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05.31.2008
मिथिलेश
अभि. सुरेन्द्र सौरभ
101 - 120

प्रथम – सर्जन – सर्ग
(छन्द-ताटंक)


मृत शरीर सम्बन्धी छोड़ें, प्रेम गाँठ तन फिर काहे?
तन-दूजों प्रभु वास बताया, द्वेष भाव उन क्यों-काहे??
अधः पतन मुर्खों निश्चित है, आत्म ज्ञान नहिं सम्पादें।
आत्म-ज्ञा कैवल्य-मोक्ष ही, मानव लक्ष्य नहीं यादें॥१०१॥

महा मूढ़, नहिं इधर-उधर के, धन अधर्म कर्म तल्लीन।
नहीं शान्ति पल भर भी उनको, पग कुठार मारते दीन॥
यही आत्मघाती कहलाते, अज्ञानों ही ज्ञान कहें।
उनके कर्मों परम्परा का, नहीं अन्त कब शान्त रहें॥१०२॥

काल पुरुष इन सदा सर्वदा, मनोरथों पानी फेरे।
नहिं विषाद पछतावा हिय हो, मिटते भाग्यों खुद फोरें॥
अन्तर्यामी श्री कृष्ण प्रभु, विमुख, पुत्र, घर, धन जोड़ें।
अन्त समय सब छोड़ विवस हों, घोर नरक किस्मत फोड़ें॥१०३॥

निमि ने पुनि पूँछा-योगेश्वर! रंग-रूप प्रभु कब कैसे?
मानव किन नामों पहचाने, पूजन भी करना कैसे??
’करभाजन’ योगेश्वर बोले- राजन! युग तो चार कहे।
सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलि प्रभु, नामाकृति रंग बहुत रहे॥१०४॥

सतयुग विग्रह श्वेत रंग हो, चार भुजा सिर जटा धरें।
वल्कल वस्त्र, चर्म मृग काले, गले माल रुद्राक्ष धरें॥
दण्ड, कमंडल और जनेऊ, धारण प्रभो किया करते।
मानव बड़े शान्त, समदर्शी, बैर रहित, जन हित करते॥१०५॥

यही लोग मन-इन्द्रिय निग्रह, ध्यान रूप तप अनुगामी।
हंस, सुपर्ण, धर्म, योगेश्वर, ईश्वर अमल पुरुष नामी॥
परमात्मा, वैकुण्ठ, अव्यक्त, आदि नाम, गुण लीलाओं।
करते हैं गुणगान भाव से, मान, ध्यान अरु सेवओं॥१०६॥

त्रेता युग प्रभु विग्रह का रंग, लाल भुजायें चार कहें।
कटि भाग में तीन मेखला, केश सुनहले वेद कहें॥
यज्ञ रूप वेद प्रतिपादित, स्त्रुक स्त्रुवादि पारों धारें।
विद्व वेद अध्ययन, अध्यापन, लोग धर्म निष्ठा धारें॥१०७॥

विष्णु, यज्ञ, सर्वदेव, उरुक्रम, वृषाकपि, जयंत, उरुगाय।
पृश्रिगर्भाद नाम गुण लीला, आदि कीर्तन करें रिझाय॥
द्वापर युग प्रभु विग्रह साँवल, पीताम्बर भृगुलता धरें।
श्री वत्स चिन्ह वक्ष स्थली, कौस्तुभ मणि पहचान करें॥१०८॥

जिज्ञासू जन महाराज जिन, चिन्ह, छ्त्र चवरादि धरें।
परम पुरुष उन वैदिक तांत्रिक, विधि आराधन नित्य करें॥
ज्ञानी वासुदेव कर स्तुति, क्रिया शक्ति को संकर्षण।
प्रभु अनिरुद्द, प्रद्युमन प्यारे, नमस्कार सारे श्रीमन॥१०९॥

ऋषि नारायण, नर महात्मन, विश्वरूप विश्वेश्वर वे।
सब भूतों आत्माधारी प्रभु, नमस्कार करते प्रभु से॥
कलियुग विधि विधान बहुतन्त्रों, कृष्ण वर्ण विग्रह पूजन।
नीलभ मणि सम उज्ज्वल कान्तिः, अंग छ्टा वैसे दर्शन॥११०॥

अंग हृदयादि, कौस्तुभ उपांग, सुदर्शनादि अस्त्रधारी।
प्रभुति और सुनन्द पार्षद्‌गण, युक्तश बताये अवतारी॥
कलियुग बुद्धियुक्त जन ऐसों, यज्ञों आराधना करें।
विविध नाम, गुण, लीलाआदिक, प्रधानता कीर्तनों करें॥१११॥

आप प्रभो! शरणागत रक्षक, चरण कमल हो ध्यान सदा।
मोह माया जग हारे सम्बल, कामधेनु-प्रभु भक्त सदा॥
तीर्थों, तीर्थ बनाने वाले, तीर्थ-स्वरूप परम प्रभुता।
शिव, ब्रह्मादि बड़े देवों को, शत-शत नमन परम प्रभुता॥११२॥

जो भी शरणागत स्वीकारें, सेवक, आर्त विपत्ति हरें।
जग-सागर से पार उतरने, बनें जहाज सहाय करें॥
महापुरुष प्रभु चरण-कमल की, महिमा जग में कौन कहे?
मैं उन चरण जलज हरि बन्दों, जिन में अति आनन्द रहे॥११३॥

रामावतार पिता दशरथ के, वचन हेतु वैभव छोड़ा।
इन्हीं चरण कमल प्रभु वन-वन, घूमे धर्म नहीं छोड़ा॥
धर्म निष्ठता की सीमा प्रभु, माया मृग पीछे दौड़े।
सीता प्रिया चाहना पर ही, सीमा तोड़ सहज दौड़े॥११४॥

जान-बूझ कर जिन चरणों प्रभु, माया मृग पीछा करते।
उन्हिं चरण अरविन्दों वंदन, प्रभो! हमेशा हम करते॥
मानव युग अनुरूप साधना, विविध नाम रूपों करते।
पुरुषार्थों के स्वामी श्री हरि, संकीर्तन कलि दुःख हरते॥११५॥

सारग्रही जो श्रेष्ठ पुरुष हैं, कलि युग की महिमा जानें।
देहाभिमानी जीव जगत के, भँवर भटकते दुःख पाने॥
लीला प्रभो नाम, गुण कीर्तन,ये जन परम लाभ पायें।
जगत भटकना भी मिट जाये, परम शान्ति अद्‌भुत पायें॥११६॥

राजन! सत्‌युग, त्रेता, द्वापर, प्रजा चाह कलि जन्म मिले।
कलियुग शरण नरायण आश्रम, भक्तों बहुतों जन्म मिले॥
द्रविण देश ही अधिक भक्त हैं, अरु पवित्रतम कावेरी।
तामृपर्णी, कृतमाल, पयस्विनी, प्रतीचि, महानदी हेरी॥११७॥

जो इन नदियों जल पीते हैं, अन्तः करण शुद्ध उन हों।
भक्त बनें प्रभु वासुदेव के, मृत्यु समय निर्भय मन हों॥
कर्म वासना, भेद बुद्धि जिन, त्यागें वत्सल शरण गहें।
सर्वात्मा, प्रेम वरदानी, देव पितरादि उऋण कहें॥११८॥

नही अधीन किसी का सेवक, नहीं किसी बन्धन रहता।
चरण कमल प्रभु प्रियतम पद रज, अनन्य भाव मगन रहता॥
अन्य भाव प्रवृत्ति वृत्तियों, और अवस्थाओं खो दें।
पाप नहीं हों, अगर कभी हों, श्री हरि हिय बैठे धोदें॥११९॥

धर्म भागवत श्रवण किया सब, निमि आनन्द सुखद झाँकी।
निमि, ऋत्वज, आचार्य गणों तब, ऋषभ नन्दओं पूजा की॥
निमि आशीष मुक्ति हित पाई, शेष सुखी शुभमति धारी।
सबके सम्मुख नओं सिद्धजन, अन्तर्धान देहधारी॥१२०॥

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