अंन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख्य पृष्ठ

10.28.2007

मनोव्यथा
रचियता : प्रो. हरिशंकर आदेश
2
31
भूल गए क्या दुखद घड़ी वह,
बोलो - प्रकाश - सुत! म्रियमाण।
जब कि दफ़न करने आया था,
अपने कर से अपने प्राण।।
32
तुमसे कह जाती हो आकर,
अपनी कथा कदाचित कार्त्त।
ओ समाधि के प्रतिहारी! बस
यही पूंछने आया, आर्त्त।।
33
कभी मिले यदि तो कह देना,
ओ समाधि के जलते दीप!
एक बार आ जाए अथवा,
मुझे बुलाले स्वयं समीप।।
34
इस जीवन से शेष रहा है,
मुझे न अब किंचित अनुराग।
उपवन शून्य हुआ कोकिल बिन,
शून्य हुआ वीणा बिन राग।।
35
सुन्दर एक-एक से बढ़कर,
यद्यपि हैं बेगमें अनेक।
किन्तु हृदय में बस न सकी है
प्रयास कर भी, कोई एक।।
36
रूप नहीं है मूल प्रीति की,
रूप नहीं है प्रेमाधार।
आयु-समय के साथ बदल
जाया करता रूपाश्रित प्यार।।
37
रूप न हो सकता परिभाषित,
सुन्दर है सारा संसार।
जो मन को भा जाए वह ही,
रूप अनूप अगम्य अपार।।
38
प्रेम भूख है नहीं गात की,
प्रेम हृदय की परम पुकार।
प्रेम रूह का ही मज़हब है,
प्रेम ज़िन्दगी का है सार।।
39
चला गया जीवन जीवन से,
जब से चली गई वह छोड़।
मेरी कुटिल वासना - कारण,
मृत्यु पिशाची संग मुँह मोड़।।
40
शेष रह गई है न हृदय में,
अब मेरे कोई भी साध।
मात्र मृत्यु की बची कामना,
जीवन लगता है अपराध।।
41
नहीं भास्कर लगता उज्जवल,
नहीं सुधाकर लगता शीत।
मादक मधुर ज्योत्स्ना भी तो,
लगती है रुग्णा सी पीत।।
42
उसके आनन की स्मृति आती,
खिला देख कर नित्य गुलाब।
उसकी सुधि आते ही मन में,
जड़ता का उगता अनुभाव।।
43
जिधर डालता दृष्टि, उधर
दिखलाई पड़ती बस मुमताज़।
लगता नहीं किसी स्थल पर चित्त,
कर पाता न राज्य का काज।।
44
उसके जाते ही एक दिन में,
केश हो गए धवल सफेद।
यौवन गया, बुढ़ापा आया,
जीवन बना निराशा - खेद"।।
45
यूँ ही करता रहा प्रकट नृप
अपने व्याकुल भाव अनेक।
दीपक हँसता रहा श्रवण कर,
शाहजहां का यह अविवेक।।
46
"ओ क्षणभंगुर दीप! भले हँस,
आज करो मेरा उपहास।
एक बार बस एक बार, पर
ला दो मेरे शशि को पास।।
47
एक रश्मि ही दिखला दो तुम,
हे जलते दीपक निर्वात!
इस मृत्तिका - गात के बदले,
बनवा दूँ कंचन का गात।।
48
इतना कह कर शाहजहां, हो
गया अचानक अर्द्ध अचेत।
स्वयं कौन है और कहाँ है,
रहा न उसको किंचित चेत।।
49
उसे याद आए वे क्षण, जब
हुआ अनूप मिलन अभिसार।
रूपराशि के पंच तत्व पर,
उसका हुआ पूर्ण अधिकार।।
50
लगी नाचने नयनों में पुनि,
मधुर मिलन की पहिली रात।
जिसके आंचल में सोया था,
वह बन सुखद सुनहरी प्रात।।
51
लज्जा से परिपूरित मादक,
चितवन की मृदु मंजुल चोट।
उस अपार सौन्दर्य - सिन्धु ने,
देखा जब घूंघट की ओट।।
52
वह ब्रीड़ा - संकोच और वह,
प्रति पल बढ़ता जाता प्यार।
खोल दिया था जब कि समय ने,
यौवन - मधुशाला का द्वार।।
53
प्रेयिसी पत्नी, पत्नी प्रेयसि,
बनी, मिला पूरा अधिकार।
दल - बल - सहित लिए आकर्षण,
जीवन में उतरा शृंगार।।
54
पी पी कर मधु चषक अधर के,
पहिन प्रिया - बाहों का हार।
जब उसका अजेय योद्धा मन,
एक निमिष में गया था हार।।
55
"इस जीवन पर हो न सकेगा,
अन्य किसी अब अधिकार।
अंगीकार करो प्रिय! मेरा,
आज मुदित मन उर - उपहार।।
56
दोनों के अनेक ऐसे प्रण,
हास्य - रोष -क्रीड़ा - मनुहार।
किया समर्पित जब दोनों ने,
पुलक परस्पर पूरा प्यार।।
57
दहक उठी अन्तर की ज्वाला,
गिरी नयन से झर बरसात।
हुआ प्रकीर्ण स्मरण कर - कर वह,
क्रूर नियति का कटु आघात।।
58
हुआ उसे सहसा ही स्मृत वह,
प्रलयंकर यम का उत्पात।
लगा हुआ था जब कि महल में,
वैद्यों का मेला उस रात।।
59
निज मुख पे अवगुण्ठन डाले,
चला आ रहा था जब काल।
प्राण - प्रियतमा की श्वासों में,
आता - जाता था भूचाल।।
60
पड़ी हुई थी मृत्यु - सेज पर,
जब उसकी प्यारी मुम्ताज।
क्षीण हो रही थी जब उसकी,
जीवन - वीणा की आवाज़।।