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10.28.2007

मनोव्यथा
रचियता : प्रो. हरिशंकर आदेश
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एक अलौकिक उदाहरण बन,
जाएगा यह देश - विदेश।
हर दिन यहाँ जुड़े एक मेला,
हर प्रेमी को मिले प्रवेश।।
122
लैला मजनू, प्रिय शीरी फर-
-हाद, सोहनी औ महबाल।
कथा रोमियो और जूलियट
की गाता जग उठा के भाल।।
123
प्रेमी -प्रेयसि की गाथायें,
कितनी हुईं यहाँ मशहूर।
पर पति-पत्नी प्रबल प्रेम का,
ताजमहल में व्यापक नूर।।
124
शाहजहाँ के चिर संचित,
संयम का लगा टूटने बाँध।
शिशु सम मचल उठा लेने को,
दिव्याभा से ज्योतित चाँद।।
125
जैसे ही कुछ हुआ अग्रसर,
लुप्त हुआ छाया - उद्‍घोष।
आँख खुल गई अनायास ही,
शाहजहाँ को आया होश।।
126
देखा झाँक रही अरुणाभा,
प्राची से ले नव संदेश।
विभावरी के अश्रु - वृन्द से,
भर-भर कर निज हृदय -प्रदेश।।
127
ताजमहल की पुण्य प्रभा को,
विहँस देखने लगा प्रभात।
शान्त हो चला शाहजहाँ का,
धीरे - धीरे भाव - प्रपात।।
128
बेला देख नमाज़ अता की,
भूल हृदा की सकल उपाधि।
शाहजहाँ लौटा निकेत को,
देख प्रिया की अमर समाधि।।
129
चिर निद्रा में सोया शाहजहां,
निज भार्या - क़ब्र - समीप।
कहते अमर कथा दोनों की,
समाधियों पर जलते दीप।।
130
गौरव-गरिमा-गर्व-मान है,
प्रेमी-जन की कीर्त्ति पुनीत।
सकल प्रेमियों का जग भर में,
ताजमहल है न्यारा तीर्थ।।
131
धवलोत्पल पर कोमलतम,
भावों की ग़ज़ल हुई उत्कीर्ण।
कर पाई मुमताजमहल का,
अज़ल न अब तक प्यार विदीर्ण।।
132
सर्वांगीण सुन्दरी के हों,
एक ठाँव एकत्रित नाज़।
अजर अमर शुचि अमल प्रेम का,
महाकाव्य हो मानो ताज।।
133
शाहजहाँ मिट गया, किन्तु,
मिट सकी न उसकी प्रीति अपार।
ताजमहल बन खड़ी हुई है,
उसकी मनोव्यथा साकार।।