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02.10.2008
मिथिलेश
अभि. सुरेन्द्र सौरभ
21 - 40

प्रथम – सर्जन – सर्ग
(छन्द-ताटंक)


जो न्यूनाधिक नहीं देखता, प्रभु सत्ता परिपूर्ण लखे।
सभी प्राणियों या पदार्थ जग, प्रभु स्वरूप ही पूर्ण लखे॥
ऐसी सिद्धि-दृष्टि अनुभव से, समता दर्शन कहलाता।
उत्तम श्रेणी वही भागवत, वही परम प्रिय प्रभु भाता॥२१॥

करें उपेक्षा ईश्वर द्वेषी, दया दुःखीजन, अज्ञानी।
प्रभु भक्तों मैत्री अपनायें, मध्यम श्रेणी ये मानी॥
ईश भक्त या अन्य प्राणियों, नहिं विशेष करता सेवा।
प्रभु विग्रह पूजा कर श्रद्धा, साधारण श्रेणी सेवा॥२२॥

प्राण, इन्द्रियों, मन अरु बुद्धिः, भाग्य भोग तन धर्म धरें।
जो जन प्रभु स्मृति में तन्मय, भोग्य धर्म कब मोह करें??
कर्म-प्रवृत्ति व भोग कामना, बीज वासना उदय नहीं।
एक मात्र प्रभु वासुदेव में, मति-गति उत्तम भक्ति कही॥२३॥

जन्म, वर्ण, आश्रम, तप, कर्मों, अहं भाव का उदय नहीं।
धन-सम्पत्ति, शरीर आदि भी, उस का मेरा भेद नहीं॥
नहिं घटना, संकल्पों विचलित, शान्ति स्वभावी मगन रहा।
आधे क्षण-पल भी प्रभु चरणों, सेवा-शरण न दूर रहा॥२४॥

प्रभुपद नख मणि मधुप चन्द्रिका, भक्तन पंकज-हृदय खिले।
प्रभु स्मृति का तार न टूटे, त्रिभुवन लक्ष्मी अगर मिले॥
विरह, जन्म, संताप भक्तजन, शरण चरण प्रभु अपनाते।
चन्द्रोदय के बाद सूर्य के, ताप न कोई दुःख पाते॥२५॥

अगर विवश हो नामोच्चारें, प्रभु दयालु अघ नसें सभी।
भक्त प्रधान हृदय प्रभु बसते, क्षणभर भी नहिं दूर कभी॥
प्रेम डोर से चरण कमल प्रभु, बंधते बेबस हो जायें।
भक्तों में प्रधान भक्त ही, प्रभु प्रेमी जग तर जायें॥२६॥

निमि पूछा-प्रभु माया क्या है? कैसे पार पड़े इससे?
ब्रह्म-कर्म युति मोहे, भक्त जान ले इसे कैसे??
कहते हैं वाणी में अमृत, एक मात्र औषधि जानी।
कृपा करें प्रभु और बतायें, नहीं तृप्त प्यासे प्राणी॥२७॥

’अंतरिक्ष’ योगेश्वर बोले, निर्वचनीय प्रभो माया।
सद्‌कर्मों से होई निरूपण, भोग-मोक्ष शक्तिः माया॥
मन निग्रह कर प्रभु लीलायें, सुनें देख गुणगान करें।
लाज और संकोच मोह तज, नाम जाप आसक्तिद हरें॥२८॥

ये आसक्तिक रूप प्रभु माया, कर्म कामना युक्त करें।
दुःख-सुख कर्म फओं जग भोगे, जन्म-मृत्यु माया पसरें॥
पाँचों तत्व समन्व्य जीवन, प्रलय काल विघटन इन का।
स्थूल-सूक्ष्म द्रव्य गुण रूपी, आदि न अन्तकाल जिस का॥२९॥

व्यक्त सृष्टि निज कारण सिमटे, पुनि अव्यक्त मिलें सारी।
व्यक्त और अव्यक्त प्रकृति ही, प्रभु माया फैली प्यारी॥
प्रलयकाल सौ वर्षों पृथ्वी, सूखा, सूर्य ताप तपती।
तीनों लोकों सूर्य तपाये, ये सब प्रभु माया लखती॥३०॥

शेषनाग या संकर्षण मुख, अग्नि प्रचण्ड लपट निकलें।
वह पाताल्‌ जलाती उठतीं, ऊँची चारों ओर हिलें॥
फिर सांवर्तक मेघ, सूँड-गज, रूप धार जल बरसाते।
वर्ष पर्यन्त मेघ वर्षा जल, पूर्ण ब्रह्माण्ड डूब जाते॥३१॥

विराट पुरुष ब्रह्मा निज तन तज, सूक्ष्म रूप अव्यक्त मिले।
वायु गंध पृथ्वी की खींचे, जल रस पवन सुगंध मिले॥
पुनि जल अग्नि रूप कार्ण में, अग्नि रूप पुनि तमस मिले।
पवन शक्ति आकाश छीन ले, नभ मण्डल अवकाश मिले॥३२॥

तदनन्तर प्रभु काल रूप में, शब्द रूप नभ विलय भाई।
तामस अहं शब्द का लय हो, इन्द्रिय राजस बुद्धि लयी॥
सात्विक अहंकार मन जन्मा, देवों संग विलीन वहीं।
अहंकार लय महतत्व में, महतत्व, हो प्रकृति लयी॥३३॥

प्रकृति ब्रह्मा लीन हो रही, उलटे क्रम ब्रह्मा सृष्टी।
सृष्टि-प्रलय-स्थिति जग माया, त्रिगुणमयी प्रकृति सृष्टी॥
पुनि बोले-राजन बतलायें! क्या-क्या श्रवण करना?
निमि बोले-जिन मन नहिं वश हो, कठिन कहें माया तरना॥३४॥

महर्षि! कृपा करें बतलायें, आत्मा जो तन समझ गिरे।
अनायास उस मोटी बुद्धिः, किस विधि माया पार परे??
’प्रबुद्ध’ नाम योगेश्वर बोले-राजन! जो जन संसारी।
नर-नारी सम्बन्धों बन्धन, सुख-दुखः कर्म करें भारी॥३५॥

जिन्हें पार माया के जाना, वे सोचें क्यों दुःख पाते?
उन के कर्मों फल क्यों उलटें? सुख दे बदले दुःख लाते॥
धन को पाना कठिन काम है, दिन-दिन दुःख बढ़ता इससे।
मिल भी जाये आत्म तत्व हित, मृत्यु स्वरूप बने इससे॥३६॥

पत्नी, पुत्र, स्वजन, सम्बन्धी, घर, धन नाशवान मानें।
इन्हें जुटाये सुख शान्ति क्या? निज को भूल गये जानें॥
परलोकों भी द्वेष-ईर्ष्या, होड़, घृणा जग सम पाते।
कर्मों फल के भोग पतन हो, नश्वर भय नहीं छुट पाते॥३७॥

शब्द ब्रह्म विद्वान, श्रेष्ठ गुरु, साधन अनुभव बतलायें।
शान्त-चित्त नहीं होंइ प्रपंची, चरण शरण उन की पायें॥
जिज्ञासू ऐसे गुरु को निज, प्रियतम, इष्टदेव माने।
धर्म भागवत, भक्ति भाव के, साधन क्रिया रूप जाने॥३८॥

इन साधन कर भक्तर आत्म निज, दान करे गुरु-प्रभु रीझे।
तन संताप जगत के द्रव्यों, अनासक्त समता लीजे॥
भगवत भक्तों अन्य प्राणियों, प्रति व्यवहार उसे जानें।
विनय, कपट बिन दया, मित्रता, प्रेम-भक्ति क्या वह जानें??३९॥

मिट्टी, जल तन बाह्य शुद्धता, अंतस शुद्धि कपट त्यागे।
सत्य अहिंसा, ब्रह्मचर्य व्रत, मौन, स्वाध्याय अनुरागे॥
शीत-उष्ण, सुख-दुःख सब द्वन्दों, सहनशील निज धर्म लखें।
चेतन आत्मा ईश नियंता, देश-काल सब वस्तु लखें॥४०॥

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