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10.28.2007

मनोव्यथा
रचियता : प्रो. हरिशंकर आदेश
1
1
निराश मन में लगी जागने
रह-रह कर एक अभिनव आश।
मंजुल स्मृतियों का अन्तर में,
लगा फैलने पूर्ण प्रकाश।।
2
आ पहुँची वह बेला, जिसका
देख रहा या पथ अविराम।
शहंशाह के विरही जीवन
को मिल गया क्षणिक विश्राम।।
3
मिली सूचना शाहजहां को,
तेरे उर की व्यथा अपार।
रवि - तनया के वक्षस्थ्ल पर,
खड़ी हो गई बन साकार।।
4
युग - युग से आकांक्षित, नृप!
तेरा वह स्वप्निल सुन्दर प्रात।
आज राजधानी के उर पर,
खिला प्रणय का बन जलजात।।
5
तेरे उर - अन्तर में व्यापक,
ब्रह्म-सदृश्य प्रेयसि-स्मृति-लोक।
चीर वक्ष यमुना का हुआ -
सतनु स्थित, बन कर अद्‍भुत ओक।।
6
लाल दुर्ग से देखा नृप ने,
अपने दृगजों को साक्षात।
जिनका अभिनन्दन करने को,
बढ़ी आ रही थी सित रात।।
7
धरती की गोदी में देख -
देख कर अपना ही प्रतिरूप।
विधु को होती ईर्ष्या देख,
ताज का अनुपम शुभ्र स्वरूप।।
8
बोला नृप, ठहरो, ठहरो मैं,
अभी आ रहा हूँ मुमताज!
कहीं न बह जाना यमुना की
लहरों के संग मेरे ताज।।
9
ओ प्रेयसि की अन्तिम इच्छे!
मेरे आँसू के संसार
पल भर करो प्रतीक्षा मेरी,
ओ यमुना के पहरेदार!!
10
मेरे जीवन की प्रसन्नते!
अन्तर की चिर संचित साध!
ठहरो, अभी आ रहा पल में,
लिए हृदय में प्रणय अगाध।।
11
हुआ गमन को उद्यत जब वह,
बोला, साहस कर दीवान।
"जहाँपनाह! न उचित समय यह,
कल प्रात: जाएँ श्रीमान"!!
12
"नहीं, नहीं मैं अभी जाऊँगा",
बोला, शोकाकुल सम्राट।
"बुला रहा अविलम्ब मुझे अब,
प्रति पल समीप यमुना घाट।।
13
कैसा नियम, समय है कैसा,
जाने को प्रियतम के पास।
कैसा छन्द - राग -रस कैसा,
गाने को पद भर उल्लास।।
14
देखो, हँसती है राका निज,
प्रियतम रजनीश्वर के साथ।
फिर क्यों निज प्रिय के समीप,
जाऊँ न, लिए मैं प्रेम -प्रपात।।
15
मुझे न रोको, जाने दो तुम,
उस पाहन-प्रतिमा-ढिंग आज।
चिर निद्रा में जहाँ सो रही,
मेरी प्राण-प्रिया मुमताज"।।
16
शिथिल हो चला संयम सहसा,
भावों में आया आवेश।
हो तुरन्त तैयार यान अब,
दिया कंचुकी को आदेश।।
17
अनुभावों का उदधि और
ले विकल हृदय में हर्ष - विषाद।
स्वर्ण ज्योत्स्ना से आलोकित,
देखा नृप ने सित प्रसाद।।
18
प्रक्लेदित हो गये नयन,
मुख से निकली भीगी आवाज़।
"काश! देख सकती इसको,
निज नयनों से मेरी मुमताज़"।।
19
स्वर दुहराया प्राचीरों ने,
गूँज उठी पुनि - पुनि आवाज़।
"काश! देख सकती इसको,
निज नयनों से मेरी मुमताज़"।।
20
ताजमहल के गर्भ - कोष्ठ में,
एकाकी शलभों से हीन।
अमित रूप की चिर समाधि पर,
दीपशिखा रोती थी दीन।।
21
अपने धूमिल जीवन - स्वर से,
थी कह रही पुकार - पुकार।
"नश्वर है यह जीवन प्राणी!
क्षण भंगुर है यह संसार।।
22
ओ मिट्टी के पुतले मत कर,
नश्वर जीवन पर अभिमान।
एक दिवस यूँ ही मिट्टी में,
मिल जाना होगा नादान!!
23
अमर नहीं कोई इस जग में,
विजित हो सका कभी न काल।
कभी न जान सका कोई भी,
आने वाले कल का हाल।।
24
जो आता है यहाँ एक दिन,
उसका जाना है अनिवार्य।
विगत जन्म का ऋण न चुकाए,
कभी न हो सकता परिहार्य।।
25
साथ न जाता है छदाम भी,
रहता यहीं सकल धन - धाम।
आता - जाता जीव अकेला,
संग न जाता गात ललाम।।
26
मरने वाले मर जाते हैं,
मगर न रुकता है संसार।
रह जाती हैं स्मृतियाँ केवल,
कभी न मरता सच्चा प्यार।।
27
कौन! कौन! तुम भारत-अधिपति!
आओ! आओ! शाहजहाँ!
किसे खोजने आये हो अब,
बोलो हे नरनाह! यहाँ"।।
28
घुटने टेके शाहजहाँ ने,
स्वयं हो गया अवनत शीश।
अस्त-व्यस्त हो गए वस्त्र,
हो गया शिथिल मणिमय उष्णीष।।
29
उठी व्यथित विरहाकुल उर से,
गगन - स्पर्शी एक कराह।
सुबक-सुबक रो उठी शाह के
मन में पुनि विधि-मर्दित चाह।।
30
बोला रोकर - "शलभ-प्रियतमे!
तुम्हें स्मरण है क्या वह रात।
अब से इक्कीस वर्ष पूर्व जब,
डूब रहा था मेरा प्रात।।