अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.17.2009
018
कुछ ज्ञात कुछ अज्ञात

क्या करूँ?
डॉ. अनिल चड्डा


मैं
अपनी भूल पर
इतराऊँ
या
आँसू बहाऊँ
समझ नहीं पाऊँ
यदि
मैं भूल नहीं करता
तो
तुम्हारी प्रवृत्ति
कैसे पहचान पाता
यही सोच
मन है इतराता
परन्तु
समय रहते
तुम्हें न जान पाने के
पश्चाताप का एक कतरा
साथ ही
आँख से
टपक है जाता!


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें