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05.17.2009
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कुछ ज्ञात कुछ अज्ञात

अंतर
डॉ. अनिल चड्डा


मायावी रात की चादर
तन-मन के इर्द-गिर्द लपेटे
हर रात
उज्ज्वल सपनों में खो जाता हूँ
न जाने कहाँ-कहाँ भटकता
सुख-निद्रा में सो जाता हूँ
एक यही पल तो मेरे बस में है
जिसे जैसे चाहूँ मोड़ लूँ
कुछ न करके भी
सभी खट्टे-मीठे अंगूर
पल भर में तोड़ लूँ
गहराई रात की लंबी पगडंडी को
साफ़-साफ़ देखते हुए पार कर लेता हूँ तो
दूर कहीं क्षितिज में
आशा की एक किरण जो दिखाई देती है
वह मन में ऐसा झँझावात सा लाती है
लगता है सब कुछ एक पल में -
एक क्षण में -
पा लूँगा
मैं सारे पर्वत कर्मयोद्धा की तरह
पलक झपकते ही नेस्तनाबूद कर लूँगा
वही किरण
शनै: शनै: जब
आग का गोला बनने लगती है
मेरी ही आशा की किरण होकर
जब मुझ लीलने लगती है
तो एहसास होता है
अपनी असमर्थता का
दिन के उजाले में
घर-घर में, हर गली में, हर मोड़ पर
स्वार्थ-परिता का
जो तांडव होता है
उससे तो यह भास होता है
इन नरभक्षी गिद्धों से अच्छे तो
वो मच्छर ही हैं
जो दंश भी मारते हैं तो
रात की कालिमा में छुप कर
वह भी
अपनी भूख मिटाने को
न केवल रक्त की प्यास बुझाने को
यहाँ तो हर कोई
दिन के उजाले में नंगा ही घूमता है
भूखे को और भूखा करता है
नंगे को और नंगा करता है
अरे अक्ल के दुश्मनों
क्या नोट खाओगे?
क्या सोना चबाओगे?
या ये सब साथ ले जाओगे?
पापी पेट को तो
केवल दो रोटियाँ ही काफी हैं
तन ढांपने को
दो गज़ कपड़ा ही काफी है
क्या यह सब जुटा रहा है
गोदाम-तिजोरियाँ भरने को
या
अंत:स्थल में छुपी
आदिमानव सी क्रूरता दर्शाने को
मुझे तो
तुझ में और आदिमानव में
केवल एक ही अंतर दिखाई पड़ता है
उसके पास हथियार थे
तेरे पास दूषित दिमाग
तभी तो हर तरफ लगी है
न बुझने वाली
एक प्यासी आग!


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