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05.17.2009
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कुछ ज्ञात कुछ अज्ञात

एक ही सच
डॉ. अनिल चड्डा


मुझे आज फिर
उस गली में जाना पड़ा
जो
मौत के शहर की ओर
ले जाती है
इस गली में घुसते ही
हरेक शख़्स
खुली आँखों से
बीता और आने वाला कल
साफ़-साफ़ देख पाता है
ज़िंदगी को नोचते-खसोटते
अपने अंदर के गिद्धों को
आसानी से पहचान जाता है
और सहम जाता है
उनका नंगा नाच देख कर
सब कुछ
बेमानी सा लगने लग जाता है
जीवन का एक ही सच -
मौत -
मन स्वीकारता है
तथा सैंकड़ों-सैंकड़ों
संकल्प कर डालता है
पर यह क्या!
मौत की गली से बाहर आते ही
जीवन की भूल-भुलैया में
मन फिर उलझ जाता है
गिद्धों का नंगा नाच भी
मन को अति भाता है
और भटक जाता है
टेढ़े-मेढ़े रास्तों में फिर से
भूल जाता है एक ही सच
जो तभी याद आता है
जब आदमी फिर से
उसी रास्ते पर जाता है
जो
मौत के शहर की ओर
ले जाता है!


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