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| 06.06.2008 |
| २ — महत्व |
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खंडकाव्य- माँ मन्थरा |
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एक पुत्र बनकर मैंने माँ मन्थरा के अन्तर्मन में झाँकने की कोशिश की है।
टटोला है उसके हृदय को, और जो वात्सल्य, ममता, चिंतन-मनन देखा है वहाँ, उसी
को साकार रूप दे रहा हूँ, "माँ मन्थरा" काव्य के माध्यम से । माँ के मुखारविंद से :- समाज सुखी रहे और हो देश का नाम, भले दुनिया कोसे मुझे या करे बदनाम । |
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| (ख) महत्व | |
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होगा वही जो वो चाहेंगे, जगतपालक, प्रभु श्रीराम, जो होना है, हो जाएगा, वे ही करते हैं सारे काम ।१३२। |
किसी तरह मंथरा हुई सफल, माँ हो गई भरत वत्सल, पर प्रजा के देखने में था, दासी का यह जघन्य छल ।१३३। |
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अपना हित तो सब करते हैं, मनुष्य वही जो परहित मरे, अपने भूखा रहकर भी, दूसरों का पेट भरे ।१३४। |
हम सोंचे अपना हित, तो फर्क क्या रह जाएगा, मानव और हैवान में, सत्य, अहिंसा कौन जगाएगा ।१३५। |
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अस्तु हैं हम सब मानव, सोंचे विश्व का कल्याण, इसी में है हम सबकी खुशी, कोई न फेंके अहित का वाण ।१३६। |
मंथरा दासी थी, सत्य है, पर दासी, आज का नौकर, कदापि नहीं, कदापि नहीं, वह तो थी धर्म,सत्य-वर ।१३७। |
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मंथरा थी सलाहकार, देती रानी को सलाह, कभी नहीं सोंच सकती अहित, सदा दिखाई सच्ची राह ।१३८। |
अस्तु मंथरा की बात मान, कैकेयी ने शुरू की ऐसी लीला, अयोध्या के नर-नारी का क्या, डोल गया राजा का अभेद्य किला ।१३९। |
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कैकेयी ने माँगे वे दो वर, जो दिए थे कभी दशरथ दाता, राम को चौदह वर्ष का वनवास, और भरत को युवराज का टीका ।१४०। |
कैकेयी का अनुशासन पाए, प्रभु राम वन को गए, रो रही थी मंथरा दासी, मेरा हृदय वो लिए गए ।१४१। |
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सबने दुत्कारा फटकारा, मंथरा सब सहती रही, धीरे-धीरे चौदह वर्ष की, अवधि भी बीत गई ।१४२। |
इधर रोते-रोते मंथरा की अँखिया सूख गई, लेते-लेते प्रभु का नाम, सारी दुनिया को भूल गई ।१४३। |
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वह लगने लगी थी पगली-सी, जिसका इकलौटा बेटा खो गया, उस बेटे को खोजते-खोजते, उसका दिल भी डूब गया ।१४४। |
देखती रही राम की राह, कब वे दीनदयाल आएँगे, इन सूखी अँखियों से वे, निर्मल, पवित्र जल बहाएँगे ।१४५। |
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जब सुनी मंथरा, प्रभो राम, आ रहें हैं अयोध्या नगरी, वह तो विह्वल हो रो पड़ी, दूर हुई दुख की बदली ।१४६। |
अयोध्या भी होगा हरा-भरा, आ गए सबके तारणहार, लौटे हैं अपने घर को, हर करके धरती का भार ।१४७। |
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कुछ भी हो उनके जाने से, नगरी हो गई निर्जीव थी, ना देती थी शीतलता, अग्नि-बयार बहती थी ।१४८। |
अयोध्या में था दुख का राज, दुखी थे सब अयोध्यावासी, इसी कारण वे कहते मुझे, कुबड़ी चुगली, अकल्याणी ।१४९। |
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आज थी वह अति प्रसन्न, अपने प्रिय राम से मिलूँगी, कितना कष्ट उठाया उसने, उसकी अंतर्व्यथा सुनूँगी ।१५०। |
आए राम मिले सबसे, खुशियों के फूल खिले, मंथरा को अँकवार में भर, माँ कहकर लिपट मिले ।१५१। |
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कुछ भी हो थी वह खुश, राम ने दुष्टों का संहार किया, उस अजन्मा का छकछककर, नैनों से रसपान किया ।१५२। |
जिस नारी ने दिया, राम को कानन का राज, अपमानित होकर भी, किया सत्पुरुषों का काज ।१५३। |
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राम ने जिसे दिया आदर, वह दासी नहीं हो सकती, वह तो कल्याणमयी थी, थी ईश्वर की सच्ची भक्ती ।१५४। |
जैसी सोची थी मंथरा, वह सब सत्य हो गया, राम क्या अयोध्या राज, विश्वपटल पर छा गया ।१५५। |
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मंथरा एक प्रजा थी, अयोध्या जैसी नगरी की, उसने अपना कर्तव्य निभाया, राष्ट्र-गौरव की रक्षा की ।१५६। |
हर एक देशभक्त चाहता है, उसका देश महान कहलाए, पूरे इस विश्व मंडल पर, उसकी कृति का झंडा लहराए ।१५७। |
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राष्ट्रभक्त की है यह, सबसे बड़ी सत्य निशानी, जो हो सो देश को अर्पण कर दे, ताकि बने एक नेक कहानी ।१५८। |
होगा अगर राष्ट्र का नाम, जन-जन का नाम अमर होगा, हो जाए अगर एक कलंकी, सबकुछ तहस-नहस होगा ।१५९। |
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एक सदस्य का क्या कर्तव्य, मंथरा ने दिखला दिया, आँखों में आँसू लिए, राम-वनवास करा दिया ।१६०। |
वह तो चेरी थी कैकेयी की, वैभव का था उसका राज, सभी चाहते प्रेम से उसे, चेरी जैसा नहीं उसका काज ।१६१। |
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वह अपने को राजपरिवार की, एक सदस्या मानती थी, उसने नमक खाया राज्य का, यह बात वह जानती थी ।१६२। |
उसके रग-रग में था, सच्चे नमक की लालिमा, धन्य है नारी, राष्ट्र-गौरव हेतु, अपने मुँह पर लगा ली कालिमा ।१६३। |
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कुछ भी हो, कैसा भी हो, पर नमक ने रंग दिखाया, एक दासी ने राम के, यश का झंडा फहराया ।१६४। |
राजकुमार दशरथ लाल को, दिया उसने इतना सम्मान, दुनिया की नजरों में बना दिया, राजपुत्र को श्री भगवान ।१६५। |
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राम को ईश्वर बनाने में, मंथरा ने अहम् भूमिका निभाई, गौरवान्वित कराया देश को, राजघराने ने भी गरिमा पाई ।१६६। |
उसे क्या मिला, दुख ही मिला, कोई भी भाँप न पाया, सब कहते हैं उसे कलंकी, समाज ने उसको ठुकराया ।१६७। |
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धन्य है वह वीरांगना, भारत माँ की बेटी, मातृभूमि गौरव के लिए, अपमान शय्या पर लेटी ।१६८। |
धन्य है वह नारी जिसने, विश्व कल्याण कराई, पर विधि का यह कैसा विधान, वही हो गई अपने लिए पराई ।१६९। |
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आज हम उस नारी का, नहीं करते हैं सम्मान, उसे हम घृणा से देखते, करते उस जैसों का अपमान ।१७०। |
राम करते जिसका आदर, क्यों हम करें उसका अपमान, जिसने दिया एक शुद्ध समाज, उसको हम भी दें सम्मान ।१७१। |
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हम दें उसे भी प्रेम, महिमामयी हो समाज, नहीं सुनते प्रभु की भी, कैसी दशा दासी की आज ।१७२। |
हम मानते अगर प्रभु को तो, दासी की भी इज्जत करनी होगी, राम को मानते अगर आदर्श, तो सबकी भलाई करनी होगी ।१७३। |
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वह दिन तब दूर कहाँ, रामराज्य होगा चारों ओर, दीप जलेगा ज्ञान-प्रकाश का, मिट जाएगा अंधेरा घोर ।१७४। |
हमें गर्व है अपने राष्ट्र पर, जहाँ रानी क्या एक दासी, की कल्याण सारे विश्व का, सूर्य, चंद्र हैं इसके साक्षी ।१७५। |
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वास्तव में तू धन्य है माँ, खुद को बदनाम किया, राष्ट्र गौरव बढ़ाने हेतु, अमृत छोड़ विष-पान किया ।१७६। |
माँ तू तो दासी थी, तूने जो कर दिखाया, तू ही है वह सच्ची माँ, भारत गौरव को बढ़ाया ।१७७। |
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देख आज फिर से तेरी, जरूरत आ पड़ी है, सब हैं अपने-अपने चिल्लाते, मान,मर्यादा की किसे पड़ी है ।१७८। |
दासी क्या, माँ बेटे को, सत्यकर्म में नहीं लगा सकती, जहाँ भी आता गरिमा का प्रश्न, बेहिचक अपना सर झुका देती ।१७९। |
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देख आज तेरे लाल बहक गए, आज वे नहीं सोचते अच्छाई, आ के राम को जगा दो, खोल दो उसकी सच्चाई ।१८०। |
आ के बता जा, ऐ भारत की नारियों, देख जो है तेरे कोख का मोती, वह राम भी हो सकता है, उसे जगा, निस्सहाय हो क्यों रोती ।१८१। |
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लाल की गरिमा को जगा, बता कि वह उस राम का वंश है, जिसने लाज रखी माँ के दूध का, उसी ईश्वर का अंश है ।१८२। |
धन्य है हमारा देश, जहाँ छोटे-छोटे प्राणी, कर देते सर्वस्व न्यौछावर, हो जाते प्रकाशित मणि ।१८३। |
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कभी-कभी बड़े जो काम, करने में हिचकिचाते हैं, ऐसे उठकर छोटे स्वयं, वह कर्म कर दिखाते हैं ।१८४। |
पर क्या वे छोटे हैं, कदापि नहीं, कदापि नहीं, ऐसे रूप में ही आते हैं, भगवान ही, भगवान ही ।१८५। |
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शत-शत नमन उन माँ को, जिन्होंने प्यारा विश्व बसाया, कण-कण अर्पित उन चरणों में, जिनका गान प्रभु ने गाया ।१८६। |
नारी ही है आदिशक्ति, नारी ही है कल्याणी, नारी अगर नारी ना रहे, विश्व हो जाए वीरों से खाली ।१८७। |
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विश्व का कल्याण चाहें तो, करें नारी का सम्मान, धूल चटा दें उन दुष्टों को, जो करते नारी अपमान ।१८८। |
गंगा को माँ कहते हैं, उसकी पूजा करते हैं, अन्य नदियों को भी, माँ का दर्जा देते हैं ।१८९। |
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बहती वह सदानीरा अविराम, यह माँ तो ही है, करती प्राणियों का कल्याण ।१९०। |
हम अपने राष्ट्र को भी, माँ ही कहते आए हैं, सदा-सदा ही इस भारती के, चरणों में शीश झुकाते हैं ।१९१। |
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धन्य है मेरा भारत राष्ट्र, नारी का इतना सम्मान, खंजन भी नारी रक्षा हेतु, न्यौछावर कर दी अपनी जान ।१९२। |
पहले-पहल, पुरातन काल से, नारी की इज्जत करते आए हैं, बिन नारी के हम पूर्ण नहीं, नारी-सम्मान से ही सम्मान पाए हैं ।१९३। |
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जब-जब डूबे अंधेरे में, कोई रास्ता सूझ न पाया, हमने याद किया नारी को, उसने ही प्रकाश दिखाया ।१९४। |
नारी के हैं कई रूप, वह माँ, बहन, पत्नी है, विपत्ति-काल में वही, एक सच्ची संगिनी है ।१९५। |
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जिसने किया माँ से प्रेम, हो गया वह साक्षात् ईश्वर, माँ का ही आशीर्वाद पाकर, ध्रुव बने अटल तारावर ।१९६। |
कितना बदल गया है युग, दासों का सम्मान कहाँ, ये बेचारे मारे-मारे फिरते, इनका खिल्ली उड़ाता सारा जहाँ ।१९७। |
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आज नौकर की औकात, कुछ भी तो नहीं है, शोषण और अपमान हो रहा, इनका, सब कहीं है ।१९८। |
आज के नौकर को देखें, करता है हींकभर काम, पर यह संसार देता उसे, घोड़े, गदहे जैसा नाम ।१९९। |
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हम उसे नहीं मानते, अपने जैसा एक इंसान, उसे कष्ट देने में ही, हम समझते अपना मान ।२००। |
नौकर सोचा करता है, क्या मैं इंसान नहीं, मेरी हालत तो देखो, लगता कहीं भगवान नहीं ।२०१। |
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एक वह युग था, जब, दासों का भी होता था मान, लोग समझते उसे अपना अंग, देते उसको उचित सम्मान ।२०२। |
वह रहता एक गृहक जैसा, पीता, खाता रहता मस्त, गृह को अपना गृह समझता, उसे ना होता कोई कष्ट ।२०३। |
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प्रसाद में हो कोई समारोह, प्रेम से लेता वह भी भाग, करता वह सबकी इज्जत, नहीं जलती ईर्ष्या की आग ।२०४। |
सब इज्जत देते, यह भी मानव, रखता जीने का अधिकार, घुलमिलकर उससे रहते, कहीं एही न हो श्रीभगवान ।२०५। |
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आपस में सब मिलकर रहते, सब में है ईश्वर का अंश, सबकी करें सभी इज्जत, मिले बराबर का सबको अंश ।२०६। |
होगा किसी को आत्मकष्ट, तो दुख ईश्वर को होगा, मानवता, सत्य, धर्म का, जग से पलायन होगा ।२०७। |
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हम सब एक जैसे मनुष्य, क्यों दें दूसरों को दुख, आइए आपस में हिलेमिलें, चारों ओर हो सुख ही सुख ।२०८। |
आइए आज खाएँ सौगंध, अपने प्रभु श्रीराम का, ना देंगे किसी को कष्ट, यह तन बने सबके काम का ।२०९। |
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ना होगा किसी को दुख, सब मिलबाँट कर खाएँगे, सबसे प्यारा विश्वबन्धुता, एक राग में गाएँगे ।२१०। |
मिट जाएगा छोटे बड़ों का, आपसी मनमुटाव, सब रहेंगे राम की छाया में, होगी सबके लिए एक नाव ।२११। |
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चारों ओर होगा तब, प्रेम, भाईचारे का राज्य, ना रहेगा किसी को दुख, होंगे सारे सुख के काज ।२१२। |
राम अपने मंथरा अपनी, एक दासी एक राजा, पर दासी ही माँ है, जिसने बनाया सच्चा राजा ।२१३। |
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शत-शत प्रणाम उस देवी को, जिसके द्वारा दुष्ट हुए खतम, आन, मान, मर्यादा आया, भगा अन्याय, असत्य का तम ।२१४। |
शत-शत बार नमन वंदन, माँ का, प्रभु श्रीराम का, जिसके चलते आज हैं हम, नाक, सारे जहाँ का ।२१५। |
| समाप्त | |
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