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05.17.2009
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कुछ ज्ञात कुछ अज्ञात

भटकन
डॉ. अनिल चड्डा


मैं
पथिक था
एक भटका हुआ!
तुमने भी तो
राह न दिखाई मुझे
बस
मेरी अँगुली पकड़ कर
चल दिये मेरे साथ
और
स्वयँ भी भटक गये
मेरी/अपनी/उसकी/सबकी
उलझाई भूल-भुलैया में
तुम्हारी भटकन देख
मैंने तो
राह पा ली
तुम तो भटकते ही रहे
तुम्हें लगी
भटकन ही प्यारी!


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