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12.09.2007
मिथिलेश
अभि. सुरेन्द्र सौरभ
1 - 20

प्रथम – सर्जन – सर्ग
(छन्द-ताटंक)


धर्मरती धर्मज्ञ धरा पर, धर्म हेतु जीवन जीते।
जग हिताय सर्वस्व समर्पण, मोह त्याग विष भी पीते॥
गौरवमय इतिहास हमारा, दर्शन-धर्म प्रणेता हैं।
यज्ञ-हवन, ईश्वर की पूजा, पावक यज्ञ प्रचेता हैं॥१॥

धर्म धरे जग जीवन सजता, धर्म धरे धरती फूले।
धर्म हेतु नृप निमि ने सोचा, यज्ञ चारि फल सुख झूलें॥
ऋषि वशिष्ठ के श्री चरणों में, किया निवेदन मृदु भाषा।
ऋत्वज पद ऋषि करें सुशोभित, हृदय यज्ञ की अभिलाषा॥२॥

विहँसे ऋषि वशिष्ठ-सुनो निमि! सद्‌ विचार मन को भाया।
अभी इन्द्र का ऋत्वज हूँ मैं, यज्ञ इन्द्र ने रचवाया॥
पूर्णाहुति कर इन्द्र यज्ञ की, तेरा यज्ञ कराऊँगा।
करो प्रतीक्षा शुभ बेला की, आकर लग्न सुझाऊँगा॥३॥

कर प्रणाम लौटे निमि निजगृह, उथल-पुथल मन में भारी।
इन्द्र यज्ञ तो दीर्घ काल का, नहिं विलम्ब हो हितकारी॥
जीवन तो क्षण भंगुर होता, कवलित काल न कर जाये।
शुभ संकल्प तीव्र अभिलाषा, हर पल भारी ही पाये॥४॥

राज पुरोहित राज मंत्रिगण, अपनी शंका बतलाई।
योग्य महर्षि से समाधान लें, शुभ सम्मति सब की पाई॥
तभी मंत्रणा करने निमि ने, गौतम ऋषि को बुलवाया।
मुनि वशिष्ठ सम्वाद और निज, संशय ऋषि को बतलाया॥५॥

गहन विचार विमर्श वाद में, शुभष्य शीघ्रम्‌ नीति कही।
गुरु वशिष्ठ के आ जाने तक, दूजा ऋत्वज चयन सही॥
जो ऋक-साम-यजुर के ज्ञाता, मीमाँसा करना जानें।
राजा शान्ति-पुष्ट कर्मों को, सम दृष्टा हो करवाने॥६॥

सच्चे, धीर, वेदज्ञ, अहिंसक, शील, क्षमा, सम-दम योगी।
ब्रह्मा के आसन अधिकारी, ऋत्वज द्वेष शून्य योगी॥
गौतम ऋषि वेदज्ञ तपस्वी, ऋत्वज गुणों धनी माने।
विधि-विधान संयोग साधुजन, ऋत्वज चुन नृप हर्षाने॥७॥

भूमि चयन कर शुभ बेला तिथि, सुन्दर मण्डप सजवाया।
यज्ञ हेतु राजा-रानी को, अमृत बेला बैठाया॥
प्रथम पूज्य गणपति पूजाकर, पावक पूजन करवाया।
जाग्रत हुईं सप्त जवालाओं, अग्नि, प्रज्वलित लहराया॥८॥

काली, कराली, मनोजवा अरु, सुलोचन, स्फुरलिंगी।
धूम्रवर्ण, विश्वरुची अग्नियाँ, पूर्ण योगना सतरंगी॥
दो ’आधार’ प्रजापति, इन्द्रहि, मौन अहुती घृत वारी।
अलग-अलग पुनि ’आज्य भाग’ को, अग्नि-सोम आहुति न्यारी॥९॥

उत्तर-पूर्व अग्नि हित आहुति, दक्षिण-पूर्व सोम स्वाहा।
शेष आहुति मध्य अग्नि में, यजुर्वेद विधि अवगाहा॥
वेद ऋचायें, दिव्य गूँजती, यज्ञ धूम नभ गहराया।
सभी दिशायें यज्ञ सुगंधित, प्राण पूर्ण गति नभ भाया॥१०॥

प्रकति प्रफुल्लित, नर-नारी सब, युवा-वाल नाँचें गायें।
गूँजा स्वर ऋषि वृन्द मनोहर, स्वर अमृत रच वर्षायें॥
वातावरण देवमय सारा, धन्य देश राजा-रानी।
सराबोर, श्रद्धाजन सारे, महिमा यज्ञ कहें ज्ञानी॥११॥

कवि, हरि, अन्तरिक्ष, प्रबुद्ध अरु, आविर्होत्र, पिम्प्लायन।
द्रुमिल, चमस, करभाजन योगी, ऋषभ पुत्र परम पावन॥
सूर्य तेज सम नौ योगेश्वर, प्रभु के परम भक्त प्रेमी।
विचरण करते निमि यज्ञ में, पहुँचे जीव-मुक्त नेमी॥१२॥

स्वागत को राजा ऋत्वज अरु, पावक ब्राह्मण खड़े हुए।
यथा योग्य आसन निमि सौंपे, पूजन-अर्चन भव्य हुए॥
दिगम्बरी सनकादिक मुनि सम, हुआ आगमन शुभ जाना।
मधुसूदन भगवान पार्षदों, दर्शन ईश कृपा माना॥१३॥

पावन तीनों लोक महात्मन! अति कल्याण स्वरूप कहें।
उसका क्या साधन होता है? यदि अधिकारी देव कहें??
धर्म भागवत भी उपदेशें, जिस से हो कल्याण सभी।
विनयी निमि नत मस्तक पूछें, प्रभो कृपा अति चाह सभी॥१४॥

उचित प्रश्न सुने योगेश्वर, निमि, ऋत्वज ’कवि’ सम्बोधे।
नित्य निरंतर प्रभु पंकज-पद, आराधन कर मति सोधें॥
अत्यन्तिक है क्षेम जगत यह, कल्याणक भव मुक्त करे।
असत्‌ पदार्थों मोह अहंता, चित्त-वृत्ति उद्विग्न करे॥१५॥

तन्मयता आसक्ति जगत हो, जरा, मृत्यु, भय दुःख रोगी।
गुरु आराध्य परमप्रिय मानें, ईश्वर भजन भक्ति होगी॥
केवल परमात्मा-आत्मा सच, जगत वस्तु मिथ्या जानें।
ईश उपासे, भव भय नाशे, जरा, मृत्यु दुःख नहिं पानें॥१६॥

प्रभु अवलम्बित नहीं व्यथित हों, विधि पूजा यदि भूल करें।
मार्ग पतित प्रभु नहीं मानते, और न फल से हीन करें॥
स्वप्न कल्पना, जगत जागते, सृष्टि विलक्षण देख रहे।
मन संकल्प-विकल्प जगत हों, मन रोके क्या सृष्टी रहे??१७॥

मन निग्रह कर प्रभु लीलायें, सुनें सहज गुण गान करें।
लाज और संकोच, मोह तज, नाम जाप आसक्ति हरें॥
नाम कीर्तन अनुरागी मन, अंकुर प्रेम उपज आता।
चित्त द्रवित होकर स्वभाववश, नाँच, रोइ, हँस गुण गाता॥१८॥

तुष्टि-पुष्टि या क्षुधा निवृत्ति, भूखा ग्रास-ग्रास पाये।
प्रभु प्रेम प्यासे हरपल ही, तुष्टि-पुष्टि बढ़ती जाये॥
भक्ति प्रेमयुत जग विरक्त हो, प्रभु स्वरूप स्फूर्ति मिले।
तभी भागवत बन जायें वह, परम शान्ति अनुभूति मिले॥१९॥

भगवत भक्त धर्म अरु लक्षण, क्य स्वभाव व्यवहार रहे?
कैसे हो आचरण बोल उन? पुनि राजा निमि पूँछ रहे॥
योगी ’हरि जी’ बोले – राजन! ईश्वर आत्म स्वरूप सभी।
आत्म रूप या जीव नियंता, जगत नियंता बना जभी॥२०॥


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