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05.17.2009
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कुछ ज्ञात कुछ अज्ञात

बस मैं ही!
डॉ. अनिल चड्डा


मय की लत लगाई थी
कि
कोई साक़ी बनेगा
आए थे मयखाने में
कि
कोई साथी बनेगा
कदम रखा जो मयखाने में
तो पाया
मय पीने-पिलाने वाले
बहुत थे
साक़ी बनने-बनाने वाले
बहुत थे
तरह-तरह की मय
तरह-तरह के साक़ी
न कोई बेहोश
न किसी को होश बाकी
इस पीने-पिलाने के चक्कर में
न मय ही रही
न मयखाना ही
बस "मैं" ही
सभी की "मैं" ही
रह गई बाकी!


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