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05.17.2009
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कुछ ज्ञात कुछ अज्ञात

भूत का भविष्य
डॉ. अनिल चड्डा


आजकल तो वृक्ष भी बोलता है
अपनी छाँव का मोल भी तोलता है
पीला पड़ता मेरे राष्ट्र का अबोध भविष्य
शैशवास्था में ही प्यासा-नंगा डोलता है
और गली-कूचों पर आदर्शों की होली में
रोज़ एक 'शव' दम तोड़ता है
और जन्म लेता है एक और कंकाल
किसी कूड़े के ढेर पर
या फिर गंदे नाले में
भरे उजाले में भी करता है नृत्य महाकाल
मेरे भारत के आगे-आगे
'भूत'(काल) का भविष्य दौड़ता है!


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