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05.17.2009
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कुछ ज्ञात कुछ अज्ञात

एक यथार्थवादी गीत
डॉ. अनिल चड्डा


कितने करीब ज़िंदगी के मौत खड़ी है,
फिर भी हरेक शख़्स को अपनी ही पड़ी है !

चंद लम्हों की साँसों ने है तू्फ़ान उठाया,
हर बात पर बेकार बड़ा शोर मचाया,
हुई चलने की बेला तो ख़ामोश घड़ी है !

तेरी-मेरी करता रहा तमाम उम्र भर,
भरता रहा तिजोरी तमाम उम्र भर,
अंत समय झोली पर खाली ही पड़ी है !

नंगी जलाई लाशें, कफ़नों का करके सौदा,
अपना है या पराया, कुछ भी न तूने सोचा,
तू भी बनेगा मट्टी, अंजाम यही है !

मालूम है सभी को, इक रोज़ सब को जाना,
दो दिन का दाना-पानी, चंद रोज़ का ठिकाना,
कोई नहीं ये समझा, सच तो यही है !

कितने क़रीब ज़िंदगी के मौत खड़ी है,
फिर भी हरेक शख़्स को अपनी ही पड़ी है !


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