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| 05.31.2008 |
| 1—मनन |
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खंडकाव्य- माँ मन्थरा |
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एक पुत्र बनकर मैंने माँ मन्थरा के अन्तर्मन में झाँकने की कोशिश की है।
टटोला है उसके हृदय को, और जो वात्सल्य, ममता, चिंतन-मनन देखा है वहाँ, उसी
को साकार रूप दे रहा हूँ, "माँ मन्थरा" काव्य के माध्यम से । माँ के मुखारविंद से :- समाज सुखी रहे और हो देश का नाम, भले दुनिया कोसे मुझे या करे बदनाम । |
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| (क) मनन | |
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सुप्रभात की सुरभि वेला में, उदित हुआ ज्यों प्रभाकर, अविजित उसका रूप देख, तम भगने में नहीं किया देर ।१। |
उपवन हो गया सजा भरा, कलियाँ भी मुस्कुराईं, पुष्पों के सुगंधित दौड़ में, सुधाभरी पावन वेला आयी ।२। |
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देख प्रकृति का अनुपम उपहार, विहगों ने छेड़ी मीठी तान, सुगंधित मलय बयार चली, करने लगे सब प्रभु का गान ।३। |
मस्त हुआ हर तृण,पादप, भौंरों ने गाना शुरु किया, सरिता बह रही अविराम, पथिकों को अमिय अभिराम दिया ।४। |
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घूमने लगे वन्य-जीव, माँ ने बेटे को पुचकारा, कृषक चला खेत की ओर, बह चली प्रेम की धारा ।५। |
उसी समय मंथरा चली, सरयू नदी के तट पर, मंदिरों में बज रही घंटियाँ, मीठी वाणी से भरकर ।६। |
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मंथरा के कर में था लोटा व, पुष्पमाला सुसज्जित डलिया, उसने प्रणाम किया सरयू को, लोटाभर जल भर लिया ।७। |
तब चली मंदिर की ओर, वह कैकेयी की महरी, मंदिर में शिव के सामने, उसने अपना माथा टेकी ।८। |
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उसने अर्पित किए पुष्प, मालाओं को पहनाया, हर्ष-विभोर होकर उसने, आरती की,धूप जलाया ।९। |
उसकी आँखों में चमक थी, और प्रेम के आँसू बह रहे, उसने अपनी सूझबूझ खो दी, प्रभु से वह क्या कहे ।१०। |
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मन ही मन की कामना, हर्षित रहें राजा-रानी, सदा रहें सब सुख संपन्न, आनंदित रहें सभी प्राणी ।११। |
पुजारी के चरणों में कर प्रणाम, लेकर उनका चरण-रजकण, लौटी तब वह राजगृह को, उसका हृदय था स्नेह रसपूर्ण ।१२। |
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कितना बड़ा भाग्य है उसका, सोची हर्षित होकर वह, विश्व-कल्याण के लिए कुछ करे, यह बात गई दिल में रह ।१३। |
कितनी पवित्र जन्मस्थली मेरी, बहती पावन सरयू की धारा, यही है कर्मस्थली भगीरथ की, जिसने गंगा को स्वर्ग से उतारा ।१४। |
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बड़े-बड़े वीरों की माँ है, यह अयोध्या नगरी, सत्य,अहिंसा,मानवता की, खुली है जहाँ गठरी ।१५। |
अयोध्या के नृपति हैं दयालु, दशरथ है जिनका नाम, सत्य,धर्म, न्याय के पुजारी, प्रजा को सुख देना इनका काम ।१६। |
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राजा की हैं तीन रानियाँ, जो आपस में प्रेम से रहतीं, पूरा राज्य है समृद्ध,खुशहाल, प्रेम,समृद्धता की गंगा बहती ।१७। |
राजा के हैं चार पुत्र, चारों में है तेज भरा, ये हैं वीर,महापराक्रमी, इन्हे देख दुश्मन डरा ।१८। |
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चारों भाई थे आज्ञाकारी, उनका गुणगान प्रजा गाती, सदा हँसते रहते,उन्हें देख, चौड़ी हो जाती छाती ।१९। |
सर्वविदित सारा जग जानता, वीरों से परिपूर्ण यह देश, प्रत्येक जन है राष्ट्र पुजारी, ना किसी को कोई क्लेश ।२०। |
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सबका है कर्तव्य यह कि, जन्मभूमि के लिए कुछ करे, नारी हो या नर, बालक हो, राष्ट्र का शीश ऊँचा करे ।२१। |
मंथरा सोचा करती थी, नारी और चेरी है वह, नमक खाती जिस राज्य का, उसके लिए कुछ तो करे वह ।२२। |
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पूरे विश्व पर छा जाए, यह कर्म-स्थली मेरी, सब लें आदर से नाम, भले मैं जीते जी मरी ।२३। |
उस समय चारों तरफ था, दुष्टों द्वारा हत्या, लूट, वह चाहती सब हों निडर, कोई राक्षस जाए न छूट ।२४। |
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मर जाएँ सभी निशाचर, राम के अचूक बाणों से, हो जाए पूरा विश्व राममय, जन-जन के किए प्रतापों से ।२५। |
वह जानती थी राम को, वे नर नहीं ईश्वर हैं, आए करने भक्तों का उद्धार, वे माया से परे हैं ।२६। |
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जब विश्वामित्र आए थे, प्रभु राम को ले जाने को, क्यों न गए दूसरे राज्य में, दुष्टों का संहार कराने को ।२७। |
विश्वामित्र के साथ कानन में, ये उनका यज्ञ सफल कराए, ऋषिवर जानते, ये हैं नरश्रेष्ठ, राक्षसों को ये मार भगाए ।२८। |
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क्यों प्रभु के चरण-रज से, पत्थर भी नारी का रूप लिया, हर्षित होकर अहिल्या ने, प्रभु चरणों को चूम लिया ।२९। |
जिस शिव-धनुष को बड़े-बड़े, प्रतापी राजा तक हिला न पाए, वैदेही के चल रहे स्वयंवर में, विदेह के आँखों में आँसू आए ।३०। |
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वे समझे वीरविहीन यह धरती, क्योंकि वहाँ थे सारे महिपति, बड़े-बड़े योद्धा थे उसमें,सोचे, अब क्या होगा हे शक्तिपति ।३१। |
क्या मेरी नन्दिनी अब, कुआँरी ही रह जाएगी, मेरा प्रण टूटा तो क्या होगा, सीता जीते जी मर जाएगी ।३२। |
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उधर देख सुनयना को, चिंतित थे सब नर-नारी, अगर धनुष न टूटा तो, क्या होगा हे त्रिपुरारी ।३३। |
उस समय था मंडप शान्त, उठा मेरा राम सुकुमार, हँसे नृपति सब उसे देखकर, वे क्या जाने यही है नृपवर ।३४। |
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मैं सुनी थी राम ने ज्योंही, ऋषिवर को शीश झुकाया, उनकी कृपा, आशीष पाकर, शिवधनु के पास आया ।३५। |
सारा मंडप निस्तब्ध हो, रह गया देखता-देखता, राम ने उसे यों उठा लिया, जैसे वह हो सूखा तिनका ।३। |
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शिवधनु को टूटते शायद, कोई भी देख न पाया, देव भी ुए आन्नदित, पुष्प उ्होंने बरसाया ।३७। |
ज्यों टूटा धनुष प्रचंड, टूट गया दुष्टों का म, हर्षित हुए सारे नर-नारी, दूर हुआ नकपुरी का गम ।३८। |
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चारों तरफ हुई जयकार, मेरे पुत्र प्रभु राम का, धन्य हुई अवध नगरी, जहाँ जन्म हुआ भगवान का ।३९। |
अगर ये ईश्वर नहीं थे, तो शिवधनु को क्यों तोड़ा, कितने बड़े-बड़े राजाओं के, गर्व को जिनके जैसा तोड़ा ।४०। |
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अगर ये हैं नहीं ईश्वर, सर्वव्यापी, पालनकर्ता, तो क्यों बने ऋषिवर के, और विदेह के दुखहर्ता ।४१। |
मेरे राम परम ईश्वर हैं, दिव्यपुरुष हैं महान, ये आएँ हैं देने भक्तों को, उनका खोया मान-सम्मान ।४२। |
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उसी समय जब पहुँचे, जनक-गुरु श्रेष्ठ ऋषिवर, जनक आज्ञा से जिसने, काट लिया था माँ का सर ।४३। |
ऐसे पिता भक्त जिसने, सहस्त्रबाहु का वध किया, इक्कीस बार क्षत्रियविहीन, विष्णुप्रिया को कर दिया ।४४। |
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जिसके पहुँचते ही मंडप में, सब प्रजापति काँप गए, परशुराम के क्रोध को, सब प्राणी भाँप गए ।४५। |
ऐसे प्रभु परशुराम को, राम ने ही शांत किया, मीठी वाणी में बोलकर, ऋषिवर का सम्मान किया ।४६। |
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ऋषिवर ने लेनी चाही परीक्षा, अपना धनुष-बाण दिया, कर में धारण कर, देखते ही, राम ने प्रत्यंचा चढ़ा दिया ।४७। |
पुत्र जमदग्नि के भाँप गए, हो गया ईश्वर अवतार, प्रभु प्रणाम कर हर्षित हुए, होगा अब दुष्टों का संहार ।४८। |
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राम थे साक्षात प्रभु अवतार, इस बात को माँ क्या जाने, जिस राज्यप्रसाद में जन्म लिए, वह राजा ही उनको क्या माने ।४९। |
सब हैं यही जानते, ये लाल, कौशल्या के सुखनन्दन, पर मंथरा जानती थी, ये हैं अखिल ब्रह्मांड निकंदन ।५०। |
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माँ बेटे को पहचान न पाई, ना पहचाना कौशल राष्ट्र, मंथरा की आँखे चमक गईं, देख राम का तेज स्पष्ट ।५१। |
महान व्यक्ति नहीं होता एक का, सबका है उसपर अधिकार, अगर राम हो गए युवराज, कम नहीं होगा दुष्टों का भार ।५२। |
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माँ धरती रह जाएगी, दुष्टों, राक्षसों से परिपूर्ण, वह सदा रोती रहेगी, कब मिटें निशाचर संपूर्ण ।५३। |
गऊ, ब्राह्मण, साधू व ऋषि, कष्टों से दब जाएँगे, दुष्ट घूमेंगे निडर होकर, सज्जनों को सदा सताएँगे ।५४। |
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ऐसा हो पुरुषोत्तम श्रीराम, अगर वन को निकल जाएँ, ऋषियों, ब्राह्मणों की दशा देख, दुष्ट-संहार की कसम खाएँ ।५५। |
धन्य होगी यह नगरी, जहाँ ईश्वर ने जन्म लिया, कानन-कानन घूम-घूमकर, निशाचरों का संहार किया ।५६। |
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होगी अमर युग-युगांत तक, यह मेरी अयोध्या नगरी, चारों तरफ गुणगान राम का, छँट जाएगी दुख की बदली ।५७। |
वह चाहती राम बने, दुखहर्ता, कानन के राजा, इसके लिए वह क्या करे, वे थे सबके दिल के राजा ।५८। |
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अभी सोच रही थी मंथरा, प्रभु राम का क्या हो, तभी गुप्तचर आया राम का, बोला माँ की जय हो ।५९। |
मंथरा का अभिनंदन कर, गुप्तचर झुक कर बोला, राम ने तुझे बुलाया माँ, दिल की बात वह खोला ।६०। |
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मंथरा बोली आप चलें, मैं कुछ देर में आई, मेरा राम मुझे बुलाया, अच्छा भाग्य मैं पाई ।६१। |
गुप्तचर के जाने के बाद, मंथरा मन ही मन मुस्काई, इस समय तो सब सोए हैं, राम की बुलाहट क्यों आई ।६२। |
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कहीं मेरे मन की बात, तो नहीं जान गया वह, मेरी इतनी इज़्ज़त करता, दिल की बात न मान जाए वह ।६३। |
वह भले पुरुषोत्तम राम, पर पहले मेरा राजदुलारा, मैं नहीं भेज सकती कानन को, सज्जन न पावें दुख से छुटकारा ।६४। |
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मेरी तो अँखिया है वह, है अमृत वह मेरे लिए, उस जैसे राम के बारे में, मैंने कैसे ऐसे निर्णय लिए ।६५। |
सोचते-सोचते मंथरा उठी, चल दी रामप्रसाद की ओर, पहुँची जब वह राम के पास, हो रही थी उस समय भोर ।६६। |
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मंथरा के नैनों से ज्यों, मिले प्रभु राम के नैन, आँखों में आँसू लिए, बोले राम मीठे बैन ।६७। |
आ माँ आ, मेरे पास, रामचन्द्र चिल्ला उठे, अहा, कितना माधुर्य क्षण, देवता भी विह्वल हो उठे ।६८। |
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प्रभु राम ने बड़े प्रेम से, मंथरा को पास बैठाया, आँखों में आसूँ लिए हुए, अपनी बात कह सुनाया ।६९। |
बोले, माँ वह तूँ ही है, कर सकती मेरा कल्याण, देख तेरे रहते मेरा, कैसे हो सकता अकल्याण ।७०। |
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यह सत्य था कि मंथरा, राम की थी उत्तम भक्त, राम ने ही कहा, कुछ ऐसा कर, माँ, मत कर बर्बाद वक्त ।७१। |
मैं तेरी शरण में आया हूँ, ऐ जगतजननी वीरांगना, तू मुझे अब कानन दे दे, कब तक खेलूँ मैं तेरे अंगना ।७२। |
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अगर मैं कानन को जाऊँगा, हर्षित होंगे सभी ऋषि,साधू, तेरी कसम मुझे है जननी, संत यज्ञ जलेगा धू-धू-धू ।७३। |
जाके वहाँ विपिन में, करूँगा दुष्टों का संहार, मरेंगे ऐसे सभी निशाचर, जो करते प्राणी मांस आहार ।७४। |
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अगर माँ तेरे दिल में, थोड़ा प्रेम हो मेरे लिए, तू मान ले मेरी बात, सत्य,धर्म रक्षा के लिए ।७५। |
देख माँ निशाचरों, दुष्टों को, कितना आतंक मचाए हैं, असत्य, अधर्म व लूटमार का, साम्राज्य, चहुँदिश फैलाए हैं ।७६। |
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इन के डर से रोते धर्मी, ना कर पाते यज्ञ, हवन, अगर तू मुझे भी ना भेजे, इनकी रक्षा में है दूसरा कौन ।७७। |
देख अगर तू अब भी, वन का राज्य नहीं देती, इन ऋषि,निर्दोष प्राणियों, के दुख को अपने सर लेती ।७८। |
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काँप उठेगी सत्य,मानवता क्या, एक माँ देखती रही यह नृत्य, निशाचरों को निडर घूमने देना, एक माँ का ही था,ऐसा कृत्य ।७९। |
देख माँ ना दोगी तुम आज, मुझे वन जाने का आशीष, कल अयोध्या का राजमुकुट, आ लगेगा मेरे शीश ।८०। |
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तब लोग कहेंगे सबको थी, अपने-अपने सुख की सीध, उन प्राणियों को कोई न देखा, जिन्हे नोचते कौवे, गीध ।८१। |
तू ही है, एक ऐसी माँ, मेरा तिलक रोक सकती, प्रभु हमेशा भक्तों की सुनता, आज प्रभु की सुनेगी भक्ति ।८२। |
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राम की व्याकुलता देख, मंथरा के नैन भर आए, अहा, आज वह अपने, प्रभु का कैसा दर्शन पाए ।८३। |
प्रभु आज निस्सहाय हो, उसके आगे हाथ पसारें, सत्य, मानवता रक्षा हेतु, माँ, माँ कहके पुकारें ।८४। |
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माँ का कर्तव्य है क्या, तब वह लगी सोचने, क्यों न हामी दे दी पहले, वह लगी दिल को कोसने ।८५। |
उसने प्रभु राम का शीश, अपनी गोदी में भर लिया, जा बेटा कर धर्म की रक्ष, उनको यह आशीष दिया ८६। |
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तू तो है, सत्य, धर्म रक्षक, होगा तुझे क्या तुच्छ राज, तू तो आया है करने, सज्जनों और देवों का काज ।८७। |
तू है सत्य और धर्म रूप, तू है जगत-पिता ईश्वर, तू है अजर, अटल, अमर, ये सारा विश्व है नश्वर ।८८। |
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देख मंथरा का वह रूप, राम माँ में ही खो गए, विश्व कल्याण का अद्भुत बीज, मंथरा के हृदय में बो गए ।८९। |
मंथरा सोची मेरा भाग्य, कहाँ ले आया मुझको, मुझ जैसी दासी चाहे तो, निडर कर दे सज्जनों को ।९०। |
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कितना बड़ा मेरा भाग्य, सज्जनों के काम आऊँ मैं, दुनिया कुछ भी कहती रहे, प्रभु का आशीष पाऊँ मैं ।९१। |
मंथरा जानती थी प्रजा मुझे, डायन, राष्ट्रद्रोही करार देगी, जो भी दुनिया आएगी, मुझे अपमानित, घृणा करेगी ।९२। |
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कुछ भी कहती रहे दुनिया, चाँद, सूर्य भी अपना पथ छोड़े, डगमगा जाएँ सारे दिग्गज, पर एक माँ न अपना प्रण तोड़े ।९३। |
जा राम तेरी कसम, दासी तुझे करती स्वतंत्र, तोड़ दे दुष्टजनों का गर्व, ना कोई रहे यहाँ परतंत्र ।९४। |
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पर याद तुझे रखना है, इस दासी की छोटी बात, उल्लंघन ना करना मर्यादा का, यह वचन तू देते जा तात ।९५। |
सुनकर मंथरा का वक्तव्य, राम हर्षित हो बोल पड़े, धन्य है तू जगतजननी, देख दुष्ट अब सब मरे ।९६। |
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बड़े-बड़े योगी जिनको हरक्षण, भजते, खोजा करते हैं, वही प्रभु योगेश्वर, दासी को माँ कहते हैं ।९७। |
पा मंथरा का आशीष, हर्षित हुआ राम का मन, धन्य है वह भारतीय नारी, जीते जी मृत्यु कर दी तन ।९८। |
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राम हर्षित हो चल दिए, मंथरा का गुणगान किए, बोले धन्य है, प्यारी माँ, जिसने अभय हो वर दिए ।९९। |
राम गए अपने कक्ष में, भला नींद उन्हें क्यों आए, देख अपने भक्तों का कष्ट, ईश्वर को कब चैन आए ।१००। |
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जिसके लिए हुआ अवतार, जन्म लिए जग के तारणहार, आज आँखों में प्रेम के आँसू लिए, करते एक दासी माँ की जयकार ।१०१। |
सोचते सबसे बड़ी है मंथरा, जिसने ना देखा अपना दुख, जनहित,विश्वकल्याण के लिए, फूँक दिए अपने सारे सुख ।१०२। |
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मैं तो हूँ इस योग्य, यह बात मैं जानूँ, पर मुझसे योग्य है माँ, यह बात मैं मानूँ ।१०३। |
अगर आज न होती माँ, मैं भी विवस हो जाता, यही कारण है कि माँ के आगे, सारा विश्व शीश झुकाता ।१०४। |
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प्रभु राम भी बोल पड़े, हृदय के उद्गार डोल पड़े, सबसे ऊँची है नारी, नारी ही है सबपर भारी ।१०५। |
देख राम का संकल्प, मंथरा हुई सिद्धि का साधन, देव हर्षित हो दुंदुभी बजाए, अब होगा दुष्टों का मर्दन ।१०६। |
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धन्य है वह माँ मंथरा, सज्जनों के सपने पूरे किए, व्योम से गिरे सुगन्धित पुष्प, वृक्षों पर विहगों के कलरव गूँजे ।१०७। |
चारों तरफ थी खुशियाँ, प्रिय राम युवराज बनेंगे, नदियों में अमृत जलधारा, उपवन में सुंदर पुष्प खिलेंगे ।१०८। |
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सोची मंथरा कितने हैं हर्षित, राजपरिवार व अयोध्यावासी, खग,पशु भी सब नृत्य कर रहे, सब हैं राम-प्रेम अभिलाषी ।१०९। |
जब राम कल वन को जाएँगे, इनके सपनों का क्या होगा, सोचेंगे भाग्य है कितना क्रूर, दे गया हम सबको धोखा ।११०। |
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कुछ भी हो कल राम विदाई, कराने की मैं शपथ लेती, पर करूँ अब कुछ तो उपाय, व्यर्थ अब मैं क्यों सोती ।१११। |
जाकर कहूँ राम ईश्वर है, नृपति मेरी नहीं सुनेंगे, भले वे कुछ बोलें ना बोलें, पर मन ही मन खूब हँसेंगे ।११२। |
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वे सोचेंगे मेरा बेटा है, राजकुमार युवराज, मेरे पश्चात वही पाएगा, यह वैभव,सुख संपन्न राज ।११३। |
कौशल्या से कहूँ कि, ये नर नहीं ईश्वर हैं, ये भले हैं आपके पुत्र, पर साक्षात परमेश्वर हैं ।११४। |
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वे भी दुत्कार देंगी मुझे, वे हैं पुत्र-प्रेम की हैं भूखी, जाकर कहूँ अपनी रानी से, चाहें हों वे बहुत क्रुद्ध, दुखी ।११५। |
दौड़ी मन्थरा कैकेयी के पास, किसी तरह राम वन को जाएँ, दिल में लिए बस एक तमन्ना, ऋषि, भक्त सब शान्ति पाएँ ।११६। |
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जानती थी समझाना मुश्किल, कैकेयी जैसी कल्याणी को, फिर भी करूँ कर्तव्य अपना, राम को दिया वचन पुराने को ।११७। |
सबसे ज्यादे प्रिय राम थे, कैकेयी के प्राण समान, अपने बेटे को वन भेजे, विधि का यह कैसा विधान ।११८। |
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डरी सहमी पहुँची मन्थरा, अवधेश दुलारी कैकेयी के पास, उसने विनती की सरस्वती की, सदा रहना तू मेरे साथ ।११९। |
कैकेयी से हँसकर बोली, सुनो अवधेश की रानी, याद करो अपने वो दो वर, जो कभी दिए थे नृपति दानी ।१२०। |
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देख आज तुझे माँगने हैं, राजा से वे दो वर, कैकेयी मंद मंद मुस्काई, फूट गए हँसी के स्वर ।१२१। |
कैकेयी हँसकर बोली, मेरी भी सुन मन्थरा, आज मैं क्यों कुछ माँगू, समय है कितना हर्षभरा ।१२२। |
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प्रिय राम का आज होगा, राजतिलक, हर्षपूर्ण अभिनंदन, वह है मेरा राजदुलारा, नृपति का वह बड़ा नन्दन ।१२३। |
तुम ही जो चाहो माँग लो, अपनी इस प्यारी रानी से, खुशी और हर्षोल्लास मनाओ, नहीं माँगूगी वर, मैं राजा दानी से ।१२४। |
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मंथरा बोली तू होगी चेरी, जब युवराज राम बनेंगे, तू फिरेगी मारी-मारी, नृपति भी तेरी नहीं सुनेंगे ।१२५। |
समझ कितना अच्छा हो, भरत पा जाएँ यह राज, वह तेरा अपना पुत्र है, कितना होगा शुभ यह काज ।१२६। |
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अरे तू है कैसी माँ, पुत्र सुख न दे सकती, तेरा पुत्र भी तो योग्य है, निकाल कोई ऐसी युक्ति ।१२७। |
राम चले जाएँ वन को, भरत पाए यह राजगद्दी, सब हों अपने हर्षित काज, सुख की बह जाए शाश्वत नदी ।१२८। |
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पर विधि की विडम्बना, कैकेयी सोची, है निराली, मेरे राम साक्षात नरवर हैं, सत्य,धर्म,मानवता के प्याली ।१२९। |
कितनी अच्छी लीला उनकी, कोई भी समझ न पाए, उन प्रभु को वनवास कराने, अपनी चेरी ही आए ।१३०। |
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मंथरा को कैसे समझाऊँ, ये हैं दीनदयाल, भक्तवत्सल, इनको जो भी छलने जाए, वह खुद जाए ही छल ।१३१। |
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