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06.28.2008
मिथिलेश
अभि. सुरेन्द्र सौरभ
21 - 60

प्रथम – सर्जन – सर्ग
(छन्द-ताटंक)


काम देव राजा बन विचरे, लालच, लोभ इसी के।
दुर्मति, दुरावृत्ति, गुणहीना, पनपे क्रोध इसी से॥
राग-द्वेष, मोह-ममता में, फँसे रहें मन-मंत्री।
काम-क्रोध-कामना कचोटे, संयत सरल न मंत्री॥४१॥

अस्त्र-शस्त्र मारे कब जायें? वशीभूत हों साधन।
दृढ़ एकाग्रबुद्धि, निर्मोही, जीतें शुक्ल सुसाधन॥
पर्वत तुल्य अड़ें अन्यायों, मोहित सब को करते।
आत्म देव इच्छा अरु-चेष्टा, हारें फिर ही मरते॥४२॥

इन्द्रिय जयी वासना विगलित, स्थित-प्रज्ञ वीरता।
शाश्वत सुख अक्षय सिद्धि हो, दर्शन आत्म धीरता॥
आत्म देव इच्छा मन मरते, प्राणों उच्च बनायें।
जीवन तत्व-चेतना मन-मति, हृदय प्रदेश दिखायें॥४३॥

तैजस अहंकार संकर्षण, दशों इन्द्रियाँ जन्में।
’प्राण’, बुद्धिबल, क्रिया शक्ति को, तैजस ही जन्में॥
दशों इन्द्रियों हलचल प्राणों, मन प्रेरित हो पाये।
पदार्थ ज्ञान-विज्ञान स्फुरण, बुद्धि प्राणबल पाये॥४४॥

तामस अहंकार विकृति से, ’शब्द’ तन्मात्रा जन्म।
शब्द तत्व ’आकाश’ जन्म हो, स्पर्शें ’वायु’ जन्म॥
गुण संयुक्त कार्य कारण से, वायु शब्द संयोगे।
दृष्टा-दृश्य बोध शब्दों हो, सुनकर मन संयोगे॥४५॥

शब्दों लक्षण, अर्थ बतायें, सूक्ष्म आकाश स्वरूप।
अदृश्य वक्ता ज्ञान कराये, वृत्ति आकाश अनूप॥
वायु विकार ’तेज’ उत्पन्ने, तेज विकार उदक (जल) हो।
जल विकार ’भू’ जन्म हुआ है, कारण कार्य प्रथक हो॥४६॥

मनसे पाँच भूत उतपति हो, चौथी सृष्टि कहाये।
नाम ’मानसिक सृष्टि’ दिया इस, भूत सृष्टि पुनि पाये॥
महाभूत से सूक्ष्म भूत हों, ’तन्मात्रा’ कहलाये।
शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंधः, पाँच विषय बतलाये॥४७॥

भौतिक भूतों से उतपति इस, ’सृष्टि पाँचवई’ मानी।
भौतिक सर्ग या भौतिक सृष्टि, नामी सांख्य बखानी॥
पाँच विषय क्रमशः ज्ञानेन्द्रिय, जन्म हुआ बतलाया।
श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, जिह्वा अरु, घ्राणेन्द्रिय बतलाया॥४८॥

छ्ठा सर्ग यह बहुचिन्तात्मक, मानस सृष्टि कहाई।
ज्ञानेन्द्रिय से कर्मेन्द्रिय की, सृष्टि हुई बतलाई॥
कर्मेन्द्रिय को सृष्टि सातवीं, ऐन्द्रिक सृष्टि बताते।
वाक्‌, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ, कर्मेन्द्रियों गिनाते॥४९॥

इन्द्रिय स्वामी देव अश्विनी, वायु, वरुण, दिनकर, दिक्‌।
विष्णु, प्रजापति, इन्द्र, अग्नि अरु मित्र जन्म वैकारिक॥
कान-नाक, नेत्र, त्वचा, जिह्वा क्रमशः अधिपति जानें।
दिक्‌, अश्विनी, सूर्य, वायु अरु, वरुण देव अधि मानें॥५०॥

वाक्‌, पाणि, पाद पायु उपस्थ, इन इन्द्रिय के स्वामी।
अग्नि, इन्द्र, विष्णु, मित्र, प्रजापति, क्रमशः देव सुनामी॥
हस्त, पादादि, कर्मेन्द्रिय अरु, विषयों शब्द आदि को।
’विषय विशेष’ कहा जाता है, ’सविशेष’ ज्ञानेन्द्रिय को॥५१॥

कर्मेन्द्रिय छः दोष बताये, शोक, मोह, दुर्बलता।
भूख-प्यास अरु छ्ठा मृत्यु है, दोषों इन व्याकुलता॥
पाँचों महाभूत इस तन में, मन को छ्ठा बताया।
ज्ञानेन्द्रिय मन ही जीवों को, विषयों का ज्ञान कराया॥५२॥

पंचभूत, इन्द्रिय, मन सोलह, कर्म ’विशेष’ अवस्था।
सांख्यकारिका विशेष कर्मों, नाम ’विकार’ व्यवस्था॥
पाँच तत्व, दश इन्द्रिय, मन को, सोलह कला कहा है।
अहंकार संकर्षण उतपति, जग इन अहं रहा है॥५३॥

ज्ञानेन्द्रिय, मन, बुद्धि सातवीं, आठवाँ है क्षेत्रज्ञ।
मन संकल्प-विकल्प इन्द्रियों, विषय ग्रहण देह यज्ञ॥
तन्मात्रयें अहं समन्वित, छः ’अविशेष’ कहाते।
प्रकृति जन्य अहं तन्मात्रा, गुण या दोष दिखाते॥५४॥

चुम्बकीय कण ये विकीर्ण गुण, भले-बुरे अन्दर जो।
ज्योर्ति तेज-विलय सम प्रेक्षित, भीतर से बाहर को॥
इन ’अविशेष’ स्वरूप देखना, साधारण नहिं सम्भव।
योगाभ्यासों ज्ञान शक्ति को, तीव्र किये हो सम्भव॥५५॥

शब्द, कान अरु छेद सभी जो, ’नभ’ के कार्य कहे हैं।
स्पर्श, त्वचा, चेष्टा, कार्य सब, रूप ’समीर’ रहे हैं॥
रूप, नेत्र, परिपाक ’तेज’ के, ’नीर’ जीभ, रस नमता।
गंध, नासिका और देह के, ’भूमि तत्व’ गुण क्षमता॥५६॥

पुरुष पाँच तत्वों का पुतला, पुनि-पुनि पाँच स्वरूपों।
काम-क्रोध, शोक-मोह, भय जो, तत्व ’आकाश’ विरूपों॥
चलन, वलन, धावन व प्रसारण, सिकुड़े तत्व ’वायु’ से।
तृष्णा, क्षुधा, नींद, आलस अरु, कान्ति स्वरूप ’तेज’ से॥५७॥

लार, रक्त, वीर्य, मूत्र, पसीना, रूप कहे ’अमृत’ के।
त्वचा, माँस, नाड़ी, अस्ति और, रोम रूप ’पृथ्वी’ के॥
तन स्थूल रूप पाँचों जो, व्यवहारों पहचाने।
नाम, जाति अरु वर्ण, आश्रम, रिश्तों पाँच गिनाने॥५८॥

तन चक्रों में तत्वों स्थिति, इन्द्रिय स्वच्छ बनाने।
तत्व साधना श्रेष्ठ ज्ञान, प्रोत्साहन जगृति लाने॥
’भू-लोक’ प्रतिनिधि पीला रंग, चतुष्कोण भू आकृति।
दो अंगुल के नाम गुदा से, ’मूलाधार-चक्र’ क्षिति॥५९॥

’भूवः लोक’ प्रतिनिधि श्वेत रंग, अर्द्ध चन्द्र आकृति ’जल’।
पेडू जननेद्रिय मध्य में, ’स्वादिष्ठान’ सलिल वल॥
’स्व-लोक’ प्रतिनिधि रंग लाली, ’अग्नि’ त्रिकोण स्वरूपी।
नाभी स्थान शक्ति कुण्डलिनी, ’मणि पूरक’ सत्‌ रूपी॥६०॥

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