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06.28.2008
मिथिलेश
अभि. सुरेन्द्र सौरभ
61 - 83

प्रथम – सर्जन – सर्ग
(छन्द-ताटंक)


’मह लोक’ प्रतिनिधि हरा रंग, षठ्‌ कोणी गोलाकृति।
’अहनद-चक्र’ हृद्य में वायुः, तत्व बताई स्थिति॥
’जन-लोक’ प्रतिनिधि नीला रंग, लम्बी वृत अंडाकृति।
कण्ठ प्रदेश ’विशुद्ध-चक्र’ में, तत्व ’आकाश’ अवस्थित॥६१॥

मूलाधार चार दल पंकज, छः दल स्वादिष्ठानहिं।
मणि पुरक में दस दल स्थित, बारह ’अहनद’ जानहिं॥
सोलह कण्ठ प्रदेश विशुद्ध्हि, दो दल भ्रू बिच जानें।
शिख मध्य सहस्त्रार हजार दल पंकज, ’पुष्पक’ रूप विचारौ॥६३॥

पद्‌म अठारह जूथप बन्दर, सिया-राम इत्यादिक।
पुष्पक-सहस्त्रार में फिर भी, रिक्ति कहें निर्वाधिक॥
पुरुष-प्रकृति मिश्रित रूप जो, ’दृष्टा’ माना जाता।
गुण विशेष आधारित अपना, स्वरूप यों बतलाता॥६४॥

सुख-संतोष, शुद्धि, श्रद्धा, घृति, समता, सत्य, सरलता।
सदाचार, तन स्वस्थ, निरोगी, मृदुता, नहीं चपलता॥
आनन्द, प्रीति दान के द्वारा, मन को वश में रखना।
उऋण, शौच, भ्रम हृदय न कोई, इच्छा वस्तु न करना॥६५॥

परोपकार, दया सब प्राणी, इन्द्रिय-मन प्रशन्नता।
लज्जा, लोलुपता न, अहिंसा, क्रोध अभाव, दीनता॥
इष्ट-अनिष्ट वियोग न भाषे, क्षमा गुणी, सत्‌धारी।
’सत्व गुणी जीवात्मा’ ये गुण, सम्मानों अधिकारी॥६६॥

काम, अहं, मद, हर्ष-द्वेष अरु, वैर बाँधना चिन्ता।
हों निर्लज्ज, कठोर, कुटिलता, भेद बुद्धि, निर्दयता॥
रूप, ऐश्वर्य, विग्रह, त्याग की, कमी, संताप करना।
दूजों धन हड़पें, सत्कार न, माननीय जन करना॥६७॥

सुख-दुःख सेवन आसक्ति हो, प्रीति करें परनिन्दा।
झगड़े मोल लेंइ आदत से, रजगुण कार्य चुनिन्दा॥
मोह, वस्त्र, शय्या, विहार, दिन-शयन, अधिक वकवदी।
अंध क्रोध, अज्ञान, क्रोधमय, धर्मों द्वेष, प्रमादी॥६८॥

नाच-गान-बाजे का प्रेमी, मद्य नहीं मन भरता।
विविध भोज्य रुचि नहिं संतोषी, इत्रों, आसन मरता॥
उक्त सभी तामस गुण समझें, सात्विक जन उत्तम गति।
रजोगुणी मध्यम बतलाई, तामस गुणी अधम गति॥६९॥

शुद्ध भाव प्रशान्त, प्रसन्नत, धर्मलीन सत्‌ पायें।
मन आत्मा में दुःखी विषय रति, धन संग्रह रजपायें॥
विषयासक्त, विवेक न होये, तर्क-वितर्क हीनता।
काम, मोह, जड़-जीव जगत में, तमगुण लखें निम्नता॥७०॥

लज्जा, शंका, भय कर्मों जिन, करने इच्छा करते।
आलस, नींद, याचना जिस भी, तम गुण जिसमें बढ़ते॥
स्थावर, वृक्षादि, सिरी-सृप, कीट, कृमी, जलजीवी।
पशु-मृग, सर्प, मत्स्य, कच्छप ये, घोर तमोगुण जीवी॥७१॥

हाथी-घोड़े, सूकर-कूकर, निन्दित कर्मों धारी।
शुद्र-सिंह, अरु म्लेच्छ जीव ही, मध्यम तम गुण धारी॥
दम्भी, हिंसक, राक्षस, चारण, पिशाच, सुन्दर पक्षी।
उत्तम तमोगुणी श्रेणी इन, तीनों में ये अच्छी॥७२॥

वध तलवर, कुदाल कमेरे, झल्ला, शस्त्री सेवक।
मल्लाह, मद्यासक्त, नटादि, घोर रजोगुण धारक॥
राज पुरोहित, राजा क्षत्री, वकील वाद-विवादी।
सेनाध्यक्ष, दूत, वैरिस्टर, मध्यम रजगुण वादी॥७३॥

गुह्यक, वाद्यक, यक्ष-गंधर्व, विद्वानों के सेवक।
उत्तम रूपवान अप्सरायें, उत्तम रज गुण धारक॥
दैत्य-देह पोषक, मानव, यति, तपसी, वेदों पाठी।
वैमानिक, सन्यास, ज्योतिषी, सतोगुणी ये काठी॥७४॥

विद्या, काल, वेद, विद्युत-विद्‌, वेदार्थी विद्वानों।
यज्ञोंकर्त्ता, रक्षक, ज्ञानी, मध्यम सतगुण मानों॥
अव्यक्त, जन्म, प्रकृति वश करनी, सिद्धि जानने वाले।
सर्वोत्तम धार्मिक बुद्धियुत, विमानादि रचवाले॥७५॥

सृष्टि-क्रमों, विद्याज्ञाता अरु, विश्व सृजक जिन जाना।
सब वेदों वेत्ता ब्रह्मा जी, उत्तम सतगुण माना॥
आदि-अन्त से रहित नित्य ये, अक्षर रूप बखाने।
इनका दिन ही सृष्टि उदय है, रात प्रलय ही मानें॥७६॥

जब ये शयन कामना करते, ’रुद्र’ प्रेरणा देते।
रुद्रदेव अहं अभिमानी, सूर्य स्वरूपं लेते॥
विष्णु, अर्यमन, वैवस्वत अरु, अंशुमान, भग, त्वष्टा।
पूषन, वरुण, विधाता, इन्द्र व धातृ, मित्र द्युति सृष्टा॥७७॥

द्युलोक सूरज ये बारह, मास बारहों स्वामी।
ग्यारह सौ से पंद्रह सौ तक, द्युति किरणों गतिगामी॥
बाहर सूर्य स्वरूप बनाकर, अपना तेज मिलाकर।
जरा-अण्ड, स्वेदज व उद्‌भिज, सारा जगत मिटाकर॥७८॥

जलती कछुआ पींठ-पृथ्वी, तब जलधार डुबायें।
तीव्र ताप जलती धरती से, जल सूखे बतलायें॥
जल सूखे तब पुनः प्रज्वलित, धरती आग उगलती।
वायु देव बलवान वेग अति, सारी अग्नि निगलती॥७९॥

आव, अनिल, अनल, सोम, ध्रुव, धर, प्रमास, प्रत्युष नामी।
आठों वसु ये पवन देवता, पृथ्वी लोक प्रणामी॥
ऊपर-नीचे और बीच में, आठों रूप पवन के।
तीव्र प्रवाहित तब अम्बर के, ग्रास रूप वे बनते॥८०॥

पवन प्रवाहित गगन समाये, मन आकाश विलाये।
अहंकार पुनि मन को खाये, अहंकार मह खाये॥
मह-तत्व को शम्भु प्रजापति, अपना ग्रास बनाते।
अणिमा,अ लघिमा, आदि सिद्धियों, युक्त बताये जाते॥८१॥

हाथ-पैर-आँख, मस्तक, मुख, कान सभी दिश स्थित।
ज्योर्तिमय, अविकारी सारे, जग में व्याप्त व स्थित॥
परम महान अनन्त विश्व सब, लीन स्वयं में करते।
आत्म स्वरूप समस्त प्राणियों, हृदय वास वे करते॥८२॥

दोष रहित, अक्षय, अव्यक्त ही, छिद्र रहित परमेश्वर।
भूत-भविष्यत-वर्तमान के, सृष्टा ही परमेश्वर॥
शेष यही रहते जग प्रलय, और तत्व नहीं कोई।
यों तत्वो संहार बताया, पुनि इन सृष्टि संजोई॥८३॥

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