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10.28.2007

मनोव्यथा
रचियता : प्रो. हरिशंकर आदेश
4
91
क़लमा पढ़ते अधर थम गए,
आई हिचकी की आवाज़।
सब कुछ छोड़ ख़ुदा से मिलने,
चली गई पल में मुमताज।।
92
बिलख-बिलख रो पड़ा ज़ोर से,
मुल्लाओं ने पढ़ी नमाज़।
यम के वाहन पर चढ़ कर यूँ,
चली गई उसकी हमराज़।।
93
राज-पाट धन-धाम वैद्य-गण,
अजेय योद्धा सैन्य विशाल।
खड़े देखते रहे, काल से,
चली किसी की एक न चाल।।
94
पल भर में ही हाय! लुट गया,
था उसका जीवन - शृंगार।
किन्तु, रहा चलता, जैसा
चलता आया था यह संसार
95
प्राण-प्रियतमा के शव पर, था
रहा ढारता दृग से धार।
सिसक-सिसक रो उठा आगरा,
घर-घर मातम हुआ अपार।।
96
शून्य हो गया था उसका जग,
रहा न जीवन से व्यामोह।
रिसने लगा निरन्तर उसके,
नयन-मार्ग से उर-विद्रोह।।
97
की कितनी कामना किन्तु,
आई न मृत्यु भी भूल समीप।
जलता रहा अचाहे जग में,
तिल-तिल उसका जीवन-दीप।।
98
गहन उदासी, मौन पीर से,
परिपूरित हो गया जहान।
शाहजहां असहाय हो गया,
देख भाग्य का अटल विधान।।
99
मधुर मूर्च्छानाएँ ले लेकर,
होता स्मृतियों का आरोह।
मौन सिसकियाँ बन-बन कर,
सो जाता पीड़ा का विद्रोह।।
100
विषय-भोग के सकल उपकरण,
धन-वैभव यश-बल-सम्मान।
प्रिया चाँद के चिर वियोग में,
नीरस लगता जीवन - गान।।
101
छाया था मानस पर सहसा,
घोर वेदनामय वैराग।
हो उपविष्ट छांह में जिसकी,
अश्रु ढारता था अनुराग।।
102
आँसू बह कर दे जाते थे,
कुछ पल को ही मन को धीर।
किन्तु, कभी क्या मिट पाई है,
अरे ! आँसुओं से भी पीर!!
103
मनुज हृदय के महाउदिध में,
उठती है जो विकल हिलोर।
उसी व्यथा या हर्ष पुलक के,
आँसू हैं बरस नीरव शोर।।
104
मर्मान्तक वेदना - सूनु हैं,
क्षणिक सान्त्वना -सरि के कूल।
प्रिय नयनों में ही जो खिलते,
आँसू हैं पीड़ा के फूल।।
105
हुआ उपस्थित था उसके,
जीवन में महाप्रलय का दृश्य।
वर्त्तमान का ध्यान न था कुछ,
भूल गया था शब्द भविष्य।।
106
पत्नी की समाधि पर अपना,
मस्तक रख करुण -समवेत।
कर के स्मरण भयंकर पल वे,
शाहजहां हो गया अचेत।।
107
हुआ भास उसको कुछ ऐसा,
मानो घूम रहा हो ताज।
और सिमटकर सित छाया सा,
चला आ रहा बन मुमताज।।
108
धीरे -धीरे बढ़ कर आई,
छाया, शाहजहाँ के पास।
कह न सका मुख से कुछ भी बस,
रहा देखता मौन उदास।।
109
"मुझको पहचाना क्या, बोली-
ओ मेरे प्यारे सरताज।
सुनो! तुम्हारी अमर प्रणयिनी,
मैं हूँ विश्व-विदित मुमताज।।
110
मैं हूँ अमर जगत में जब तक,
जीवित है, हे प्रियतम! ताज।
तुमने ही तो बना दिया है,
ताज बना अविनाशी आज।।
111
किया करेगा जगत हमारे,
अचल प्रेम का नित गुण गान।
गर्व करेगा सदा देख कर,
ताजमहल सा प्रणय-निसान।।
112
मुझे न समझो दूर स्वयम से,
सदा रहूँगी प्रियतम! पास।
हर धड़कन में बनी रहूँगी,
साजन! हो मत रंच उदास।।
113
सावन की संध्या में नित,
मुस्काऊँगी बन नीलम मेघ।
शरद्र - प्रात में प्रत्यूषा बन,
शाँत करूँगी उर - उद्रवेग।।
114
ओढ़ ओढ़नी प्रभाभरी नित,
हरने सान्ध्य- अंत पर रंज।
विभावरी बन कर आऊँगी,
तारों की लेकर शतरंज।।
115
प्रिय चातक के स्वर में मिल कर,
गाऊँगी मैं मिलन - मल्हार।
दूर क्षितिज में नभ बन करने,
आऊँगी धरती को प्यार।।
116
अरविन्दों के आंचल में बन,
उभरूँगी मादक मकरन्द।
युग-युग तक कवि-लेखनियों में,
थिरकूँगी मैं बन कर छंद।।
117
नित्य निशा में मैं झाकूँगी,
नभ-गवाक्ष से बन कर चाँद।
आऊँगी मधु स्वप्नों में मैं,
सदा जगत की सीमा लाँघ।।
118
सरसों के कलधौती अधरों
पर समीर का झूला डाल।
आऊँगी प्रिय! सदा झूलने,
निष्ठुर शीत का बन कर काल।।
119
नित क्षणिनी में तृण-अधरों पर,
करके iस्नग्ध सकल संसार।
नाच्गी, गाऊँगी, रोऊँगी -
हर्षूंगी बन नीहार।।
120
भौतिक स्थूल चक्षुओं से पर,
देख सकेगा मुझे न लोक।
अमर कला बन यद्यपि छुपी हूँ,
ताजमहल में ले आलोक।।