, पुत्र, प्राण प्रिय चरण धरें॥
प्रभु साक्षात्‌ किया जिन संतों, स्वामी या आत्मा रूपों।
प्रेमी जन, सज्जन, परमार्थी, सेवा संत प्रभो रूपों॥४२॥

पावन परम ईश यश चर्चा, साधक मिले प्रेम सीखें।
निवृत हों प्रपंच, आध्यात्मिक, शान्ति, तुष्टि अनुभव सीखें॥
राशि-राशि पापों इक क्षण में, भस्म करें श्री कृष्ण प्रभो।
खुद स्मरण करें, दूजों भी, याद करायें दिव्य प्रभो॥४३॥

इन साधन, भक्ति, अनुष्ठानों, उद्‌भव प्रेम-भक्ति होये।
प्रेमोद्रेक पुलक तन हिय की, बड़ी विलक्षण गति होये॥
कभी-कभी उर चिन्ता होये, अब तक भगवन नहीं मिले।
जाऊँ कहाँ? करूँ क्या किस विधि? प्रभु पाने का ज्ञान मिले॥४४॥

प्रभु के चिन्तन रोते-हँसते, कहें गोपियन डरे छिपे।
कभी प्रेम दर्शन अनुभूतिः, मगन होड़ आनन्द दिपे॥
पुनि हो लोकातीत भाव में, प्रभु से बातचीत करते।
प्रभो रिझाने नाँचे-गायें, गुणों गान अतिशय करते॥४५॥

दूर हुए ढूँढें इत-उत में, परम शान्ति सानिद्ध हुए।
प्रभो परायण भगवत्‌ धर्मों, माया सहजहि पार हुए॥
निमि राजन पूछा-महर्षियों! नारायण स्वरूप क्या है?
आप श्रेष्ठ अति जिन प्रभु-देखे, सत्य स्वरूप कहें क्या है??४६॥

योगेश्वर ’पिप्प्लायन’ बोले-निमि! जग रच प्रभु लय होते।
सृष्टि-प्रलय स्थिति जग कारण, प्रभु कारण कुछ नहीं होते॥
जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति अवस्था, साक्षी रूप शरीर रहे।
समाधि अवस्था भी ज्यों का त्यों, बना एक रस सदा रहे॥४७॥

अन्तस, प्राण, इन्दियाँ, तन इस, चेतन सत्तावन हुए।
मन, वाणी, मति, प्राण, इन्द्रियों, परे किसी कब ज्ञान हुए??
’नेति-नेति’ कह मौन श्रुतियाँ, इंगित नहिं वर्णन कोई।
बोध कराने जितने साधन, उन सत्ता अनुभव होई॥४८॥

जिस सत्ता निषेध जब-तब हो, वही सिद्ध आत्म सत्ता।
जिन आत्मा अनुभूति हुईं कहिं, ज्ञान, ज्योति रूपी सत्ता॥
सृष्टि पूर्व एक प्रभु सत्ता, त्रिगुण प्रकृति ’अव्यक्त” वही।
पुनि उस ज्ञान प्रधान रूप से, ज्ञान शक्ति ’महतत्व’ वही॥४९॥

क्रिया प्रधान बनी जब सत्ता, ’सुत्रात्मा’ या ’जीव’ कहा।
जिस का वर्णन अहंकार के, रूप देव अधिष्ठातृ कहा॥
इन्द्रिय, उन विषयों, विषयों के, रूप सभी कुछ ब्रह्म रहा।
ब्रह्म शक्ति अनन्त का वर्णन, कर पाना सम्भव न रहा॥५०॥

जो भी दृश्य-अदृश्य, कार्य व, कारण, सत्य-असत्य लखा।
सब कुछ ब्रह्म, परे इस जो कुछ, वह भी ब्रह्म स्वरूप दिखा॥
आत्मा ब्रह्म स्वरूप न जन्मे, नहीं मृत्यु, घटना, बढ़ना।
क्रिया, विचार, अभाव रूप में, बदलें द्रव्य, ब्रह्म रचना॥५१॥

सब की भूत-भविष्य, अभी की, सत्ता की साक्षी आत्मा।
सब में देश-काल-द्रव्यों भी, पूर्ण व्याप्त अक्षय आत्मा॥
आत्म-तत्व ’उपलब्धि’ विषय नहिं, ज्ञान स्वरूप इसे जाना।
जैसे प्राण स्थान भेद से, विविध नामधारी जाना॥५२॥

चार भाँति जग जीव जरायुज, अण्डज, स्वेदज अरु उद्‌भिज।
धरती फोड़ निकलने वाले, वृक्ष, वनस्पतियाँ उद्‌भिज॥
स्वेदज स्वेद जन्म यूँ, खटमल, मानव आश्रित पशु बनें।
अण्डा फोड़ सरीसृप, पक्षी, नाल जुड़े पशु, पुरुष जनें॥५३॥

प्राण शक्ति इन सभी जीव तन, तब तक यह जीवन होये।
भिन्न-भिन्न तन सभी जीव हैं, प्राण एक ही इन होये॥
इन्द्रियाँ निश्चेष्ट सुषुप्ति हों, अहंकार भी सो जाये।
लिंग शरीर नहीं रहता तब, प्राण, आत्म जाग्रत पाये॥५४॥

ऐसी स्मृति ’सुख से सोया’, इसी कूटस्थ आत्मा हो।
यह स्मृति ही करे प्रमाणित, तन की दृष्टा आत्मा को॥
कमलनाभ प्रभु चरण कमल में, प्रबल भक्ति की इच्छा से।
इच्छा-अग्नि चित्त गुण-कर्मों, मल जलते इस इच्छा से॥५५॥

दर्पण-चित्त शुद्धता करके, साक्षात्‌ आत्मा कर लें।
निर्विकार नेत्रों प्रकाश रवि, सब अज्ञान तमस हर लें॥
आत्मा के प्रकाश चित शान्तिः, शुभ अनुभूति अपरिमित हो।
आत्मानन्द शान्ति रस सेवन, साधक तृप्ति नई नित हो॥५६॥

नव योगेश्वरों! निवेदन राजन, कर्म योग प्रभु समझायें।
शुद्ध होइ कर्तृत्व, कर्म जिस, फल निवृत्ति ज्ञान पायें॥
यही प्रश्न सनकादिक ऋषियों, किया पिता सम्मुख मैंने।
थे सर्वज्ञ मगर उत्तर था, कारण नहीं कहा उन ने॥५७॥

’आविर्होत्र’ ऋषि बोले-राजन! कर्म ज्ञान वेदों होये।
विहित कर्म, अकर्म, विकर्मों, ज्ञान बालपन नहिं होये॥
ईश्वर रूप वेद होते हैं, निश्चय ही तात्पर्य कठिन।
बड़े-बड़े विद्वानों इन के, आशय निर्णय होंइ कठिन॥५८॥

वेद परोक्ष वादात्मक होते, शब्दार्थों इन आश्रय भिन्न।
यह कर्मों निवृत्ति हेतु ही, स्वर्गादिक लालच दें भिन्न॥
अनभिज्ञों को श्रेष्ठ कर्म के, हेतु प्रलोभन ही इन के।
उन अज्ञान छूट नहिं पाये, वश इन्द्रियाँ नहीं जिन के॥५९॥

ये वेदोक्त कर्म को त्यागें, मनमाने व्यवहार करें।
विहित कर्म आचरण न करक, विकर्म रूप अधर्म करें॥
जन्म-मरण भटकन इन ही जन, फल अभिलाषा मुक्त नहीं।
कर्म विहित कर फल अभिलाषा, प्रभो समर्पें मुक्ति वहीं॥६०॥

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