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10.28.2007

मनोव्यथा
रचियता : प्रो. हरिशंकर आदेश
3
61
हुआ प्रकंपित परिलक्षण कर,
बोला, "शाही कुशल तबीब!
कुछ पल को ही और रोक लो,
मेरा जाता हुआ हबीब।।
62
सब कुछ ले लो धान्य और धन,
मेरा यह साम्राज्य विशाल।
किन्तु बचालो मेरा जीवन,
नष्ट कर रहा जिसको काल"।।
63
"जो कुछ भी संभव हो सकता,
हम सब हैं कर रहे उपाय।
नियति - समक्ष नहीं वश चलता,
मानव हो जाता निरुपाय"।।
64
राजवैद्य बोला मुँह लटका ,
"शेष नहीं कोई उपचार।
आलम-पनाह! आलम-पनाह
मात्र दिखा सकता चमत्कार।।
65
अब तो दुआ कीजिए ख़ुदा-
-बन्द ताला से जहांपनाह!
वही बचा सकता बेग़म को,
जो है सब शाहों का शाह"।।
66
उसका हृदय कर उठा था जब,
सुन कर के यह, हाहाकार।
माँगी रब से भीख रहम की,
उसने दोनों हाथ पसार।।
67
सिद्ध हुई उसकी पर सकल
प्रार्थना अरण्य - रोदन मात्र।
रिक्त हो रहा था द्रुत गति से,
बेग़म की श्वासों का पात्र।।
68
बल - क्षीणा भार्या के सिर पर,
लगा फेरने हाथ महीप।
देख, हुआ अति आकुल-व्याकुल,
निष्ठुर नियति का चक्र प्रतीप।।
69
जीवन में अवसर आया था,
सचमुच ऐसा पहली बार।
जब उसने निज नयनों से,
झरती पाई खारी जल-धार।।
70
प्यार भरे कम्पित स्वर में दी,
उसने बेग़म को आवाज़।
पलकें खोलीं देख शाह को,
बोली धीरे से मुमताज।।
71
"और निकट आ जाओ मेरे,
प्राणों से प्यारे महबूब।
शेष नहीं है अधिक साँस अब,
आह! रहा जीवन - दिन डूब।।
72
वीर पुरुष होकर भी क्यों यूँ,
आँसू आज बहाते आप।
शोभित क्या उसको, जिसका है,
दिग`-दिगन्त में व्याप्त प्रताप।।
73
किंचित शोक करो मत मेरा,
ओ मेरे जीवन - शृंगार!
मधुर मूल में संयोग की ही,
बसा विरह का विश्व अपार।।
74
यदि संयोग है तो वियोग भी,
मिलन-विरह विधि का व्यापार।
जन्म - मृत्यु जीवन के दो पट,
हास्य - रुदन मन का सिंगार।।
75
मृत्यु मिटा सकती है तन को,
अजर अमर है लेकिन रूह।
और, रूह में ही अंतर्हित,
सदा प्रणय की मूल दुरूह।।
76
नश्वर तन है, नश्वर यौवन,
नश्वर यह जीवन - व्यापार।
भौतिक दृग से परिलक्षित
होने वाला सब कुछ निस्सार।।
77
सब कुछ नश्वर जगती में, यदि
अविनाशी कुछ, प्राणाधार!
तो वह अमर आत्मा - द्वय का,
पुण्य पवित्र सरलतम प्यार।।
78
जब कि आत्मा तन-आलय में,
उच्छृंखल हो करती काम।
आकर मृत्यु उसे सुधारने,
संग ले जाती रब के धाम।।
79
जीवन - मृत्यु कल्पना है प्रिय!
केवल मृषा बुद्धि - विश्वास।
अत: न रंच मात्र चिंतित हों,
हो मत स्वामी! व्यथित-उदास।।
80
इतना ही प्रत्यक्ष साथ था,
इस जीवन में प्राण-प्रकाश!
प्रिय! परोक्ष में साथ रहूँगी,
अब से रखो पूर्ण विश्वास।।
81
मेरे परिणयेश! अब मुझको,
अन्य अभीप्सा रही न शेष।
एक मात्र इच्छा है, यह भी,
पूरी कर देना हृदयेश!!
82
वास्तु - कला से प्रेम, भवन
बनवाने में मिलता उल्लास।
हो अद्वितीय मुग़ल शासक तुम,
साक्षी देता है इतिहास।।
83
मेरी स्मृति में भवन अलौकिक,
अनुपमेय करना निर्माण।
मुझको नहीं, प्यार को मेरे
अमर बना, देना चिर प्राण।।
84
कर देना तुम क्षमा कभी की,
जो जाने - अनजाने भूल।
मिलूँ प्रलय पश्चात तुम्हीं से,
बन पावन चरणों की धूल।।
85
इससे अधिका भाग्य क्या मेरा,
जो निज पति की पाकर गोद।
अनुपम सुख की चिर निद्रा में,
सोने जाती आज समोद।।
86
इतना कह कर होने लगे,
निमीलित सहसा दृग-अरविन्द।
चीत्कार कर उठा -"कहाँ जा
रहीं तोड़ सारे सम्बन्ध।।
87
तुमने तो था किया प्रिये! प्रण,
सदा निभाओगी तुम साथ।
जीवन-लोक अंधेरा करके,
कभी नहीं छोड़ोगी हाथ।।
88
आज तोड़ कर प्रण अपना,
सूना कर के मेरा संसार।
चल दीं कहाँ अचानक मेरे,
जीवन में भर कर अंधकार।।
89
कितनी मधुर कल्पनाओं से,
स्वयं संजोया था जो प्यार।
एक निमिष में स्वयं मिटाकर,
चल दीं वह स्वiर्गक संसार।।
90
अरे! अरे! क्यों मौन हो गईं
चाँद! आह! कुछ बोलो बोल।
अपने भाग्यहीन ख़ुर्रम की
ओर निहारो आँखें खोल"।।