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05.17.2009
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कुछ ज्ञात कुछ अज्ञात

मौन ही रहने दो
डॉ. अनिल चड्डा


मेरे मौन का कारण
मुझसे मत पूछो
चुप ही रहने दो मुझे
आभार होगा तुम्हारा
मेरे मौन का बोझ ही
यदि तुम सह नहीं पाते
तो मौन टूटने पर
क्या होगा तुम्हारा
समझ नहीं पाता हूँ मैँ!
एक लावा सा बह रहा है
इस मौन रूपी पहाड़ के नीचे
फट गया तो
इसकी तपिश ले डूबेगी
तुम्हें भी
मुझे भी
और निर्दोष उन व्यक्तियों को भी
जिनका इस मौन से
कोई वास्ता ही नहीं
इसलिये
एक एहसान करो
मुझ पर
स्वयं पर
इस समाज पर
कि चुप ही रहने दो मुझे
यदि समझ पाओ तो
मौन की भाषा ही समझ लो!


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