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05.31.2008
मिथिलेश
अभि. सुरेन्द्र सौरभ
1 - 20

द्वितीय – दर्शन – सर्ग
(छन्द-सार)


देवरात सुत जनकराज ने, शिक्शा गुरुकुल पाई।
वेद, शास्त्र, दर्शन, साँख्य पढ़, योग, नीति अपनाई॥
फिर भी पुनि आकाँक्षा जागई, साँख्य-योग पुनि जानें।
तभी कुलगुरु याज्ञवल्क्य के, आश्रम को प्रस्थाने॥१॥

दिव्य कुलों में दिव्य पुरुष ही, दिव्य ज्ञान अभिलाषा।
तभी दिव्य गुरुओं के आश्रम, उन्मुख ज्ञान पिपासा॥
मिथिलापुर के महायशस्वी, राजा जनक पिपासू।
कुलगुरु याज्ञवल्क्य के आश्रम, पहुँचे, बन जिज्ञासू॥२॥

तपोतेज सात्विकता आश्रम, वायु सुगंधित बहती।
गुरु-शिष्यों श्रद्धा सम्बन्धों, प्रकृति हर्षित रहती॥
नत मस्तक प्रणाम कर राजन, नम्र हुए अति वाणी।
कहा-श्रेष्ठ गुरु ज्ञान शिरोमणि! कृपा पात्र अज्ञानी॥३॥

गुरुवर! इन्द्रिय क्या कितनी हैं? प्रकृति कितनी मानें?
कारण ब्रह्म परे प्रकृति से, किस स्वरूप पहचानें?
इन से परे ब्रह्म निर्गुण क्या? सृष्टि-प्रलय क्या कैसे?
इन विषयों सुनने की इच्छा, पूर्ण करें हित जैसे॥४॥

याज्ञवल्क्य उवाच –

राजन! इन अज्ञान नहीं हो, पूँछ रहे हो फिर भी।
पूँछे प्रश्नों के उत्तर दूँ, धर्म सनातन यह ही॥
निर्गुण, निराकार, निर्विकार है, निर्विकास्य, निराम्भ।
अप्रमेय, आधार रहित है, अद्वितीय योग गम्य॥५॥

सब का एक मात्र कार्ण है, कभी न बढ़ता घटता
व्यापक सब ब्रह्माण्ड वस्तुओं, चिन्मय श्रुति कह सत्ता॥
अनादि, अनन्त, उपद्रव हीना, ज्योतिः परम अनूपा।
ज्ञानस्वरूप, सत्य, मायाबिन, परमानन्द स्वरूपा॥६॥

सृष्टि समय पर इस सत्ता ने, द्वितीय की इच्छा की।
एक अनेक बने संकल्पों, अन्दर की इच्छा थी॥
तब उस निराकार परमात्मा, मूर्ति स्वरूप विचारा।
सब ऐश्वर्य-गुणों सम्पन्न हो, संस्कृति केन्द्र अपारा॥७॥

सर्वज्ञान, सर्वरूप, दर्शिनी, ईश्वर-मूर्ति कल्पना।
सर्वकारिणी, सर्वाद्या वह, दाआ, सर्व वन्दना॥
निराकार साकार रूप हित, कल्पित मूर्ति समाये।
वही ’सदाशिव’ ईश्वर नामी, परमपुरुष कहलाये॥८॥

परमपुरुष शिव, शम्भु, महेश्वर, भालचन्द्रमा धारी।
दसभुज, पंचमुखी, त्रिनेत्र सिर, गोरे त्रिशूलधारी॥
थे एकाकी ईक्षण कृत ही, निज विग्रह विघटन कर।
स्वरूपभूता शक्ति सृष्टि की, निज से अलग नहीं कर॥९॥

पराशक्ति प्रधान प्रकृति है, तीन गुणों की माया।
बुद्धितत्व जननी विकास नहिं, ’सर्वेश्वरी’ बताया॥
कोटि सहस्त्र चन्द्र सम कान्तिः, नाना गतियों वाली।
सदा उद्यमी, सब की योनिः, जगमग तेज निरारी॥१०॥

जननई तीनों देव ’अम्बिका’, कार्ण मूल कही है।
ये नित्या, प्रकृति, शुभ लक्षण, आठ भुजाओं की है॥
विद्वों आठ प्रकृति बताईं, आध्यात्मिक ज्ञानी जो।
अव्यक्त, महत, अहं, भू, अम्बु, पावक, पवन, व्योम को॥११॥

मूल प्रकृति ’अव्यक्त’ स्वशक्ति, चिन्ह रहित जानी है।
सत-रज-तम गुण साम्यावस्था, ’अलिंग’ भी मानी है॥
मूल विशुद्ध अलिंग अवस्था, शान्ति रूप प्रकृति है।
कोई सृजन सृष्टि कब इससे, साम्य गुणों क्या कृति है??१२॥

काल-कर्म-स्वभाव मायापति, निज स्वरूप स्वीकारे।
काल-कर्म-प्रकृति के मिश्रण, तत्व जन्मते सारे॥
काल क्षोभ उपजाया प्रकृति, ईश्वर तेज मिलाया।
क्षुब्ध प्रकृति स्वरूप बदलकर, कर्म रूप ’मह’ पाया॥१३॥

मूल प्रकृति परमात्मा संगम, ’ज्ञान शक्ति’ उतपति है।
प्रकृति सृष्टि ’सलिंग’ अवस्था, प्रथम सृष्टि संसृति है॥
ज्ञान शक्ति महतत्व प्रकृति के, सत कण सर्जन होये।
नहिं स्वतंत्र उत्पादित होये, घट-बढ़ ज्ञान संजोये॥१४॥

ज्ञान शक्ति नहिं स्वयं प्रकाशित, जो प्रकाश प्रतिविम्बित।
कहते प्रकृति प्रकाश स्वयं नहिं, पुरुष प्रकाश प्रकाशित॥
जैसे चन्द्र प्रकाशित रवि से, लगता स्वयं प्रकाशित।
वैसे ही जो चित्त प्रकृति है, आत्मा तेज प्रकाशित॥१५॥

ज्ञान शक्ति की अंश मात्र ही, बुद्धि मानवी होती।
जैसे जीवात्मा-परमात्मा, अंश मात्र ही होती॥
व्यक्त शक्ति प्रभु ज्ञान शक्ति जो, ’समष्टि बुद्धि’ कही है।
शुद्ध तीव्र मर्यादित बुद्धिः, ’सात्विक बुद्धि’ रही है॥१६॥

परमेश्वर परब्रह्म प्रथम तो, सर्वात्मा (विष्णु) प्रकटाये।
प्राण रूप ’ब्रह्मा’ के पीछे, ’श्रद्धा’ सुमन खिलाये॥
शुभ कर्मों प्रवृत्त बुद्धि को, ’श्रद्धा’ रूप कहा है।
यही ’आस्तिक-बुद्धि’ कहाये, सात्विक रूप रहा है॥१७॥

परमात्मा या व्यक्ति, वस्तु प्रति, पूज्य भाव हिय होये।
श्रेष्ठमान विश्वास प्रबलता, ’श्रद्धा’ भाव सँजोये॥
ये स्वभावगत, गुण अधीन है, सत्‌-रज-तम त्रय शाखा।
सात्विक श्रद्धा परमार्थिक है, प्रभु उन्मुख हों भाषा॥१८॥

राजस-तामस श्रद्धा मानव, जगत ओर ले जाये।
कहें आसुरी सम्पति, स्वार्थिक, त्याज्य बताई जाये॥
धारणा, मान्यता, भावना, अन्तस में जो जाये।
वैसी ही श्रद्धा उपजाये, गुन प्रधानता पाये॥१९॥

’सांसारिक श्रद्धा’ प्रधानता, ’भोग’ वृत्ति की होती।
परमार्थिक में ’तत्व’, ’धार्मिक-श्रद्धा’ ’भाव’ संजोती॥
परमार्थी रुचि सात्विक भोजन, शुभ कर्मों प्रवृति हो।
असद्‌भाव अभिमान बढ़ाये, स्वाभिमान सद्‌मति हो॥२०॥

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