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05.17.2009
019
कुछ ज्ञात कुछ अज्ञात

अपने-अपने दायरे!
डॉ. अनिल चड्डा


मैंने तो
दरवाज़ा ही बंद किया था
तुमने तो
दस्तक़ भी न दी
तुम सोचते रहे
मैं दरवाज़ा खोल दूँगा
मुझे लगता रहा
तुम दस्त्क़ दोगे ही
इसी उधेड़बुन में
मैं इधर
तुम उधर
अपने-अपने दायरे में बद
खड़े ही रहे!
खड़े ही रहे!!


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