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05.17.2009
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कुछ ज्ञात कुछ अज्ञात

अपना-अपना वृत्त
डॉ. अनिल चड्डा


मत झंकृत करो
मेरे हृदय के तार
वर्ना एक और तार
टूट कर
अलापने लगेगा
एक बेसुरा राग!
जो शायद
तुम्हें अच्छा न लगे!!
मत छेड़ो इसके
दर्दीले फफोले
वर्ना
ये फूट कर
फैलाने लगेगें
बदबूदार मवाद!
और तुम
सिकोड़ने लगोगे
नाक-भौं अपनी!!
तुम तो
हवा में तैरते ही
अच्छे लगते हो
मेरी दुनिया में
भला तुम्हारा क्या काम
यहाँ तुम्हें
दुर्गंधित लगेगा
सुगन्धित वातावरण भी!
और हमें
तुम्हारी सुगन्ध से भी
आयेगी दुर्गंध
बनावट की,
झूठ की,
घपलों की,
और
रिश्वतों की!!
तो क्यों नहीं
पड़े रहने देते हमें
अपने ही 'गंदे' नाले में
आओ
हम स्वेच्छा से
समझौता करलें
रहने का
अपने-अपने वृत्त में ही


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